भारत
में भाषा का टंटा नया नहीं है। प्राचीन-काल से उठा-पटक चली आ रही है। देव-भाषा के
साथ लोक-भाषा की रस्साकशी के फ़साने बहुत हैं, लेकिन हमें विश्वास है कि
आप बेवजह भाषा का इतिहास खंगालने या उसमें होते रहे परिवर्तनों की कथा सुनने के
मूड में नहीं होंगे। हमें भी ज़्यादा दिलचस्पी नहीं। लिहाजा भूमिका का क्षेत्रफल
कम रहे तो कोई दिक्कत नहीं। हम भाषा पर बात तो करना चाहते हैं, लेकिन हमारे हाथ
में शास्त्रीयता का लौहदंड नहीं है। हमारा विमर्श व्याकरण की पटरी पर सरपट दौड़ने
का हामी भी नहीं है। भाषा की ज़रूरत और अनिवार्यता को चुनौती देना या व्याकरण के
ख़िलाफ़ विद्रोह का झंडा बुलंद करने में भी हमारी कोई दिलचस्पी नहीं है। बल्कि
हमारा मक़सद यह पड़ताल है कि क्या वाकई भाषा(भारतीय संदर्भ में) की शुद्धता इतनी
अहम है कि उसकी क़ीमत सम्प्रेषण में व्यवधान से चुकाई जाए? क्या समय के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक बदलाव और
ज़रूरतों के हिसाब से भाषा में बदलाव नहीं होने चाहिए? माध्यम के अनुरूप भाषा में बदलाव मान्य नहीं होना चाहिए? ऐसे और भी सवाल हैं, जो आप अपनी तरफ से जोड़ सकते हैं।
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