गुरुवार, 23 जनवरी 2014

सोशल मीडिया के साइड इफेक्ट्स

हम भारत के लोग थोड़ा अलग क़िस्म के जीव हैं। चुप हों तो ऐसे कि गूँगा भी ख़ुशफ़हमी पालने लगे। बोलने पर आ जाएँ तो इतना बोलें कि सिर चकराने लगे। सहने की हद तो इतनी कि सदियों तक ग़ुलामी की जंज़ीर को ज़ेवर ही समझते रहे। अत्याचारियों को देवता बनाकर पूजते रहे। ...और अगर विरोध का ख़ब्त सवार हो तो मुद्दे की परवाह किए बग़ैर नारा बुलंद करने लगें। वैसे अभी एक साल पहले तक मुझे भी इस ख़ूबी का इल्म नहीं था। ‘जनलोकपाल’ को लेकर अन्ना आंदोलन के बाद से नौबत ये है कि जनता मौक़ा ढूँढती रहती है। हालांकि 16 दिसंबर 2012 की लोमहर्षक घटना और उसके बाद दिल्ली के जंतर मंतर को तहरीर स्क्वॉयर में तब्दील कर देने वाला उतावलापन, फिर कभी नज़र नहीं आया। लेकिन “मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना” और निर्भया कांड के बाद वाला तख़्ता-पलट जोश, सड़क से सिमटते-सिमटते घर के अंदर पड़े कम्प्यूटर सिस्टम में जज़्ब हो गया। अनुभव की कमी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सनसनी मास्टर्स अर्थात नौटंकीबाज़ एंकर्स और उनकी आक्रामक शैली ने दूर कर दी और तब से सोशल मीडिया, जो पहले अभिव्यक्ति और संवाद-सेतु का काम कर रहा था, क्रांति-केन्द्र के रूप में स्थापित हो गया। शालीनता और संवाद के लिए यहाँ भी स्पेस लगातार सिकुड़ता ही जा रहा है। अब तो हालत ये है कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने भस्मासुर का रूप धारण कर लिया है और दुर्भाग्य ये है कि फिलहाल परिदृश्य से शिव ग़ायब हैं। हाल की कई घटनाओं ने न सिर्फ चौंकाया है, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इसकी आड़ में गुट बनाकर व्यक्ति-विशेष अथवा दल-विशेष के ख़िलाफ़ अथवा पक्ष में जनमत को प्रभावित करने की बढ़ती प्रवृत्ति के चलते नये क़िस्म की सामाजिक चिंता को भी जन्म दे दिया है। यानी कई घटनाओं ने सोशल साइट्स की उपादेयता को तो साबित किया है, लेकिन इसके साइड इफेक्ट्स भी अब सतह पर आने लगे हैं।

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

सबकुछ है धुआँ-धुआँ

कुछ दिनों पहले ख़ालिद जावेद का उपन्यास मौत की किताब पढ़ रहा था। उपन्यास में एक जगह कथा-नायक अपनी ज़िन्दगी के अनुभव को कुछ यूँ बयान करता है- मैं हमेशा एक ऐसी फिल्म देखता रहा, जिसके हर-एक मंज़र से उसका डायलॉग थोड़ा आगे या पीछे होता है। आवाज़ उसके साथ फिट नहीं होती। आवाज़ हर मंज़र को मुँह चिढ़ाती, फिल्म के फ़्रेम में बहती रहती है।1 भारतीय सिनेमा के संदर्भ में यह उक्ति बिल्कुल सटीक बैठती है।

बुधवार, 1 जनवरी 2014

अनफ़ेयर होता सोशल स्फीयर

हम जिस युग में जी रहे हैं, वह अत्याधुनिक सूचना-तकनीकों से लैस है। चिट्ठी-पत्री, लिफाफा-पोस्टकार्ड का ज़माना काफी पीछे छूट गया है। सार्वजनिक टेलीफोन-बूथों की परंपरा भी दम तोड़ने की कगार पर आ पहुँची है। अब गाँवों के लोग भी मोबाइल फोन से ही संवाद-सम्प्रेषण को तरजीह देने लगे हैं। सूचना और मनोरंजन का एकमात्र सहारा दूरदर्शन और उसके लोकप्रिय प्रोग्राम संध्या समाचार और चित्रहार की जवानी को ढले भी अरसा बीत गया। गाँवों में अब अधिकांश घरों की छत पर डीटीएच की छतरी आकाश को मुँह चिढ़ाती है। बिजली की समस्या है, लेकिन कोई बात नहीं। सम्पन्न घरों के पिछवाड़े में जेनसेट पड़ा है। जिन घरों और घरानों के प्रति लक्ष्मी अभी अधिक उदार नहीं हो सकी हैं, वैसे घरों में इनवर्टर, बैट्रा और चार्जिंग उपकरणों ने इस कमी को पूरा कर दिया है। शहरों में तो फिर भी एफएम ने रेडियो की लाज बचा रखी है, लेकिन गाँवों के लोगों ने इसका फिलहाल बायकॉट कर रखा है। केवल दूरदर्शन और डीडी न्यूज़ देखने की बाध्यता ख़त्म हो चुकी है और लोग आराम से मन-मुताबिक ढाई-तीन सौ चैनलों के जंगल में भटकते रहते हैं। कहने की ज़रूरत नहीं कि उदारीकरण की सहेली सूचना-क्रांति ने हमारी परंपरागत जीवन-संस्कृति को बदल दिया है और बदलाव की प्रक्रिया अभी जारी है। गाँव के वैसे युवा जो बमुश्किल दस्तख़त करने की दक्षता रखते हैं, उनके पास भी मोबाइल है। मोबाइल में इंटरनेट है और फेसबुक है।

