“हां, जीतता कौन है? शुद्ध लाभ किसे होता है? शुद्ध लाभ मतलब अर्थ लाभ, पद्लाभ, प्रतिष्ठा लाभ, सम्मान लाभ
या कोई और लाभ?
परिभाषाएँ भोथरी हैं। किस रास्ते पर चलोगे तो मंजिल मिलेगी? सोच लो कहीं वही मंजिल न हो, जहां
से यात्रा शुरू की हो?
और कहीं चलनेवाला ही मंजिल हुआ तो?
...सोचने के कई तरीके, पहलू, अन्दाज़, ढंग और आज़ादी न होती तो कुछ न होता।”
कैसी आगी लगाई
उपन्यास का कथा नायक साज़िद अपने सपनों और क्रांतिवादिता की रोमांचक दुनिया से
बेदखली एवं यथार्थ की पथरीली ज़मीन पर धराशायी होने के बाद पराजय-बोध से मुक्ति के
लिए जो तर्क ढूंढता है, वह यही है। यहां कोई ठोस हल, पहल या उत्तर नहीं है। सिर्फ
अनुत्तरित प्रश्न हैं और आश्चर्यजनक रूप से द्वंद्वपूर्ण साधु-भाव है। सपनों की
राजधानी दिल्ली से विरक्ति और इससे नफ़रत की पराकाष्ठा है- “मैं तुमसे पक्का और सच्चा वादा
करता हूँ। क़सम खाता हूँ... कि दिल्ली कभी नहीं लौटूँगा... मतलब रहने या काम
करने...”
...
“इस शहर पर थूक दो।”

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