सोमवार, 24 अप्रैल 2017

नौटंकी थी, नौटंकी है (भाग 1)

कहाँ थे आप ज़माने के बाद आए हैं
मेरे शबाब के जाने के बाद आए हैं

वो चेहरे जो झुर्रियों की गिरफ़्त में थे, वो आँखें जो खोई-खोई सी नज़र आती थीं, वो जिस्म जो हड्डियों के गठ्ठर बन गए थे, और सबके-सब सुरंग जैसी अँधेरी तंग गलियों के बोसीदा क़फ़सनुमा कमरों के गुमनाम मकीन थे। कानपुर हो, मथुरा हो, वृंदावन हो, कासगंज हो, हाथरस हो, आगरा हो, टुंडला हो, खुर्जा हो, या कोई और मुलुक—परम्परागत नौटंकी के सितारों की दुनिया जुदा-जुदा नहीं थी। सब अपने-अपने अंतिम अरण्य में बेदिली से ज़िन्दगी का सलीब ढोने को मजबूर। उम्मीद की चिड़िया कभी-कभी अपने पर फड़फड़ाती थी तो आँखों के कोर आँसू की बूँदों से लबलबा जाते थे, झुर्रियों की परत जोश के ज़ेरे-असर धूमिल पड़ने लगती थी, अतीत अचानक वर्तमान हो उठता था, हड्डियों का ढाँचा गठीले जवान की मानिंद तन जाता था और आवाज़ में जवानी की खनक लौट आती थी। नीम अँधेरे कमरों के इन बाशिंदों की आँखें बिल्लौरी हो उठती थीं और आसमानी सितारों की मानिंद चमकने लगती थीं। कमरा मंच में तब्दील हो जाता था। दमा का मरीज़ आबिद मास्टर, जिसकी ज़िन्दगी महज चंद दिनों की मेहमान थी, अपनी टूटी चारपाई को जहाँगीर का तख़्त समझ बैठता और हुक्म फ़रमाने लगता—मंगल सिंह, तुम्हारा फ़ेल क़ानून की निगाह में तुम्हें मुजरिम क़रार देता है, लिहाजा इसके मुआवज़े में हम, मिनजानिब ये फ़ैसला सादिर फ़रमाते हैं कि ख़ून का बदला ख़ून ! तुम्हें फांसी देकर मक़्तूलाओं के ख़ून की क़ीमत चुका ली जाए, मगर चूँकि आमदे-माहे-रमज़ानुल-मुबारक है, इसलिए इसके एहतराम में तमाम फाँसी के फैसले मुल्तवी किए जाते हैं और बाद एख़्तेताम माहे-सय्याम तामील-ए-हुक्म हो। जिस्म से लगभग लाग़र और नाक के बदले मुँह से जबरन साँसें खींचते, बड़ी-बड़ी लेकिन बिल्कुल पीली पड़ चुकी आँखों वाले तकरीबन नब्बे साल के इस बुज़ुर्ग को जब मैं ब-आवाज़े बुलंद जहाँगीर का इंसाफ के संवाद अदा करते देखता-सुनता हूँ तो उनका बताया इतिहास मानो मेरी आँखों के सामने वर्तमान हो उठता है। मुझे लगता है, मैं किसी गाँव में बाँस-बल्ली और चौकी की मदद से बनाए गए मचान पर तख़्तनशीं जहाँगीर को देख रहा हूँ। मचान जैसा यह मंच चारों तरफ़ से खुला है। पूरा गाँव मंच के इर्द-गिर्द जमा है। लालटेन और मशालें रौशन हैं और इस रौशनी में जहाँगीर बने आबिद मास्टर का चेहरा दमक रहा है। लोगों ने मान लिया है कि मंच पर जो मामूली-सी कुर्सी पड़ी है, वह मामूली कुर्सी नहीं है बल्कि जहाँगीर का तख़्त है और वे लोग जहाँ बैठे हैं, वह गाँव का कोई ऊसर मैदान नहीं, बल्कि बादशाह का दीवान-ए-आम है, जहाँ पर वह अपने ही एक सिपाही के ख़िलाफ़ क़त्ल का मुकदमा सुन रहे हैं और फैसला सुना रहे हैं।

रविवार, 20 नवंबर 2016

'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.     साक्षी है इतिहास
(मार्टिन नीमोलर को समर्पित)

जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे
अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ
बेग़ैरत और बेतकल्लुफ़ होकर उठाएँगे
गर उठाइगिरों की भाषा में कहूँ तो
आपके लिए आँखें बंद कर
तत्वज्ञाता बनने का मज़ा ही कुछ और है!

