बुधवार, 10 मई 2017
सोमवार, 24 अप्रैल 2017
नौटंकी थी, नौटंकी है (भाग 2)
“नाच-नौटंकी शुद्ध
मनोरंजन होता, उजरा-मुजरा वर्जित था, पर नौटंकी देखने तो औरतें भी सँपनी गाड़ी
चढ़कर आतीं। औरतों के लिए परदे का इंतज़ाम होता। वैसे, आयोजकों को औरतों का आना
अच्छा नहीं लगता। औरतें आएँगी तो बच्चे आएँगे, बच्चे रहेंगे तो चिल्ल-पों मची
रहेगी, ख़्वाहमख़्वाह रंग में भंग पड़ता रहेगा। इधर जालिम सिंह के चरण मालिनी
आँसुओं से पखार रही होगी, उधर कोई रोंवटिया बच्चा चिल्लाएगा, ‘बाबूजी हो, मैया मरलक हो।’ हँसी का
फव्वारा छूटेगा, सारी संवेदना बिला जाएगी। हुआ न रंग में भंग।”(शुरुआत से पहले) कहने की ज़रूरत नहीं कि ‘नौटंकी’ पहले खेल थी। स्त्री-पुरुष
सभी देखते थे। स्त्री की उपस्थिति आयोजकों को अच्छी नहीं लगती थी, तो उसका कारण था
‘रंग में भंग’ की आशंका। आजकल जो
नौटंकी के नाम पर परोसा जा रहा है, क्या उसे पूर्व की भांति स्त्रियाँ देख सकती
हैं? मैं नौटंकी के पुराने कलाकार अज़ीम मास्टर से मिलकर
रावतपुर गाँव से लौटा हूँ और अभी बगाही बाकरगंज में रम्पत-रानीबाला के घर पर हूँ।
नौटंकी दिखाने की ज़िद के कारण भरी महफ़िल में अपमान झेलने वाले अज़ीम मास्टर की
डबडबाई आँखें मेरी पीठ पर सवार हैं और मेरे सामने बैठे रम्पत अपने ‘क्लाइंट’ से बुकिंग की बात कर रहे
हैं, ‘तीन दिन के तीस हज़ार लगेंगे।’ ग्राहक कहता है, ‘अरे घर का मामला है,
हम बोल के आए हैं इस बार रम्पत का नौटंकी होगा। यार मामा नाक का सवाल है। थोड़ा कम
कर लो।’ बात अटकती है। वह बंदा किसी को फोन करता है। रम्पत कम पर
तैयार नहीं है। उनकी दलील है, ‘छह लड़की होगी।’ ग्राहक कहता है, ‘क्या यार मामा,
कम-से-कम आठ लाओ।’ थोड़ी ज़िच के बाद ‘साटा’ तय हो जाता है। मैं पूरे वार्तालाप का साक्षी हूँ। इसमें ‘नौटंकी’ कहीं नहीं है। केन्द्र में
है—लड़की और उसकी संख्या। वहाँ से खिन्न मन मैं जब बाहर निकलता हूँ तो अपने साथी
से पूछता हूँ—“यह कौन सी नौटंकी है?” वह कहता
है, “सरकारी कार्यक्रमों और कुछ संगठनों को छोड़कर बाक़ी जहाँ
कहीं भी नौटंकी होती है, वह यही होती है।” लेकिन फिर पता चलता
है कि हम-आप कला के नाम पर चाहे जो कह-कर लें, लेकिन रम्पत नहीं हो तो बहुत से घरों
में चूल्हा जलना मुश्किल हो जाएगा। साल-छह महीने में किसी कलाकार को एक ‘रोल’ और उसके एवज़ में
हज़ार-पन्द्रह सौ रूपये दे देने से क्या ज़िन्दगी चल जाएगी? अगर नहीं तो फिर ‘शुद्धता’ के चोले को अंततः क़फ़न में ही तब्दील होना है। ठीक है, आतमजीत
सिंह की ‘लैला-मंजनूं’ के चश्मे से देखें
तो रम्पत की ‘लैला-मजनूं’ बिल्कुल फूहड़ हैं,
वे बहरे-तबील और चौबोले की जगह पर सस्ते फिल्मी गाने ज़्यादा गाते हैं। लैला और
कैश के बीच ‘मदरसे’ में जो पाक मुहब्बत परवान
चढ़ सकती थी, उसको जोकर के द्विअर्थी संवाद दूषित बनाते हैं। लेकिन साहब पेट तो
इसी से चलता है। नौटंकी के परम्परागत कलाकारों के जीवन-बसर की कोई और राह न तो
