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शुक्रवार, 20 मार्च 2015

उपभोक्तावाद की असंसदीय मुहिम

समझ का उम्र से रिश्ता है भी और नहीं भी है। वैसे ही जैसे उम्र और ज़िन्दगी के गुज़रने में फ़र्क़ होता है। हम जिस मुल्क में रहते हैं, वहाँ बड़ी आबादी की सिर्फ़ उम्र गुज़रती है, ज़िन्दगी नहीं। इसके विपरीत एक तबका ऐसा भी है, जिसकी ज़िन्दगी तो गुज़रती है, लेकिन उम्र है कि साठ में भी छब्बीसवें बसंत का मुखौटा चस्पाँ किए इतराती फिरती है। जलने वाले जलते हैं तो जलें, उनकी बला से! अतः उम्र का सम्बंध ज़िन्दगी से है भी और नहीं भी। आदर्श स्थिति तो यही है कि दोनों अन्योन्याश्रित हों! किन्तु ऐसा विरले ही हो पाता है क्योंकि उम्र का सम्बंध प्रकृति से है और ज़िन्दगी का भौतिक संसाधनों, लालसा और आत्मिक उल्लास से। भौतिक कारक अधिक अहमियत रखते हैं। अतः त्याग से आत्मिक उल्लास की प्राप्ति का मार्ग विकट भी है और संदिग्ध भी, क्योंकि लालसा मनुष्य की अनिवार्य दुर्गुण है। कबीर ने सही पहचाना था- माया महा ठगनी हम जानी/तिरगुन फांस लिए कर डोले/बोले मधुरे बानी।

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