जगत के धृतराष्ट्रों, मैं संजय नहीं हूँ
मैं कोई रेडियो का जौकी भी नहीं हूँ
आपके दो कौड़ी के क्रिकेट का कमेंटेटर भी नहीं
इसलिए कुछ भी नहीं सुनाऊँगा

सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

लोकहृदय में बसते हैं राम

रामकथा बाँचने वाली शैली में कहूँ तो भारत भूमि के कण-कण में राम हैं, भारतीय मानस के क्षण-क्षण में राम हैं। भारत-भूमि पर वास करने वाले जन-जन में राम हैं। राम हैं तो भारत है। राम हैं तो हिन्दुस्तान है। राम मनुष्य-मात्र के कल्याण का निमित्त हैं। राम हैं तो मंगल है। राम करुणा-पुरुष हैं। राम मर्यादा-पुरुष हैं। दुष्ट-दलन करने वाले राम हैं। दुख-हरण करने वाले राम हैं। राम हैं तो वाल्मीकि हैं। राम हैं तो कबीर हैं। राम हैं तो तुलसीदास हैं। ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं जो यह मानते हैं कि वाल्मीकि हैं तो राम हैं। कबीर हैं तो राम हैं। तुलसीदास हैं तो राम हैं। धर्म और साहित्य इसी बिन्दु पर अलग होते हैं। पहला पक्ष दूसरे के विरुद्ध साक्ष्य लेकर उपस्थित होगा और यह दावा पेश करेगा कि राम तो आदि और अनंत हैं। राम का ज़िक्र तो वेदों में है, पुराणों में है, उपनिषदों और अरण्यक में है। वाल्मीकि नहीं होते तो भी राम होते। कबीर नहीं होते तो भी राम होते। तुलसीदास नहीं होते तो भी राम होते। राम तो भगवान हैं। घट-घट व्यापी हैं, अविरल और अविनाशी हैं। आस्था तो यही कहती है, किन्तु विवेक विरोध करता है।

गुरुवार, 30 जून 2016

पुतुल : जीवन का प्रतिरूप

कठपुतली! एक व्यंजनामूलक शब्द है— सामान्य-जीवन में भी, कला-साहित्य में भी। तुलसी-रचित रामचरितमानस के किष्किन्धाकाण्ड में भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती से कहते हैं, उमा दारु जोषित की नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई।। फ़िल्म 'आनंद' के लिए गुलज़ार इसी भाव को अपने अंदाज़ में संवादबद्ध करते हैं। आनंद अपने मित्र डॉ. भास्कर से कहता है— हम सब रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं, जिनकी डोर उस ऊपर वाले के हाथों में है। हालांकि गुलज़ार के इस संवाद से अधिक परिपक्व कथन जॉर्ज बकनर का है, उनके मुताबिक हमलोग महज कठपुतलियाँ हैं, जिनकी डोर अज्ञात शक्तियों के हाथों में है। सहज शब्दों में कहें तो हम उन शक्तियों द्वारा नियंत्रित और संचालित हैं, जो हमेशा नेपथ्य में रहती हैं। यही बात सातवें अखिल भारतीय पुतुल महोत्सव के उद्घाटन अवसर पर बिना किसी अगर-मगर के कपिला वात्सायन ने कही— ऐसे या वैसे, चाहे जैसे, हम सब पपेट्स हैं। फिर भी यह प्रश्न तो मन को व्यथित करता ही है कि क्या सचमुच हाड़-मांस का हमारा यह शरीर भी काठ सरीखा निर्जीव है? और यह भी कि क्या हम जो कुछ भी करते-सोचते हैं, वह सब महज हमारा भ्रम है? कि हमारी प्रज्ञा, हमारा विवेक, हमारी दृष्टि और दृष्टिकोण, हमारी भावनाएँ—इनका कोई महत्व नहीं है? कि यह सब कल्पना-मात्र हैं? मानव-अस्तित्व से जुड़े इन भारी-भरकम प्रश्नों को यदि हल्के में ही लें और इनकी सांकेतिकता को भी सामान्यीकृत कर लें, फिर भी यह बात कम परेशान करने वाली तो ख़ैर नहीं ही है कि हाड़-मांस से निर्मित, प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ प्राणी भी अन्ततः कठपुतली सरीखा है, जिसकी एक-एक गतिविधि पर किसी अज्ञात कुल-शील शक्ति का नियंत्रण है! इस लिहाज़ से देखें तो कठपुतलियाँ, मनुष्य से अधिक स्वभाविक जान पड़ती हैं; विशेष रूप से तब, जब यह साहित्य और सामान्य जीवन में प्रयुक्त होने वाले मुहावरे से इतर, रंगमंच पर अवतरित होती हैं।