कला-संस्थानों/विभागों ने निकाली है और न ही कला में आ रही गिरावट और अश्लीलता पर ज़ार-ज़ार
रोने वाले कला-प्रेमियों ने। बल्कि नौटंकी के स्वर्णिम अतीत को वर्तमान करने की
दिशा में क्रियाशील लोगों के प्रति भी इनके मन में कुढ़न और आक्रोश है। एक कलाकार
ने राहत इंदौरी का शेर पढ़ा, “कल तक दर दर फिरने वाले, घर के
अन्दर बैठे हैं / और बेचारे घर के मालिक, दरवाज़े पर बैठे हैं”। हालांकि इनसे यह
पूछा जा सकता है कि जब आप घर में थे तो घर की मर्यादा का ध्यान क्यों नहीं रखा? अपनी कला को, इस विधा को, इसके स्वर्णिम शिखर से च्युत
क्यों किया अथवा होने दिया? अगर उसी वक़्त तमाम
कलाकारों ने श्याम सुंदर का विरोध किया होता तो ‘वेरायटी’ की नींव ही नहीं पड़ती। ख़ैर, मकान तो जैसा कल था, आज भी
है, बस मक़ीन बदल रहे हैं। नौटंकी के परम्परागत कलाकारों के बहुत से तम्बू उखड़ गए
हैं, कुछ हैं जो अब भी अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं। नये-पुराने अभिनेताओं, नई-पुरानी
कहानियों और साज-सज्जा के साथ नौटंकी अब भी जारी है।
नौटंकी थी, नौटंकी है (भाग 1)
कहाँ थे आप ज़माने के बाद आए हैं
मेरे शबाब के जाने के बाद आए हैं
वो चेहरे जो झुर्रियों की गिरफ़्त में थे, वो आँखें जो
खोई-खोई सी नज़र आती थीं, वो जिस्म जो हड्डियों के गठ्ठर बन गए थे, और सबके-सब
सुरंग जैसी अँधेरी तंग गलियों के बोसीदा क़फ़सनुमा कमरों के गुमनाम मकीन थे।
कानपुर हो, मथुरा हो, वृंदावन हो, कासगंज हो, हाथरस हो, आगरा हो, टुंडला हो,
खुर्जा हो, या कोई और मुलुक—परम्परागत नौटंकी के सितारों की दुनिया जुदा-जुदा नहीं
थी। सब अपने-अपने अंतिम अरण्य में बेदिली से ज़िन्दगी का सलीब ढोने को मजबूर।
उम्मीद की चिड़िया कभी-कभी अपने पर फड़फड़ाती थी तो आँखों के कोर आँसू की बूँदों
से लबलबा जाते थे, झुर्रियों की परत जोश के ज़ेरे-असर धूमिल पड़ने लगती थी, अतीत
अचानक वर्तमान हो उठता था, हड्डियों का ढाँचा गठीले जवान की मानिंद तन जाता था और
आवाज़ में जवानी की खनक लौट आती थी। नीम अँधेरे कमरों के इन बाशिंदों की आँखें
बिल्लौरी हो उठती थीं और आसमानी सितारों की मानिंद चमकने लगती थीं। कमरा मंच में
तब्दील हो जाता था। दमा का मरीज़ आबिद मास्टर, जिसकी ज़िन्दगी महज चंद दिनों की
मेहमान थी, अपनी टूटी चारपाई को जहाँगीर का तख़्त समझ बैठता और हुक्म फ़रमाने लगता—“मंगल सिंह, तुम्हारा फ़ेल क़ानून की निगाह में तुम्हें मुजरिम
क़रार देता है, लिहाजा इसके मुआवज़े में हम, मिनजानिब ये फ़ैसला सादिर फ़रमाते हैं
कि ख़ून का बदला ख़ून ! तुम्हें फांसी देकर
मक़्तूलाओं के ख़ून की क़ीमत चुका ली जाए, मगर चूँकि आमदे-माहे-रमज़ानुल-मुबारक
है, इसलिए इसके एहतराम में तमाम फाँसी के फैसले मुल्तवी किए जाते हैं और बाद
एख़्तेताम माहे-सय्याम तामील-ए-हुक्म हो।” जिस्म से लगभग लाग़र
और नाक के बदले मुँह से जबरन साँसें खींचते, बड़ी-बड़ी लेकिन बिल्कुल पीली पड़
चुकी आँखों वाले तकरीबन नब्बे साल के इस बुज़ुर्ग को जब मैं ब-आवाज़े बुलंद ‘जहाँगीर का इंसाफ’ के संवाद अदा करते
