(हरिगंधा के अप्रेैल-मई 2014 में प्रकाशित लघुकथा)
महारथी.., तुमने तो कमाल कर दिया!
वातावरण से कटु सवालों के तमाम कीटाणु तुमने पलक झपकते ही साफ कर दिए। हमारे
चिंताओं का पूर्णतः लोप हो गया है। अब कहीं से भी विरोधी स्वर सुनाई नहीं देते।
प्रजा वत्सल, यह सब तो आपकी बौद्धिक सोच
और मार्गदर्शन का ही परिणाम है। हमने तो केवल उसका पालन किया है।
नहीं-नहीं महारथी.., तुम तो
हमारे सबसे योग्य दरबारी हो। तुम से पहले, मैंने कई दरबारियों को
प्रजा के मस्तिष्क को साफ करने का निर्देश दिया था। लेकिन वे असफल रहे। प्रजा उन
सवालों का ज़ोर-ज़ोर से जाप करने लगी थी। लेकिन अब देखो, बिल्कुल
शांति है।
