‘अक्कड़-बक्कड़’ है क्या? औपन्यासिक कृति या कोई बाल-क्रीड़ा? रपटन-भरी भाषा में फिसलती-गिरती ज़िन्दगी की शल्यक्रिया या किसी बेशर्म गप्पी
का वायवीय गल्प? यह क्या सचमुच वैसा ही है जैसा कि ‘अस्सी-नब्बे पूरे सौ?’ शैली तो कुछ ऐसी ही है जैसे
कोई बच्चा शब्दों से मगन-भाव खेल रहा हो! लय और लोच के सहारे
भावात्मक रूप से हल्के हिंडोले पर डोल रहा हो! लेकिन ऐसा है
नहीं। पाठ के समय धैर्य और सावधानी ज़रूरी है क्योंकि असावधानी की स्थिति में
रपटने, वाग्जाल में उलझने, शब्दों के कीचड़ में लिथड़ने और लक्ष्यार्थ तक पहुँचने
में बिल्कुल जलालपुरिए की तरह अंततः विफल रहने की पूरी गुंजाइश है। सावधानी और
गंभीरता इसलिए भी कि यह ‘व्यंग्य उपन्यास’ है और बकौल श्रीलाल शुक्ल ‘व्यंग्य लेखन का सम्बंध
सामाजिक स्थिति की मूल्यगत आलोचना से है।’ तो उपन्यास पढ़ते
वक़्त इस सूत्र-वाक्य को दिमाग़ में रखना ज़रूरी है, तभी हम वास्तविक कथ्य और
वातावरण तक पहुँच पाएँगे क्योंकि उपन्यास की भाषा में भी रपटन है। यह आपको नंगलों
की तरह भटका भी सकती है और आप किसी क्षेत्र-विशेष की मरीचिका में उलझ सकते हैं,
कथ्य और वातावरण के ‘भेदाभेद’ को समझने
से चूक सकते हैं।
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रविवार, 24 अप्रैल 2016
रविवार, 27 दिसंबर 2015
अधूरे जीवन का पूरा कोलाज
उपन्यास
का नाम है- ‘चिरकुट’ और इत्तेफ़ाक़ देखिए कि
शीर्षक को छोड़, उपन्यास में कहीं और ये शब्द इस्तेमाल नहीं किया गया। लिहाजा मन
में उठा यह सवाल वाजिब था कि आख़िर क्यों हितेन्द्र पटेल ने अपने उपन्यास का नाम ‘चिरकुट’ रखा? क्या इसलिए कि वो जिस
सांस्कृतिक समाज का अंग रहे हैं, उसमें यह शब्द आमफ़हम है? या कि कथा-नायक अथवा कथा में
विन्यस्त घटनाएँ, प्रवृत्तियाँ और जीवन-दशाएँ ऐसी हैं, जो अपनी समग्रता में ‘चिरकुट’ शब्द के अर्थ एवं अभिप्राय को
भाव-गम्य बनाती हैं? जब
ये सवाल मेरे मन को मथने लगा तो हमने शब्दकोश की मदद ली। पता चला कि ‘चिरकुट’ शब्द दरअसल दो शब्दों के बड़े
टुकड़ों का योग है। अर्थात चिरना+कुटना=चिरकुट(यहाँ ‘ना’ नियत है)। शाब्दिक अर्थों में
फटा-पुराना कपड़ा, चिथड़ा, कपड़े का छोटा सा टुकड़ा। लेकिन मन संतुष्ट नहीं हुआ
क्योंकि साहित्य महज शब्द और उसके रूढ़ अर्थों से निर्देशित नहीं होता, बल्कि इसका
नियंता, ‘भाव’ होता है। ‘चिरकुट’ शब्द से जो भाव ध्वनित होता
है, वह उसके शब्दकोशीय अर्थ से साम्य नहीं रखता। ऐसे में ‘चिरकुट’ शब्द का वास्तविक अर्थ जानने