रविवार, 24 अप्रैल 2016

अक्कड़-बक्कड़ः कथ्य और स्वरूप में विरल उपन्यास

अक्कड़-बक्कड़ है क्या? औपन्यासिक कृति या कोई बाल-क्रीड़ा? रपटन-भरी भाषा में फिसलती-गिरती ज़िन्दगी की शल्यक्रिया या किसी बेशर्म गप्पी का वायवीय गल्प? यह क्या सचमुच वैसा ही है जैसा कि अस्सी-नब्बे पूरे सौ?’ शैली तो कुछ ऐसी ही है जैसे कोई बच्चा शब्दों से मगन-भाव खेल रहा हो! लय और लोच के सहारे भावात्मक रूप से हल्के हिंडोले पर डोल रहा हो! लेकिन ऐसा है नहीं। पाठ के समय धैर्य और सावधानी ज़रूरी है क्योंकि असावधानी की स्थिति में रपटने, वाग्जाल में उलझने, शब्दों के कीचड़ में लिथड़ने और लक्ष्यार्थ तक पहुँचने में बिल्कुल जलालपुरिए की तरह अंततः विफल रहने की पूरी गुंजाइश है। सावधानी और गंभीरता इसलिए भी कि यह व्यंग्य उपन्यास है और बकौल श्रीलाल शुक्ल व्यंग्य लेखन का सम्बंध सामाजिक स्थिति की मूल्यगत आलोचना से है। तो उपन्यास पढ़ते वक़्त इस सूत्र-वाक्य को दिमाग़ में रखना ज़रूरी है, तभी हम वास्तविक कथ्य और वातावरण तक पहुँच पाएँगे क्योंकि उपन्यास की भाषा में भी रपटन है। यह आपको नंगलों की तरह भटका भी सकती है और आप किसी क्षेत्र-विशेष की मरीचिका में उलझ सकते हैं, कथ्य और वातावरण के भेदाभेद को समझने से चूक सकते हैं।

