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| तस्वीर में- ख़ालिद जावेद, डॉ. संजीव कुमार, प्रो. दुर्गा प्रसाद गुप्त, प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह, प्रो. शम्सुलहक़ उस्मानी एवं अन्य |
जामिया मिल्लिया इस्लामिया का टैगोर हॉल श्रोताओं से
खचाखच भरा था। जितने कुर्सियों पर बैठे थे, उससे कहीं ज्यादा लोग फ़र्श पर बैठे या
फिर खड़े थे। मौका था हिन्दी विभाग की तरफ से ‘सृजन एवं
संवाद’ कार्यक्रम के तहत कहानी पाठ का। उर्दू भाषा के सिद्धहस्त
कथाकार डॉ. ख़ालिद जावेद, अपनी कहानी ‘शोकगीत गानेवाला’
का जब पाठ कर रहे थे, वहां मौजूद श्रोता, एक अलग क़िस्म की दुनिया में गोते लगा
रहे थे। पाठ के दौरान श्रोताओं के चेहरे पर आते-जाते हर्ष-विषाद के भिन्न भाव, कथा
के साथ न सिर्फ उनके तादात्म्य का बोध करा रहे थे, बल्कि इस बात का अहसास भी दिला
रहे थे कि यह कहानी उनके अंदर अरसे से ‘काई’ की तरह
जमे उन भावों पर भी खराशें डाल रही थी, जो शिल्प के अभाव में अभिव्यक्ति नहीं पा
सके थे।