के लिए ‘लोक’ में जाना होगा और वहाँ से ‘चिरकुट’ शब्द का वाजिब अर्थ ग्रहण करना
होगा। गाँव-मोहल्ले में वैसा व्यक्ति ‘चिरकुट’ कहलाता है, जो छोटी-छोटी
बेवकूफ़ियाँ, चालाकियाँ, होशियारियाँ या साजिशें करता है और ऐसे कृत्यों से उसका
कोई ख़ास भला तो होता नहीं, उल्टे वह लोगों की नज़र में आ जाता है। या फिर वैसा
व्यक्ति ‘चिरकुट’ कहलाता है, जो समाज में
गरिष्ठ और निम्न अथवा हेय समझे जाने वाले क्रिया-व्यापारों में लिप्त रहता है।
कभी-कभार हम व्यक्ति से इतर किसी काम को भी ‘चिरकुट’ शब्द से अभिहित करते हैं।
मसलन- ‘अरे
यार! एक
चिरकुट से काम के लिए तुम इतने परेशान क्यों हो? ये तो बस यूँ चुटकी बजाते ही हो जाएगा।’ ख़ैर, इस माथापच्ची के बाद ‘चिरकुट’ को लेकर मेरी सामान्य
जिज्ञासा तो संतुष्ट हो गई है, लेकिन अब भी मेरी कथित बौद्धिक-दृष्टि इस बात को
लेकर पशोपेश में है और ज़िद ठाने बैठी है कि उपन्यासकार ने यहाँ ‘चिरकुट’ शब्द का इस्तेमाल महज इसलिए
नहीं किया है कि इसका अर्थ लोग सहज ही लगा लेंगे, बल्कि वह इसके माध्यम से कुछ और
ही कहना चाहता है। तो क्या ‘चिरकुट’ शब्द का निहितार्थ जीवन-जगत
से जुड़ी वैसी छोटी-छोटी घटनाएँ और व्यवहार-विचार सरणियाँ हैं, जिनके बग़ैर जीवन
संभव नहीं है, फिर भी उनका लेखा रखने की ज़रूरत इतिहास महसूस नहीं करता? मेरे संशय को तब और बल मिलता
है, जब रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं कि ‘संसार
में मनुष्य-जीवन संबंधी बहुत सी ऐसी-ऐसी बातें नित्य होती रहती हैं, जिनका इतिहास
लेखा नहीं रख सकता, पर जो बड़े महत्व की होती हैं। व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन,
इन्हीं छोटी-छोटी घटनाओं का जोड़ है। पर बड़े से बड़े इतिहास और बड़े से बड़े
जीवन-चरित्र में भी इन घटनाओं का समावेश नहीं हो सकता।’(रामचन्द्र शुक्ल,
चिन्तामणि-3, प्र.सं. 1983, पृ.सं.102) अपने इसी निबंध(उपन्यास) में वो फिर लिखते
हैं कि ‘मानव
जीवन के अनेक रूपों का परिचय कराना उपन्यास का काम है। यह उन सूक्ष्म से सूक्ष्म घटनाओं
को प्रत्यक्ष करने का यत्न करता है, जिनसे मनुष्य का जीवन बनता है और जो इतिहास
आदि की पहुँच के बाहर हैं।’(वही,
पृ.सं.102) यहीं पर यह राज़ भी फ़ाश होता है कि आख़िर हितेन्द्र पटेल जैसा
इतिहासकार अपनी अभिव्यक्ति के लिए साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण विधा ‘उपन्यास’ को क्यों चुनता है? और यही मेरे उस सवाल का भी
जवाब है कि आख़िर उपन्यास का शीर्षक ‘चिरकुट’ क्यों रखा गया?