रविवार, 27 दिसंबर 2015

अधूरे जीवन का पूरा कोलाज

उपन्यास का नाम है- चिरकुट और इत्तेफ़ाक़ देखिए कि शीर्षक को छोड़, उपन्यास में कहीं और ये शब्द इस्तेमाल नहीं किया गया। लिहाजा मन में उठा यह सवाल वाजिब था कि आख़िर क्यों हितेन्द्र पटेल ने अपने उपन्यास का नाम चिरकुट रखा? क्या इसलिए कि वो जिस सांस्कृतिक समाज का अंग रहे हैं, उसमें यह शब्द आमफ़हम है? या कि कथा-नायक अथवा कथा में विन्यस्त घटनाएँ, प्रवृत्तियाँ और जीवन-दशाएँ ऐसी हैं, जो अपनी समग्रता में चिरकुट शब्द के अर्थ एवं अभिप्राय को भाव-गम्य बनाती हैं? जब ये सवाल मेरे मन को मथने लगा तो हमने शब्दकोश की मदद ली। पता चला कि चिरकुट शब्द दरअसल दो शब्दों के बड़े टुकड़ों का योग है। अर्थात चिरना+कुटना=चिरकुट(यहाँ नानियत है)। शाब्दिक अर्थों में फटा-पुराना कपड़ा, चिथड़ा, कपड़े का छोटा सा टुकड़ा। लेकिन मन संतुष्ट नहीं हुआ क्योंकि साहित्य महज शब्द और उसके रूढ़ अर्थों से निर्देशित नहीं होता, बल्कि इसका नियंता, भाव होता है। चिरकुट शब्द से जो भाव ध्वनित होता है, वह उसके शब्दकोशीय अर्थ से साम्य नहीं रखता। ऐसे में चिरकुट शब्द का वास्तविक अर्थ जानने के लिए लोक में जाना होगा और वहाँ से चिरकुटशब्द का वाजिब अर्थ ग्रहण करना होगा। गाँव-मोहल्ले में वैसा व्यक्ति चिरकुट कहलाता है, जो छोटी-छोटी बेवकूफ़ियाँ, चालाकियाँ, होशियारियाँ या साजिशें करता है और ऐसे कृत्यों से उसका कोई ख़ास भला तो होता नहीं, उल्टे वह लोगों की नज़र में आ जाता है। या फिर वैसा व्यक्ति चिरकुट कहलाता है, जो समाज में गरिष्ठ और निम्न अथवा हेय समझे जाने वाले क्रिया-व्यापारों में लिप्त रहता है। कभी-कभार हम व्यक्ति से इतर किसी काम को भी चिरकुट शब्द से अभिहित करते हैं। मसलन- अरे यार! एक चिरकुट से काम के लिए तुम इतने परेशान क्यों हो? ये तो बस यूँ चुटकी बजाते ही हो जाएगा। ख़ैर, इस माथापच्ची के बाद चिरकुट को लेकर मेरी सामान्य जिज्ञासा तो संतुष्ट हो गई है, लेकिन अब भी मेरी कथित बौद्धिक-दृष्टि इस बात को लेकर पशोपेश में है और ज़िद ठाने बैठी है कि उपन्यासकार ने यहाँ चिरकुट शब्द का इस्तेमाल महज इसलिए नहीं किया है कि इसका अर्थ लोग सहज ही लगा लेंगे, बल्कि वह इसके माध्यम से कुछ और ही कहना चाहता है। तो क्या चिरकुट शब्द का निहितार्थ जीवन-जगत से जुड़ी वैसी छोटी-छोटी घटनाएँ और व्यवहार-विचार सरणियाँ हैं, जिनके बग़ैर जीवन संभव नहीं है, फिर भी उनका लेखा रखने की ज़रूरत इतिहास महसूस नहीं करता? मेरे संशय को तब और बल मिलता है, जब रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं कि संसार में मनुष्य-जीवन संबंधी बहुत सी ऐसी-ऐसी बातें नित्य होती रहती हैं, जिनका इतिहास लेखा नहीं रख सकता, पर जो बड़े महत्व की होती हैं। व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन, इन्हीं छोटी-छोटी घटनाओं का जोड़ है। पर बड़े से बड़े इतिहास और बड़े से बड़े जीवन-चरित्र में भी इन घटनाओं का समावेश नहीं हो सकता।(रामचन्द्र शुक्ल, चिन्तामणि-3, प्र.सं. 1983, पृ.सं.102) अपने इसी निबंध(उपन्यास) में वो फिर लिखते हैं कि मानव जीवन के अनेक रूपों का परिचय कराना उपन्यास का काम है। यह उन सूक्ष्म से सूक्ष्म घटनाओं को प्रत्यक्ष करने का यत्न करता है, जिनसे मनुष्य का जीवन बनता है और जो इतिहास आदि की पहुँच के बाहर हैं।(वही, पृ.सं.102) यहीं पर यह राज़ भी फ़ाश होता है कि आख़िर हितेन्द्र पटेल जैसा इतिहासकार अपनी अभिव्यक्ति के लिए साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण विधा उपन्यासको क्यों चुनता है? और यही मेरे उस सवाल का भी जवाब है कि आख़िर उपन्यास का शीर्षक चिरकुट क्यों रखा गया?

