'उल्टी करते-करते जाह्नवी की आँखें उलट गई थीं।
वह निश्छल और पवित्र कहां रह पाई! शिव की जटा से निकल, जब महावीर कर्ण के
घर चम्पावती पहुंची थी, तब सपने में भी नहीं सोचा था कि सुजानगढ़ के लोग ही
उसके साथ कभी ऐसा सलूक भी करेंगे। जाह्नवी तो सोचती थी कि यहां ज्ञान,
मानवता और न्याय का पाठ पढ़ाया जाता है। असुरों को परास्त करने के लिए
मथानी और रस्से की व्यवस्था जहां के लोगों ने की हो, उनके बारे में अशुभ
विचार कैसे पनप सकते थे! लेकिन मनुष्य की
प्रवृत्ति कब और कैसे बदल जाए, कौन जानता है?' कथा कहते-कहते बुज़ुर्ग का
गला अचानक भर्रा उठा, उसकी लंबी सफेद दाढ़ी आटा-चक्की वाले ईंजन की तरह
कांप रही थी। आँखें लाल स्याही से रंग चुकी थीं।
मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013
गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013
सोमवार, 4 फ़रवरी 2013
आसान नहीं होता 'शोकगीत गाना'
![]() |
| तस्वीर में- ख़ालिद जावेद, डॉ. संजीव कुमार, प्रो. दुर्गा प्रसाद गुप्त, प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह, प्रो. शम्सुलहक़ उस्मानी एवं अन्य |
जामिया मिल्लिया इस्लामिया का टैगोर हॉल श्रोताओं से
खचाखच भरा था। जितने कुर्सियों पर बैठे थे, उससे कहीं ज्यादा लोग फ़र्श पर बैठे या
फिर खड़े थे। मौका था हिन्दी विभाग की तरफ से ‘सृजन एवं
संवाद’ कार्यक्रम के तहत कहानी पाठ का। उर्दू भाषा के सिद्धहस्त
कथाकार डॉ. ख़ालिद जावेद, अपनी कहानी ‘शोकगीत गानेवाला’
का जब पाठ कर रहे थे, वहां मौजूद श्रोता, एक अलग क़िस्म की दुनिया में गोते लगा
रहे थे। पाठ के दौरान श्रोताओं के चेहरे पर आते-जाते हर्ष-विषाद के भिन्न भाव, कथा
के साथ न सिर्फ उनके तादात्म्य का बोध करा रहे थे, बल्कि इस बात का अहसास भी दिला
रहे थे कि यह कहानी उनके अंदर अरसे से ‘काई’ की तरह
जमे उन भावों पर भी खराशें डाल रही थी, जो शिल्प के अभाव में अभिव्यक्ति नहीं पा
सके थे।
गुरुवार, 6 दिसंबर 2012
आदमी भी कछुआ होता है
वह अंधेरे में बैठा
देखता रहा दीपक टिमटिमाता
छप्पर पर उल्लू बैठा रहा
खरों को उखाड़-उखाड़ ढूँढता रहा कीड़ा
देखता रहा दीपक टिमटिमाता
छप्पर पर उल्लू बैठा रहा
खरों को उखाड़-उखाड़ ढूँढता रहा कीड़ा
देर तक सीली ज़मीन पर हाथ टिका कर
बैठने से उभरे चकत्ते में कुनमुनाती पीड़ा
बेख़बर ठण्ड से ठिठुरा गठरी बना
एकटक देखता रहा दीपक टिमटिमाता
बैठने से उभरे चकत्ते में कुनमुनाती पीड़ा
बेख़बर ठण्ड से ठिठुरा गठरी बना
एकटक देखता रहा दीपक टिमटिमाता
रविवार, 2 दिसंबर 2012
आज़ादी का अर्थ
इतने मदारी, इतने बंदर!
मस्त से बैठे कैम्प के अंदर
ठहाके लगाते, खैनी फांकते
अपनी-अपनी कमाई का हिसाब
लगाते
अपने-अपने मजमे की भीड़ के
बारे में
बातें करते...
मदोन्मत्त से इतराते-छितराते
भविष्य यानी कल की योजना
बनाते
इलाकों का चयन, समय का चयन
ज़रूरी है, भीड़ इकट्ठी करने
के लिए
रविवार, 25 नवंबर 2012
कुछ न समझे, ख़ुदा करे कोई
पर्वत ऊँचा होता है। अडिग होता है। पत्थरों का होता है। तभी सदियों तक तना होता है। माटी के ढूह की उम्र कभी नापी है, किसी ने? गली-मुहल्ले में हो या बियाबान में..., या तो शरारती बच्चे कूद-कूद कर उसका मलीदा बना देंगे या फिर हवा-पानी अपना काम कर जाएगी। ज्यादा अड़ियल और हिम्मती निकली तो मूसकराज उसे इतना खोखला बना देंगे कि वह दलदल जैसी तासीर ग्रहण कर लेगी।
मिट्टी का टीला ज्यादा दिनों तक अस्तित्व में नहीं रह सकता। उसके नहीं रहने के कारण, कुछ भी हो सकते हैं। जाड़े में आप मिट्टी के टीले पर बैठें या कि पहाड़ की चट्टान पर, दोनों ही ठंड का ही एहसास कराएंगे। गर्मी में दोनों की तासीर गर्म हो जाती है। वैसे एक बात मिट्टी के ढूह में ऐसी है जो इसे पहाड़ या चट्टान से अलग करती है। वह ये कि मिट्टी, पत्थरों की तरह न तो ज्यादा गर्म होती है और न ही ज्यादा ठंडी। यहां एक ख़ास किस्म का समन्वय होता है जो सकून बख्शता है।
शनिवार, 17 नवंबर 2012
थोड़ा वक्त लगेगा अभी
मीडिया पर लोग उंगली क्यों
उठाते हैं? मीडिया कुछ मामलों में इतना
दकियानूस क्यों है? कंटेंट को लेकर बेबहरापन क्यों है? मीडियाकर्मियों के साथ इन-हाउस शोषण पर
वरिष्ठ चुप क्यों रहते हैं? जन-सरोकार से जुड़ी ख़बरें अक्सर छूट क्यों जाती हैं? मीडियाकर्म अपनी विश्वसनीयता क्यों खोता जा रहा है? जब पेड न्यूज़ की सभी आलोचना करते हैं तो फिर इस
प्रवृति पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? आतंकवाद
और नक्सलवाद जैसे मुद्दों पर मीडिया उथली भाव-भंगिमा की गिरफ्त में क्यों है? क्या सचमुच मीडिया सत्ता का चापलूस या कि वर्ग विशेष का
प्रतिनिधि बनकर रह गया है? मीडिया में आमजन कहां ठहरते हैं? सवाल इतने हैं कि दिमाग कभी-कभी विद्रोह को आतुर हो
जाता है। लेकिन जवाब...?
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