रविवार, 16 अगस्त 2015
मीडिया मंडप में चिकित्सक से मुलाकात
हमारे एक मित्र हैं। पेशे से चिकित्सक
हैं। एक दिन बातचीत हो रही थी। बातचीत के दौरान उन्होंने शिकायत की। उनकी शिकायत
थी कि पत्रकार बेलगाम हो रहे हैं। मैंने उनका वाक्य सुधारा, 'पत्रकार
नहीं मीडिया बेलगाम हो रहा है।' मित्र ने दलील दी, 'दोनों
एक ही बात है। मीडिया अपने-आप में कोई ऐक्टिंग अथॉरिटी नहीं है।'
मैंने विरोध किया, 'यह कोई तर्क नहीं है।' उसने उदाहरण पेश करते हुए कहा, 'मान
लो कार से कोई दुर्घटना होती है तो इसका मतलब यह तो नहीं कि कार को दोषी ठहराया
जाए! बल्कि किसी से भी पूछो तो वह यही कहेगा कि ड्राइवर की बदमाशी
या लापरवाही के कारण हादसा हुआ। यानी दुर्घटना की स्थिति में कार नहीं ड्राइवर
दोषी होता है। इस लिहाज़ से अगर मीडिया बेलगाम है तो साफ है कि मीडियाकर्मी बेलगाम
हैं।' मैंने कहा, ‘इसका मतलब आप की निगाह में मीडियाकर्मी
ही मीडिया का निर्देशक है?’ मित्र ने मुस्कराते हुए कहा, 'बिल्कुल।' मैंने थोड़ा तुनकने वाले अंदाज़ में
कहा, 'जी नहीं। मीडिया कोई कार नहीं है, और न ही कोई मीडियाकर्मी ही
ड्राइवर है। यह आपकी निजी सोच है।' मित्र मानने को तैयार नहीं हुए।
उन्होंने आरोप लगाया, 'तुम मीडिया में काम कर चुके हो इसलिए अपनी बिरादरी की असलियत
छुपाने की कोशिश कर रहे हो।' मुझे बुरा लगा। मैंने विरोध जताया, 'ऐसा
बिल्कुल भी नहीं है। मैं मीडियाकर्मी रहा हूँ इसलिए जानता हूँ कि मीडिया और
मीडियाकर्मी दोनों पर्यायवाची नहीं हैं। दोनों में बहुत फ़र्क़ है।'
मित्र ने निर्णयात्मक स्वर में कहा, 'क्या तुम इस बात से भी इनकार करोगे कि
मीडियाकर्मी ही मीडिया रूपी भवन के निर्माण के लिए ईंटें तैयार करते हैं?'
मैंने दृढ़ता का प्रदर्शन किया, 'हाँ, बिल्कुल करूँगा क्योंकि मैं जानता
हूँ कि मीडियाकर्मी मीडिया रूपी भवन के लिए ईंटों का निर्माण नहीं करते बल्कि वे
स्वयं ईंट के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं।' मित्र ने ज़ोरदार ठहाका लगाया, 'अच्छा
मज़ाक है।'
मंगलवार, 21 जुलाई 2015
न वो समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात
“या
रब, न वो समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात। दे और दिल उनको, जो न दे मुझको ज़ुबाँ
और।।” अब या
तो इस शेर को उसकी तात्पर्य-वृत्ति के अनुकूल समझा जाए और तीखे व्यंग्य की दाद दी
जाए। या फिर यूँ हो कि ग़ालिब को इस हेकड़ी के लिए ख़ूब खरीखोटी सुनाई जाए- “अमाँ मियाँ ये ग़ालिब भी न,
बड़े ख़ब्ती क़िस्म के शायर थे। चले न जाने आँगन टेढ़ा। ख़ुद तो सीधी-सादी बात को
बेवजह घुमा-फिरा कर कहते हैं और इल्ज़ाम पाठक पर मँढ़ते हैं।” मतलब यह कि जो भी बात समझ में
न आए, वो बकवास है। अच्छा है कि ग़ालिब हमारे ज़माने में न हुए, वरना अपना सिर पीट
लेते। वैसे ग़ालिब के ज़माने में आज जैसे क़द्रदान भी न हुए, वरना वो ‘दीवान’ क्या खाकर लिखते! ख़ैर, ग़ालिब का ये शेर हमेशा
मेरी ज़ुबान पर कुछ इस अंदाज़ में होता है, जैसे बाँध तोड़ने पर उतारू कोई उफनती
हुई नदी। मुश्किल ये कि बार-बार दुहराऊँ तो ‘ख़ब्ती’ कहे जाने का डर है। और ज़ुबाँ
पर काबू रखूँ तो बेचारा दिल रुआँसा हुआ जाता है। दिमाग़ है कि ढाढ़स बँधाने की
बजाय दिल को कोंचने में ज़्यादा मज़ा पाता है। कभी-कभी खीझ इतनी ज़्यादा बढ़ जाती
है कि सिर के बाल नोंचने लगता हूँ। कई बार तो तन्हाई में ख़ुद को तमाचा भी जड़
चुका हूँ। लेकिन कोई फ़ायदा नहीं!