रविवार, 29 नवंबर 2015

अमरकांतः साधारण भाषा में असाधारण का संधान

20वीं सदी का छठा दशक हिन्दी साहित्य की दृष्टि से एक बड़ी उपलब्धि लेकर आया था। नई कहानी ने न सिर्फ ज़िन्दगी को देखने का नज़रिया बदला, बल्कि कहानी की बनी-बनाई पुरानी लीक भी तोड़ दी। हालांकि तोड़ना की जगह नई दिशा शब्द का इस्तेमाल अधिक सटीक होता। ख़ैर, साठ का दशक बदलावों का दशक था। तेज़ी से उभरता निम्न-मध्यवर्ग, ग्रामीण परिवेश से मुक्ति के लिए छटपटा रहा था। युवाओं के सपने अँगड़ाइयाँ ले रहे थे। शहर का आकर्षण उन्हें अपनी तरफ खींच रहा था। बड़ी तादाद में वे शहरों का रुख़ कर रहे थे। राजनीतिक वातावरण लगातार दूषित होता जा रहा था। सामाजिकता अपना महत्व खोती जा रही थी और नैतिकता की पकड़, व्यक्ति पर कमज़ोर पड़ती जा रही थी। कुंठा और संत्रास के ब्रह्मफांस में उलझी युवा-पीढ़ी मोहभंग की सहज शिकार बन रही थी। कुपथगामी हो रही थी। सामंतवाद का बूढ़ा-प्रेत अब भी लोकतांत्रिक देश की छाती पर तना बैठा था। उसके पैने नाख़ून और नुकीले दाँतों से मानवीयता का हृदय छलनी हो रहा था। गाँधी की टोपीपहन-पहन कर जन-प्रतिनिधि बनने वाले राजनेता चुनाव के बाद जनता को या तो टोपियाँ पहना रहे थे, या उनकी टोपियाँ उछाल रहे थे। अर्थात राजनीति, समाज और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जब बदलाव(नैतिक अथवा अनैतिक) स्पष्ट नज़र आ रहा था तो कहानी भला कैसे अछूती रहती? शहरी मध्यवर्गीय परिवार महत्वाकांक्षाओं के अतिशय बोझ के कारण चरमरा रहा था। इस टूटन, घुटन और बिखराव की कथा मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव और कमलेश्वर लिख रहे थे। प्रगतिशील चेतना के बढ़ते दबावों के बावजूद पुरुष-सत्तात्मक समाज का सामंतवादी प्रेत हार मानने को तैयार नहीं था और निम्न-मध्यवर्ग झूला-नट की तरह दोनों को साधने में अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा ख़र्च करने को अभिशप्त था। भारत का साधारण मनुष्य जवाहरलाल नेहरू नहीं था। लिहाजा पंचशील के सिद्धांत जैसे महान उद्देश्य अथवा दर्शन में भी उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसकी तो बेहद छोटी-छोटी समस्याएँ और आकांक्षाएँ थीं। रहने के लिए घर। खाने के लिए अन्न। पहनने के लिए कपड़े। इलाज के लिए अस्पताल। बेरोजगार बेटे के लिए नौकरी और जवान बेटी के लिए योग्य-वर। उसे धर्म अथवा जाति के नाम पर होने वाले अत्याचारों-अनाचारों से मुक्ति और शांति की ज़रूरत थी। व्यवस्था का छलावा और आदर्शों का भुलावा, समस्यापूर्ति के लिए काफ़ी नहीं थे। शिक्षित मध्यवर्ग और बुद्धिजीवियों का ढोंग और भावनात्मक स्तर पर शोषण और स्त्री की परम्परागत छवि को बनाए रखने की साजिश। गाँव और शहर के बीच सेतुबंध के रूप में तेज़ी से आकार ग्रहण करता यह क़स्बाई समाज और क्षेत्र, जटिल जीवन-अनुभूतियों और संबंधों के त्रिविमीय प्रदर्शन का असाधारण रंगमंच बना हुआ था। सभ्यता के इसी अंधेरे प्रेक्षागृह से अमरकांत जीवन का आँखों देखा हाल सुना रहे थे। शिक्षित मध्यवर्ग की मनोदशा, उसके सपने, उसके काइयाँपन और यथार्थ-जीवन की सहज सांकेतिक अभिव्यक्ति का दायित्व अमरकांत ने अपने मज़बूत कंधों पर ले रखा था।

Featured Post

'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.      साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...