देखता-सुनता हूँ तो उनका बताया इतिहास मानो मेरी आँखों के सामने वर्तमान हो उठता
है। मुझे लगता है, मैं किसी गाँव में बाँस-बल्ली और चौकी की मदद से बनाए गए मचान
पर तख़्तनशीं जहाँगीर को देख रहा हूँ। मचान जैसा यह मंच चारों तरफ़ से खुला है।
पूरा गाँव मंच के इर्द-गिर्द जमा है। लालटेन और मशालें रौशन हैं और इस रौशनी में
जहाँगीर बने आबिद मास्टर का चेहरा दमक रहा है। लोगों ने मान लिया है कि मंच पर जो
मामूली-सी कुर्सी पड़ी है, वह मामूली कुर्सी नहीं है बल्कि जहाँगीर का तख़्त है और
वे लोग जहाँ बैठे हैं, वह गाँव का कोई ऊसर मैदान नहीं, बल्कि बादशाह का दीवान-ए-आम
है, जहाँ पर वह अपने ही एक सिपाही के ख़िलाफ़ क़त्ल का मुकदमा सुन रहे हैं और
फैसला सुना रहे हैं।
रविवार, 20 नवंबर 2016
'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ
1. साक्षी
है इतिहास
जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे
अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ
बेग़ैरत और बेतकल्लुफ़ होकर उठाएँगे
गर उठाइगिरों की भाषा में कहूँ तो
आपके लिए आँखें बंद कर
तत्वज्ञाता बनने का मज़ा ही कुछ और है!
जगत के धृतराष्ट्रों, मैं संजय नहीं हूँ
मैं कोई रेडियो का जौकी भी नहीं हूँ
आपके दो कौड़ी के क्रिकेट का कमेंटेटर भी नहीं
इसलिए कुछ भी नहीं सुनाऊँगा
सोमवार, 10 अक्टूबर 2016
लोकहृदय में बसते हैं राम
रामकथा बाँचने वाली शैली में कहूँ तो भारत
भूमि के कण-कण में राम हैं, भारतीय मानस के क्षण-क्षण में राम हैं। भारत-भूमि पर
वास करने वाले जन-जन में राम हैं। राम हैं तो भारत है। राम हैं तो हिन्दुस्तान है।
राम मनुष्य-मात्र के कल्याण का निमित्त हैं। राम हैं तो मंगल है। राम करुणा-पुरुष
हैं। राम मर्यादा-पुरुष हैं। दुष्ट-दलन करने वाले राम हैं। दुख-हरण करने वाले राम
हैं। राम हैं तो वाल्मीकि हैं। राम हैं तो कबीर हैं। राम हैं तो तुलसीदास हैं। ऐसे
लोगों की संख्या भी कम नहीं जो यह मानते हैं कि वाल्मीकि हैं तो राम हैं। कबीर हैं
तो राम हैं। तुलसीदास हैं तो राम हैं। धर्म और साहित्य इसी बिन्दु पर अलग होते
हैं। पहला पक्ष दूसरे के विरुद्ध साक्ष्य लेकर उपस्थित होगा और यह दावा पेश करेगा
कि राम तो आदि और अनंत हैं। राम का ज़िक्र तो वेदों में है, पुराणों में है, उपनिषदों
और अरण्यक में है। वाल्मीकि नहीं होते तो भी राम होते। कबीर नहीं होते तो भी राम
होते। तुलसीदास नहीं होते तो भी राम होते। राम तो भगवान हैं। घट-घट व्यापी हैं,
अविरल और अविनाशी हैं। आस्था तो यही कहती है, किन्तु विवेक विरोध करता है।
गुरुवार, 30 जून 2016
पुतुल : जीवन का प्रतिरूप
कठपुतली! एक व्यंजनामूलक शब्द है— सामान्य-जीवन में
भी, कला-साहित्य में भी। तुलसी-रचित रामचरितमानस के किष्किन्धाकाण्ड में भगवान शिव
अपनी पत्नी पार्वती से कहते हैं, ‘उमा दारु जोषित की
नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई।।’ फ़िल्म 'आनंद' के लिए गुलज़ार इसी भाव को अपने अंदाज़ में संवादबद्ध करते हैं। आनंद अपने