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

नज़रिए की बात है

संचार क्रांति के बाद मीडिया और बाज़ार का संबंध और प्रगाढ हुआ है। दोनों की गलबहियाँ के साइड इफेक्ट्स ही नहीं, बल्कि फायदों से भी आप बख़ूबी वाक़िफ़ हैं। पहला फ़ायदा तो यही कि हिन्दी रोज़गार की भाषा के रूप में स्थापित हुई। ग्रामीण क्षेत्रों के सुविधा-विहीन छात्रों की मजबूरी और कॉलेज-यूनिवर्सिटी के उपेक्षित विभाग के रूप में चिन्हित एक ऐसी भाषा, जो मेधा के मामले में पिछड़े छात्रों की अंतिम शरण-स्थली हुआ करती थी, अब अँग्रेज़ी स्कूल से पास-आउट छात्रों की भी मजबूरी बन गई। लोग अँग्रेज़ी का तड़का लगाकर ही सही, हिन्दी लिखने और बोलने को बाध्य हुए। ऐसा, लोगों के हिन्दी-भाषा से रागात्मक संबंधों के कारण कम, बाज़ार के दबाव के कारण ज़्यादा हुआ है।

शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

कूप-जल नहीं, भाखा बहता नीर

भारत में भाषा का टंटा नया नहीं है। प्राचीन-काल से उठा-पटक चली आ रही है। देव-भाषा के साथ लोक-भाषा की रस्साकशी के फ़साने बहुत हैं, लेकिन हमें विश्वास है कि आप बेवजह भाषा का इतिहास खंगालने या उसमें होते रहे परिवर्तनों की कथा सुनने के मूड में नहीं होंगे। हमें भी ज़्यादा दिलचस्पी नहीं। लिहाजा भूमिका का क्षेत्रफल कम रहे तो कोई दिक्कत नहीं। हम भाषा पर बात तो करना चाहते हैं, लेकिन हमारे हाथ में शास्त्रीयता का लौहदंड नहीं है। हमारा विमर्श व्याकरण की पटरी पर सरपट दौड़ने का हामी भी नहीं है। भाषा की ज़रूरत और अनिवार्यता को चुनौती देना या व्याकरण के ख़िलाफ़ विद्रोह का झंडा बुलंद करने में भी हमारी कोई दिलचस्पी नहीं है। बल्कि हमारा मक़सद यह पड़ताल है कि क्या वाकई भाषा(भारतीय संदर्भ में) की शुद्धता इतनी अहम है कि उसकी क़ीमत सम्प्रेषण में व्यवधान से चुकाई जाए? क्या समय के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक बदलाव और ज़रूरतों के हिसाब से भाषा में बदलाव नहीं होने चाहिए? माध्यम के अनुरूप भाषा में बदलाव मान्य नहीं होना चाहिए? ऐसे और भी सवाल हैं, जो आप अपनी तरफ से जोड़ सकते हैं।

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

हमारी अर्थी शाही हो नहीं सकती

ये जो टीवी पर अपने चैनल का बूम थामे, बाँहें चढ़ाए, बड़ी-बड़ी बातें करता हुआ शख़्स आपको नज़र आता है। जो तमाम घटनाओं की बारीकियों से आपको रू-ब-रू करवाता है। जो सरकार की नीतियों की धज्जियाँ पूरे आत्म-विश्वास के साथ उड़ाता है। वही, जिसके किसी थाने या दफ़्तर में पहुँचते ही पुलिस और कर्मचारी मुस्तैद नज़र आने लगते हैं, थोड़ी घबराहट के शिकार भी हो जाया करते हैं। जो कभी स्टूडियो में बैठा, किसी राज्य के मंत्री की जिम्मेदारी तय करता दिखता है। जो तमाम छोटी-बड़ी घटनाओं पर एक्सपर्ट कमेंट देने में बिल्कुल भी झिझक महसूस नहीं करता। वही, जो मजदूरों की हड़ताल या बंद के दौरान उनकी समस्याओं की बजाय देश और कम्पनी की अर्थ-व्यवस्था को होने वाले नुकसान को लेकर ज्यादा चिंतित नज़र आता है। जो बंद के दौरान स्टूडियो में बैठे रहने के बावजूद यात्रियों से ज़्यादा परेशानी महसूस करता है और बंद का आह्वान करने वालों को कठघरे में खड़ा करता है। जो सड़कों पर बरसात के मौसम में होने वाले वक़्ती जल-जमाव को भी सरकार के निकम्मेपन की निशानी क़रार देता है। जो राजनीति से लेकर विदेश नीति और क्रिकेट से लेकर केट विंसलेट तक के बारे में तमाम छोटी-बड़ी जानकारी रखता है।

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

वीरा हार को अभिशप्त है, क्यों?

फिल्मों के बारे में अक्सर कहा जाता है कि होती तो दो-ढाई घंटों की हैं, मगर कई फिल्मों का असर सदियों तक बना रहता है। अभी तो उम्र के चौथे दशक की सीमा में प्रवेश मिला है। सदियाँ देखी नहीं है। लेकिन हां, बात बेमानी नहीं। आज़ादी के बाद भारतीय सिनेमा ने कई रंग देखे। फिल्मों के कई दौर आए-गए, नायक-महानायक हुए। फिल्म निर्माण इंडस्ट्री स्टैबलिश हुई और अब तो हालत ये है कि सालाना सैंकड़ों की तादाद में फिल्में बनती हैं, रिलीज होती हैं। लोग देखते-सराहते भी हैं। हमें लगता है कि साहित्य में जितनी धाराएं और आंदोलन हुए हैं। फिल्मों में भी ऐसे ही वर्गीकरण हैं।

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