दिल-दिमाग भारतीय लोकतंत्र के दो दलों की तरह बर्ताव करने से परहेज़ बरतने को तैयार
ही नहीं होते! दिल
और दिमाग की नूरा-कुश्ती थमती ही नहीं!
समझौते की तमाम कोशिशें नाकाम। समझ में नहीं आता, क्या करूँ? कई बार सोचा कि दिल-दिमाग के
झमेले में जिस्म को ही तकलीफ़ क्यों हो?
लेकिन जिस्म ‘ऑथोरिटी’ नहीं
है। ये ‘पॉवर’ तो दिमाग के ही पास है। दिल
उसी ‘पॉवर’ में हिस्सेदारी चाहता है।
इसलिए बात-बेबात हस्तक्षेप करता रहता है। वैसे दिल की बात भी वाजिब है। जिस भाषा
को लोग समझते ही नहीं, उस भाषा में कुछ कहने की ज़रूरत क्या है? लेकिन दिमाग़ है कि ज़िद ठाने
बैठा है! कहता
है- “अभिव्यक्ति
के अनुकूल भाषा तो होनी ही चाहिए। जो लोग अभिधा-व्यंजना में फ़र्क़ नहीं कर सकते,
उनके लिए हलकान होने की ज़रूरत नहीं है।”
शनिवार, 11 जुलाई 2015
मालिकों का बोझ ढोता मीडिया
दो विवाद और चार मीडिया समूह। पहला विवाद ‘इंडियाज़ डॉटर’ डॉक्यूमेंट्री से जुड़ा है तो दूसरे का रिश्ता ‘वक़्त ने किया क्या हसीं सितम’ धारावाहिक से है। प्रत्यक्ष रूप से जो प्रदर्शित
किया गया, वह यह था कि विवाद का सम्बंध ‘इंडियाज़
डॉटर’ और ‘वक़्त ने किया क्या हसीं सितम’ के कंटेंट से है। दोनों ही मामलों में ‘राष्ट्र की छवि’ और ‘राष्ट्रवाद’ की आड़ लेकर प्रतिस्पर्धी मीडिया समूहों ने
अपने-अपने क्षुद्र हितों का पोषण करने की नापाक़ कोशिश की। नतीज़ा क्या निकला? हम-आप से छुपा नहीं है। टाइम्स और एनडीटीवी समूह
के बीच व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा की चरम परिणति केन्द्र सरकार के उस बचकाना फैसले
में हुई, जिसकी वैश्विक स्तर पर आलोचना हुई। जिन्हें डॉक्यूमेंट्री में दिलचस्पी
नहीं भी हो सकती थी, वैसे लोगों ने भी प्रतिबंध के कारण उत्सुकता के अतिरेक में
देख लिया और एनडीटीवी ने तो डॉक्यूमेंट्री के लिए निश्चित प्रसारण समय पर अपना
स्क्रीन भी ब्लैक रखा। टाइम्स नाउ पर अर्णब गोस्वामी ने दावा किया कि ‘इंडियाज़ डॉटर’ वास्तव में भारत की छवि धूमिल करने वाला वृत्तचित्र
है, जबकि देश के बहुसंख्यक बुद्धिजीवी तबके की सोच इसके विपरीत थी। जनसत्ता के
संपादक ओम थानवी की प्रतिक्रिया थी कि “जिस
किसी ने बीबीसी की डॉक्युमेंट्री 'इंडियाज़
डॉटर' देख ली है, उसने बड़ी सहजता से इस बलात्कार-विरोधी फिल्म को
भारत में प्रतिबंधित करवाने वाली मानसिकता और अभिव्यक्ति का गला घोंटकर दुनिया भर
में भारत की नाक कटवाने वाली बुद्धि पर तरस ही खाया होगा।” बहरहाल यह एपिसोड अब लगभग ख़त्म हो चुका है और
अगर मैं ग़लत नहीं हूँ तो हममें से ज़्यादातर लोग इसको भूल भी चुके हैं!
