“मेरे
मुख़ालिफ़ ने चाल चल दी है/और
अब/मेरी चाल के इंतेज़ार
में है/मगर
मैं कब से/सफेद
ख़ानों/सियाह
ख़ानों में रक्खे/काले-सफ़ेद
मोहरों को देखता हूँ/मैं
सोचता हूँ/ये
मोहरे क्या हैं…”
(जावेद अख़्तर, ये खेल क्या है) उलझन वाजिब है। शतरंज की बिसात को जंग का मैदान
समझें या खेल!
सफ़ेद-काले मोहरों को लकड़ी का टुकड़ा मानें या हक़ीक़त! अगर यह महज खेल है तो फिर
हार-जीत का ज़्यादा महत्व नहीं। और जो हार-जीत अहम है तो फिर खेल को जंग की तरह
क्यों न लें? और
यह भी कि क्या ‘मोहरे’ सांकेतिक हैं जो किसी बड़े
यथार्थ को ‘रेप्रज़ेन्ट’ करते हैं? आज के इस उत्तर-आधुनिक युग
में जब जंग को ‘खेल’ की तरह और ‘खेल’ को जंग की तरह लेने की
संस्कृति विकसित हो चुकी है, तो उलझन वाजिब है। 1990 में कुवैत-मुक्ति के लिए
प्रारम्भ हुआ खाड़ी युद्ध। सितंबर 2001 में अपहृत विमानों के माध्यम से वर्ल्ड
ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर कथित ‘अटैक’ और फिर उसके बाद तालिबानी अफगानिस्तान
पर अमेरिकी हमला। 2003 में ‘जैविक
हथियारों’ की
आड़ में इराक के विरुद्ध युद्ध और सद्दाम हुसैन को युद्धापराध का दोषी क़रार देकर
फांसी की सज़ा। इज़्राइल-फिलिस्तीन के बीच सतत् झड़पें। ये तमाम जंग खेल ही तो
थे/हैं। बल्कि खेल से कहीं ज़्यादा रोमांचक, ज़्यादा यथार्थ, बिल्कुल ‘हाइपर-रियल’। मुमकिन है, आपको उपरोक्त
बातें हँसी-खेल जैसी लगें!
लगनी भी चाहिए।
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