मित्र डॉ. भास्कर से कहता है— “हम सब रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं,
जिनकी डोर उस ऊपर वाले के हाथों में है।” हालांकि गुलज़ार के
इस संवाद से अधिक परिपक्व कथन जॉर्ज बकनर का है, उनके मुताबिक ‘हमलोग महज कठपुतलियाँ हैं, जिनकी डोर अज्ञात शक्तियों के हाथों में है।’ सहज शब्दों में कहें तो हम उन शक्तियों द्वारा नियंत्रित और संचालित हैं, जो हमेशा
नेपथ्य में रहती हैं। यही बात सातवें अखिल भारतीय पुतुल महोत्सव के उद्घाटन अवसर
पर बिना किसी अगर-मगर के कपिला वात्सायन ने कही— “ऐसे या वैसे, चाहे जैसे, हम सब ‘पपेट्स’ हैं।” फिर भी यह प्रश्न तो मन को व्यथित करता ही है कि क्या सचमुच हाड़-मांस का
हमारा यह शरीर भी काठ सरीखा निर्जीव है? और यह भी कि क्या
हम जो कुछ भी करते-सोचते हैं, वह सब महज हमारा भ्रम है? कि हमारी प्रज्ञा, हमारा विवेक, हमारी दृष्टि और दृष्टिकोण, हमारी भावनाएँ—इनका
कोई महत्व नहीं है? कि यह सब कल्पना-मात्र हैं? मानव-अस्तित्व से जुड़े इन भारी-भरकम
प्रश्नों को यदि हल्के में ही लें और इनकी सांकेतिकता को भी सामान्यीकृत कर लें,
फिर भी यह बात कम परेशान करने वाली तो ख़ैर नहीं ही है कि हाड़-मांस से निर्मित, प्रकृति
का सर्वश्रेष्ठ प्राणी भी अन्ततः कठपुतली सरीखा है, जिसकी एक-एक गतिविधि पर किसी अज्ञात कुल-शील शक्ति का नियंत्रण है! इस लिहाज़ से देखें तो कठपुतलियाँ, मनुष्य से अधिक स्वभाविक जान पड़ती हैं; विशेष रूप से तब, जब यह साहित्य और सामान्य जीवन में प्रयुक्त होने वाले
मुहावरे से इतर, रंगमंच पर अवतरित होती हैं।
रविवार, 24 अप्रैल 2016
अक्कड़-बक्कड़ः कथ्य और स्वरूप में विरल उपन्यास
‘अक्कड़-बक्कड़’ है क्या? औपन्यासिक कृति या कोई बाल-क्रीड़ा? रपटन-भरी भाषा में फिसलती-गिरती ज़िन्दगी की शल्यक्रिया या किसी बेशर्म गप्पी
का वायवीय गल्प? यह क्या सचमुच वैसा ही है जैसा कि ‘अस्सी-नब्बे पूरे सौ?’ शैली तो कुछ ऐसी ही है जैसे
कोई बच्चा शब्दों से मगन-भाव खेल रहा हो! लय और लोच के सहारे
भावात्मक रूप से हल्के हिंडोले पर डोल रहा हो! लेकिन ऐसा है
नहीं। पाठ के समय धैर्य और सावधानी ज़रूरी है क्योंकि असावधानी की स्थिति में
रपटने, वाग्जाल में उलझने, शब्दों के कीचड़ में लिथड़ने और लक्ष्यार्थ तक पहुँचने
में बिल्कुल जलालपुरिए की तरह अंततः विफल रहने की पूरी गुंजाइश है। सावधानी और
गंभीरता इसलिए भी कि यह ‘व्यंग्य उपन्यास’ है और बकौल श्रीलाल शुक्ल ‘व्यंग्य लेखन का सम्बंध
सामाजिक स्थिति की मूल्यगत आलोचना से है।’ तो उपन्यास पढ़ते
वक़्त इस सूत्र-वाक्य को दिमाग़ में रखना ज़रूरी है, तभी हम वास्तविक कथ्य और
वातावरण तक पहुँच पाएँगे क्योंकि उपन्यास की भाषा में भी रपटन है। यह आपको नंगलों
की तरह भटका भी सकती है और आप किसी क्षेत्र-विशेष की मरीचिका में उलझ सकते हैं,
कथ्य और वातावरण के ‘भेदाभेद’ को समझने
से चूक सकते हैं।
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