शुक्रवार, 20 मार्च 2015
उपभोक्तावाद की असंसदीय मुहिम
‘समझ’ का उम्र से रिश्ता है भी और
नहीं भी है। वैसे ही जैसे उम्र और ज़िन्दगी के गुज़रने में फ़र्क़ होता है। हम जिस
मुल्क में रहते हैं, वहाँ बड़ी आबादी की सिर्फ़ उम्र गुज़रती है, ज़िन्दगी नहीं।
इसके विपरीत एक तबका ऐसा भी है, जिसकी
ज़िन्दगी तो गुज़रती है, लेकिन
उम्र है कि साठ में भी छब्बीसवें बसंत का मुखौटा चस्पाँ किए इतराती फिरती है। जलने
वाले जलते हैं तो जलें, उनकी
बला से! अतः उम्र का सम्बंध ज़िन्दगी से है भी और नहीं भी। आदर्श स्थिति तो यही है
कि दोनों अन्योन्याश्रित हों!
किन्तु ऐसा विरले ही हो पाता है क्योंकि उम्र का सम्बंध प्रकृति से है और ज़िन्दगी
का भौतिक संसाधनों, लालसा और आत्मिक उल्लास से। भौतिक कारक अधिक अहमियत रखते हैं।
अतः त्याग से आत्मिक उल्लास की प्राप्ति का मार्ग विकट भी है और संदिग्ध भी,
क्योंकि लालसा मनुष्य की अनिवार्य दुर्गुण है। कबीर ने सही पहचाना था- “माया महा ठगनी हम जानी/तिरगुन
फांस लिए कर डोले/बोले मधुरे बानी।”
रविवार, 8 मार्च 2015
‘डार्क रीऐलिटी’ के चितेरे हैं मधुर
20वीं
सदी के अंतिम दशक में हिन्दुस्तान में जो कुछ घटित हुआ, उसने कम-अज़-कम बौद्धिक
जगत में कुछ ऐसे पारिभाषिक शब्द प्रचलित किए, जो अब तक हमारे लिए बिल्कुल अनजान
थे। ‘भूमंडलीकरण’ और ‘उदारीकरण’ को बतौर उदाहरण प्रस्तुत किया
जा सकता है। जिन ग्रामीण बालाओं को ‘बर्फ़
का गोला’ भी
कभी-कभार ही नसीब हो पाता था, उन्हें रूप बदलकर गाँव पहुँचा बॉलीवुड का नायक, कुएँ
से ‘कोका
कोला’
निकाल-कर पीने-पिलाने लगा। ‘याराँ
दा टशन’ का
वो दौर अब भी जारी है। ‘डीटीएच’ ने शहरी मध्य-वर्गीय स्त्रियों
की ठसक और ऐंठ के साथ ही रुतबे पर भी बुरा असर डाला है। गर्मी की छुट्टियाँ बिताने
या तीज-त्यौहार पर गाँव जाने वाली इन विदुषियों का प्रभामंडल छिन्न-भिन्न हो चुका
है। अब न तो इनकी पहले-सी आवभगत होती है और न ही कोई ‘सास भी कभी बहू थी’ की अकथ-कथा सुनने के लिए
