शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

बूँदों का तिलिस्म


उमस और ऊब का माहौल 
मन को कोंचते... 
ख़्वाहिस को बढ़ाते... 
बिल्कुल प्यास की तरह
जबकि नल की टोटी 
चिढ़ाती रहती !
बूंद-बूंद पानी टपका कर...
हाथों की अंजुरी बना कर 
ऊँकड़ूं बैठा, आगे को झुका...

नल की टोटी को देखना 
और अंजुरी में पानी जमा होने की प्रक्रिया! 
बड़ा ही अजीब भ्रम पैदा करती है 
धैर्य के साथ इंतज़ार करता हूँ 
लेकिन... अंजुरी भरती नहीं 
नल से अनवरत् पानी का टपकना
पानी होने का संकेत तो करती है
लेकिन... अंजुरी भरती नहीं
उंगलियों के बीच की खाली जगह
(जो पता नहीं कैसे बची रह गई है!)
बूँदों को इकट्ठा नहीं होने देती
टोटी से छूटते ही हाथ में आती तो है
एक बूँद...
लेकिन दूसरी के टपकने से पहले ही
हाथ से टपक पड़ती है नीचे(?)
झुंझलाना गैरवाजिब लगता है
लेकिन सच कह रहा हूँ...
अंजुरी भरती नहीं!
पता नहीं, लोग कैसे कहते हैं
बूँद-बूँद समुद्र बनता है
यहां तो हाथ भींगते हैं 
ज़ुबान और गला सूखता ही जाता है...

17 टिप्‍पणियां:

  1. पता नहीं, लोग कैसे कहते हैं
    “बूँद-बूँद समुद्र बनता है”
    यहां तो हाथ भींगते हैं
    ज़ुबान और गला सूखता ही जाता है...

    क्या बात है .... बहुत खूब ....

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  2. Many thanks for sharing this sensually rich poem...I liked the way to dwelt with an humane them...waise kavita,kavita hi ho sakti hai...Atul

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  3. अंतिम पंक्तियों पर जाकर ही सार समझ आया...अंतिम दोनों ही पंक्तियां बेहद खूबसूरत थीं...लेकिन मुझे ऐसा लगता है...कि तुमने एक बार लिखने के बाद इसको दोबारा पढ़ा नहीं...गुंजाइशें बाकी हैं...

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  4. कविता जल की और यथार्थ जीवन का...बढ़िया प्रस्तुति ...

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  5. पता नहीं, लोग कैसे कहते हैं
    “बूँद-बूँद समुद्र बनता है”
    यहां तो हाथ भींगते हैं
    ज़ुबान और गला सूखता ही जाता है...
    Bahut umda Akbar bahi Achchi nazm likhi aapne ekdam sach

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  6. पता नहीं, लोग कैसे कहते हैं
    “बूँद-बूँद समुद्र बनता है”
    यहां तो हाथ भींगते हैं
    ज़ुबान और गला सूखता ही जाता है... bahut badhiyaa .... manviya samvednao se bhari

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  7. Anteem 4 Panktiyan bahut achhi lagi....
    achhi kavita k liye badhai... :)

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  8. Bahut achhe Akbar. Upmaon ke prayog aur jaari rakhna, taaki har nai kavita ka rang aur teekha hota rahe. Noor Zahir

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  9. एक प्रचलित कहावत को ऐसे खंडित किया की सोचने पर मजबूर हो जाए हर कविता का पाठक .....उम्दा !

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  10. प्रक्रिया का अनवरत चलना...एक तरफ संघर्ष...दूसरी तरफ धैर्य की माँग...दोनों का समानांतर पटरी पर चलते रहना...और बूंद के माध्यम से खुद की तफ्तीश और खुद का मंझना..बहुत सुन्दर कविता अकबर जी बधाई

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  11. बहुत खूब । कई सारी सरकारी योजनाएँ इस टोटीकी तरह हों, यह देश के लिये एक अभिशाप है, लेकिन उसीको मिटानेका प्रयास करने में सार्थकता है।

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  12. बहुत ही अच्छा प्रयास है भाई ...किस तरह से एक एक संभावनाए हमारे पास आकर भी हमें एकदम खाली रह जाना पड़ता है ...तमाम प्रयास व उमीदें निर्थक सी लगने लगती है ....... कैसा तिलिस्म है 'हाथ भीगते हैं ... ज़ुबान और गला सूखता ही जाता है'

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