छुटपन की एक घटना याद आती है। गाँव की एक लड़की, गाँव
के ही युवक के साथ पकड़ी गई। मामला प्रेम-प्रसंग का था। बड़े-बुज़ुर्गों की सदारत
में पंचायत बैठी। दोनों पंचायत में पेश हुए। पंचों को बताया कि वे एक-दूसरे से
प्यार करते हैं और शादी करना चाहते हैं। लेकिन
पंचों ने प्रस्ताव को नकार दिया। मामला नैतिक-अनैतिक के बिन्दु तक ही सीमित कर
दिया गया। सवाल-जवाब से ज़्यादा दोनों की लानत-मलामत हुई और सज़ा मुक़र्रर कर दी
गई। दो-चार शोहदे टाईप के जवान मुस्तैदी से उठे और बाँस की कच्ची कमाचियाँ काट लाए।
इस तरह प्रेमी-युगल की पीठ पर भरी पंचायत में सदाचार की लकीरें उकेरी गईं। दोनों
को माँ-बाप ही नहीं बल्कि सामाजिक संस्कार की अवहेलना का भी दोषी ठहराया गया। सज़ा
और सुनवाई का केन्द्र-बिन्दु प्रेम नहीं था।
शनिवार, 18 मई 2013
गुरुवार, 9 मई 2013
हलाल का बदला झटका
सआदत
हसन मंटो की एक छोटी सी कहानी है- ‘हलाल और झटका’। यह कहानी आज बेतरह याद आ रही है। कहानी में दो किरदार हैं।
पहला कहता है- “मैंने उसकी शहरग पर छुरी रखी,
हौले-हौले फेरी और उसको हलाल कर दिया।” दूसरा चौंकता है- “यह तुमने क्या किया?” सवाल के जवाब में पहले का
सवाल आता है- “क्यों?”
दूसरा अपने सवाल को थोड़ी तफ्सील देता है- “इसको हलाल क्यों किया?” पहला रस लेते हुए कहता है- “मज़ा
आता है, इस तरह...” दूसरा खीझ कर कहता है- “मज़ा आता है के बच्चे... तुझे झटका करना चाहिए था... इस तरह।” और हलाल करने वाले की गर्दन का झटका हो गया। हो सकता है कि मंटो
अपने दौर का सच लिख रहे हों! लेकिन यह हमारे दौर का भी
सच है।
शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013
विरासत की बेदखली, --विश्वनाथ त्रिपाठी
![]() |
यह चाहे जितना भी खेदजनक हो, लेकिन यह कहने का समय आ गया है कि कम से कम कथा साहित्य में, हिन्दी में लिखने वाले मुसलमान लेखकों को वह स्थान नहीं मिला जिसके वह हक़दार थे या हैं। मैं जान-बूझकर पुरस्कार या सम्मान की बात नहीं करना चाहता, क्योंकि यह कोई मानदंड नहीं है। लेकिन उपेक्षा हुई है। इसके क्या कारण रहे हैं, उसकी पड़ताल या छानबीन का यह अवसर नहीं है। लेकिन उपन्यास पर बात करते समय मैं इस तथ्य की तरफ इशारा जरूरी समझता हूँ। बहुत दिनों से यह सवाल मेरे मन में बना हुआ है और इसका कोई स्पष्ट कारण मुझे समझ में नहीं आता। सामान्यतः हिन्दी साहित्य का जो माहौल है, वह बिल्कुल साम्प्रदायिक नहीं है, बल्कि यह सम्प्रदाय विरोधी है। फिर भी ऐसा क्यों होता है या हो रहा है? यह मैं नहीं जानता।
रविवार, 14 अप्रैल 2013
बुधवार, 10 अप्रैल 2013
मौत की किताब (उपन्यास का अंश)
मैं जल्लाद के पीछे-पीछे चल रहा हूँ। क्या मुझे झूलते
हुए रस्सी के फन्दे की तरफ़ ले जाया जा रहा है? इन सब के वज़नी बूट मेरे आगे मार्च कर रहे हैं। मैं रात
भर जागा हूँ। अभी तो नींद आई थी कि रुख़्सत का वक़्त आ पहुँचा। मैं एक बार फिर सुबह
की नींद के खि़लाफ़ चल रहा हूँ। अपने काहिल और ढीले हाथ-पैरों से मैं नींद के ख़िलाफ़
एक बयानिया फिर लिख रहा हूँ। आज सारे इक़बाले जुर्म और चश्मदीद गवाह पूरे हो गए।
सोमवार, 25 मार्च 2013
सोमवार, 11 मार्च 2013
घड़ा बदलने से पानी नहीं बदलता
15 अगस्त 1947। भारत के लिए पर्व का दिन। इतिहास का
टर्निंग प्वॉइंट। मान्यता के मुताबिक आधी रात को आज़ादी दबे-पाँव देश में दाखिल
हुई थी। लोग-बाग जश्न में डूबे थे। पटाखे फूट रहे थे। नारे गूँज रहे थे। आम जनता
मदमस्त थी। उसको इस बात की चिंता ही नहीं थी कि सदियों बाद लौटी आज़ादी के
रहने-सहने का बंदोबस्त कौन करेगा? वह ठहरेगी कहाँ?
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
Featured Post
'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ
1. साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...
-
बाढ़ का पानी अब उतार पर था। जलमग्न धरती कहीं-कहीं अपना कूबड़ दिखाने लगी थी। छोटी-छोटी मछलियों की छलमलाहट बढ़ गई थी। वही जल-धारा, जो कल...
-
सन 1968 की घटना है। आत्मा राम की एक फ़िल्म आई थी। फ़िल्म का नाम था—शिकार। शिकार के लेखक थे—अबरार। अबरार यानी संत पुरुष। शिकार में एक ग...
-
1. साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...