ख़ुशामदी अंदाज़ में इनके आगे-पीछे ही करती हैं। और तो और दूरदर्शन पर शुक्रवार के
दिन आनेवाली फिल्मों का क्रेज़ भी खत्म हो चुका है। मार्शल मैक्लूहान के ‘ग्लोबल विलेज़’ का ‘ग्लोबल’ बेचारा कब-का ‘ग्लोकल’ द्वारा अपदस्थ किया जा चुका
है। फिल्मों का नायक तो पहले ही बदल चुका था, अब तो कथानक भी बदल गया है। कुछ
रामगोपाल वर्मा टाईप हो गए हैं तो कुछ ने ख़ुद को कपिल और राजू श्रीवास्तव की
श्रेणी में फिट कर लिया है। फिल्मों में ‘भूतिया
दौर’ भले
ही ढंग से कभी आ नहीं पाया हो, लेकिन टीवी सोप्स ने बॉलीवुड की इस कमज़ोरी को अपने
अथक-परिश्रम से ढंक लिया है। भगवान कृष्ण ने बड़ा होने से मना कर दिया है और अब तो
गणेश की भी उम्र नहीं बढ़ती क्योंकि दोनों का बाल-रूप ही बच्चों को अट्रैक्ट करता
है। हाँ, एक महादेव हैं, जिन्हें अब तक बच्चा बनने का सौभाग्य नहीं मिला है। ‘हनुमान’ और ‘मूसकराज’ जैसे इनके सहयोगियों को भी
अच्छा-ख़ासा ‘फुटेज’ मिलने लगा है। नगरीय सभ्यता
के कामकाजी-जीवन और परिवार के विघटन से जो धार्मिक और पौराणिक गैप पैदा हुआ था,
उसे टीवी ने बख़ूबी भर दिया है। दिन-रात खट-खटकर बेहाल लोगों की सेहत का ख़्याल
रखते हुए धर्म-दर्शन का पुण्य-लाभ भी वाया टीवी अथवा सिनेमा, घर बैठे ही प्राप्त किया
जा सकता है।
शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015
केवल दो नर ना अघाते थे
10-12
साल पहले की एक घटना है। घटना का मीडिया से कोई सम्बंध नहीं है। तब हमारे गांव में
कुल पाँच ही दुकानें हुआ करती थीं। उनमें से भी केवल तीन ही लोकतांत्रिक थीं
अर्थात ऐसी दुकानें जहाँ प्रत्येक वर्ग-समुदाय और स्वभाव के लोग बिना किसी
दुराव-छिपाव के आ-जा सकते थे। शेष दो दुकानों पर वही लोग आते-जाते थे, जिन्हें
ताड़ी-दारू की तलब हुआ करती थी। मैं जिस घटना का ज़िक्र करने वाला हूँ, उसका
सम्बंध शेष दो दुकानों में से किसी एक से है!
