शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

विरासत की बेदखली, --विश्वनाथ त्रिपाठी



यह चाहे जितना भी खेदजनक हो, लेकिन यह कहने का समय आ गया है कि कम से कम कथा साहित्य में, हिन्दी में लिखने वाले मुसलमान लेखकों को वह स्थान नहीं मिला जिसके वह हक़दार थे या हैं। मैं जान-बूझकर पुरस्कार या सम्मान की बात नहीं करना चाहता, क्योंकि यह कोई मानदंड नहीं है। लेकिन उपेक्षा हुई है। इसके क्या कारण रहे हैं, उसकी पड़ताल या छानबीन का यह अवसर नहीं है। लेकिन उपन्यास पर बात करते समय मैं इस तथ्य की तरफ इशारा जरूरी समझता हूँ। बहुत दिनों से यह सवाल मेरे मन में बना हुआ है और इसका कोई स्पष्ट कारण मुझे समझ में नहीं आता। सामान्यतः हिन्दी साहित्य का जो माहौल है, वह बिल्कुल साम्प्रदायिक नहीं है, बल्कि यह सम्प्रदाय विरोधी है। फिर भी ऐसा क्यों होता है या हो रहा है? यह मैं नहीं जानता।

रविवार, 14 अप्रैल 2013

राख की भाषा

ख़ालिद ए. खान
यूँ ही आई तुम
हमेशा की तर

वा में उड़ते पीले ज़र्द
खु़श्क पत्ते की तरह
अनायास!
होठों पर वही
बेतरतीब सी ठहरी हँसी
कुछ दरकी हुई 
नामालूम सी उलझी आँखें!


बुधवार, 10 अप्रैल 2013

मौत की किताब (उपन्यास का अंश)


ख़ालिद जावेद

मैं जल्लाद के पीछे-पीछे चल रहा हूँ। क्या मुझे झूलते हुए रस्सी के फन्दे की तरफ़ ले जाया जा रहा है? इन सब के वज़नी बूट मेरे आगे मार्च कर रहे हैं। मैं रात भर जागा हूँ। अभी तो नींद आई थी कि रुख़्सत का वक़्त आ पहुँचा। मैं एक बार फिर सुबह की नींद के खि़लाफ़ चल रहा हूँ। अपने काहिल और ढीले हाथ-पैरों से मैं नींद के ख़िलाफ़ एक बयानिया फिर लिख रहा हूँ। आज सारे इक़बाले जुर्म और चश्मदीद गवाह पूरे हो गए।

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