घटना का मुख्य पात्र इनरदेव मंडल है। हमारे गाँव के ही एक मुहल्ले का निवासी। जो
बस-खलासी का काम करता था।
स्वभाव का दबंग तो था ही उसको अपनी ताक़त का घमंड भी था। इसलिए गाँव के
बड़े-बुज़ुर्ग कभी भी उसको यह समझाने का जोख़िम नहीं उठा पाए कि ‘भई ताड़ी-दारू नहीं पीते। सेहत
ख़राब होती है।’ हमउम्रों
में कभी इतनी हिम्मत हुई नहीं कि कोई उसके साथ तू-तड़ाक कर सके। नशेड़ी भले हो
लेकिन वह शील का बिल्कुल पक्का-सच्चा था। शोहदों से उसकी पुरानी दुश्मनी थी। अगर किसी
बंदे से ऊँच-नीच हो गई और इनरदेव को पता चल गया तो फिर उस बंदे की हड्डी
टूटे-न-टूटे, दो-तीन दिन के लिए खाट पकड़ना तो तय ही था। लेकिन उस शाम इनरदेव जमकर
पीने के बावजूद नशे में नहीं था। उसके अंदर का दबंग भी पस्त पड़ा हुआ था और उसकी
अकड़ न जाने कहाँ ग़ायब हो गई थी। वह सिर झुकाए शर्मिंदा सा पान की गुमटी से पीठ
टिकाए खड़ा था। हाँ, उसकी बहन ज़रूर ग़ुस्से में थी और अपने भाई के कथित दोस्त को
लानत-मलामत भेज रही थी। सामने वाला बंदा भी शर्मिंदा था और बार-बार यही सफ़ाई पेश
कर रहा था कि ‘यार
मुझे नहीं पता था कि ये तेरी ही बहन है।’
बात दरअसल ये थी कि इनरदेव को उसके दोस्त ने पार्टी दी थी। उसका दोस्त भी बस
स्टैंड में ही काम करता था। होगी ख़ुशी की कोई बात! ...तो दोनों ने पहले पासीखाने में चखने के साथ
ताड़ी का लुत्फ़ उठाया और फिर झूमते हुए पान खाने आ पहुँचे। पनवाड़ी जिस वक़्त पान
लगा रहा था और ये दोनों सुरूर में झूम रहे थे, ठीक उसी वक़्त इनरदेव की बहन दुकान
से सौदा ले घर लौट रही थी। जब वह पान की गुमटी के पास से गुजर रही थी तभी इनरदेव
के मित्र की निगाह उस पर पड़ी और उसने एक भद्दा सा फ़िकरा कस दिया। लड़की ने पहले
तो उस व्यक्ति के कुल-ख़ानदान की शान में क़सीदे पढ़े। फिर भाई को भी लताड़ दिया।
कोई और मौक़ा होता तो इनरदेव अब तक उस व्यक्ति की हड्डियाँ चटखा चुका होता। किन्तु
आज ख़ुद उसकी बहन पर फ़िकरा कसा गया था और वह था कि सिर झुकाए मौन खड़ा था। वह
अपने दोस्त की सफ़ाई के जवाब में बार-बार दाँत पीसते हुए धीमी आवाज़ में एक ही बात
दुहरा रहा था- ‘चुपचाप
चल जाओ। ताड़ी पिला के नाक काट लिया। भाग जाओ!’
इनरदेव ने अपने मित्र के पैसे की ताड़ी पी थी, इसलिए उसके हाथ शिथिल पड़ गए।
इनरदेव ने अपने मित्र के पैसे का चखना चखा था, इसलिए उसकी ज़ुबान क्रोध के अतिरेक
के बावजूद अपशब्द निकाल पाने में स्वयं को असहज महसूस कर रही थी। दूसरों की
माँ-बहनों की बेइज़्ज़ती बर्दाश्त नहीं कर पाने वाला इनरदेव आज स्वयं अपनी बहन के
क्रोध में भागीदार नहीं बन पा रहा था। आप चाहें तो इन तीन पात्रों को प्रतीकात्मक
मान सकते हैं। इनरदेव को मीडिया, इनरदेव की बहन को जनता और इनरदेव के मित्र को
पूँजी के रूप में यदि देखें तो वर्तमान मीडिया का वास्तविक चित्र और चरित्र उद्घाटित
हो सकता है। लेकिन यह इनरदेव के साथ अन्याय होगा! इनरदेव को तो अपनी भूल पर पछतावा था। लेकिन
मीडिया इसको भूल नहीं बल्कि अपना कौशल मानता है। वह चखना और ताड़ी को इंज्वॉय कर
रहा है। पूँजी द्वारा जनता के साथ भद्दा मज़ाक उसके लिए शर्म या आक्रोश का विषय
नहीं है।
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