“नाच-नौटंकी शुद्ध
मनोरंजन होता, उजरा-मुजरा वर्जित था, पर नौटंकी देखने तो औरतें भी सँपनी गाड़ी
चढ़कर आतीं। औरतों के लिए परदे का इंतज़ाम होता। वैसे, आयोजकों को औरतों का आना
अच्छा नहीं लगता। औरतें आएँगी तो बच्चे आएँगे, बच्चे रहेंगे तो चिल्ल-पों मची
रहेगी, ख़्वाहमख़्वाह रंग में भंग पड़ता रहेगा। इधर जालिम सिंह के चरण मालिनी
आँसुओं से पखार रही होगी, उधर कोई रोंवटिया बच्चा चिल्लाएगा, ‘बाबूजी हो, मैया मरलक हो।’ हँसी का
फव्वारा छूटेगा, सारी संवेदना बिला जाएगी। हुआ न रंग में भंग।”(शुरुआत से पहले) कहने की ज़रूरत नहीं कि ‘नौटंकी’ पहले खेल थी। स्त्री-पुरुष
सभी देखते थे। स्त्री की उपस्थिति आयोजकों को अच्छी नहीं लगती थी, तो उसका कारण था
‘रंग में भंग’ की आशंका। आजकल जो
नौटंकी के नाम पर परोसा जा रहा है, क्या उसे पूर्व की भांति स्त्रियाँ देख सकती
हैं? मैं नौटंकी के पुराने कलाकार अज़ीम मास्टर से मिलकर
रावतपुर गाँव से लौटा हूँ और अभी बगाही बाकरगंज में रम्पत-रानीबाला के घर पर हूँ।
नौटंकी दिखाने की ज़िद के कारण भरी महफ़िल में अपमान झेलने वाले अज़ीम मास्टर की
डबडबाई आँखें मेरी पीठ पर सवार हैं और मेरे सामने बैठे रम्पत अपने ‘क्लाइंट’ से बुकिंग की बात कर रहे
हैं, ‘तीन दिन के तीस हज़ार लगेंगे।’ ग्राहक कहता है, ‘अरे घर का मामला है,
हम बोल के आए हैं इस बार रम्पत का नौटंकी होगा। यार मामा नाक का सवाल है। थोड़ा कम
कर लो।’ बात अटकती है। वह बंदा किसी को फोन करता है। रम्पत कम पर
तैयार नहीं है। उनकी दलील है, ‘छह लड़की होगी।’ ग्राहक कहता है, ‘क्या यार मामा,
कम-से-कम आठ लाओ।’ थोड़ी ज़िच के बाद ‘साटा’ तय हो जाता है। मैं पूरे वार्तालाप का साक्षी हूँ। इसमें ‘नौटंकी’ कहीं नहीं है। केन्द्र में
है—लड़की और उसकी संख्या। वहाँ से खिन्न मन मैं जब बाहर निकलता हूँ तो अपने साथी
से पूछता हूँ—“यह कौन सी नौटंकी है?” वह कहता
है, “सरकारी कार्यक्रमों और कुछ संगठनों को छोड़कर बाक़ी जहाँ
कहीं भी नौटंकी होती है, वह यही होती है।” लेकिन फिर पता चलता
है कि हम-आप कला के नाम पर चाहे जो कह-कर लें, लेकिन रम्पत नहीं हो तो बहुत से घरों
में चूल्हा जलना मुश्किल हो जाएगा। साल-छह महीने में किसी कलाकार को एक ‘रोल’ और उसके एवज़ में
हज़ार-पन्द्रह सौ रूपये दे देने से क्या ज़िन्दगी चल जाएगी? अगर नहीं तो फिर ‘शुद्धता’ के चोले को अंततः क़फ़न में ही तब्दील होना है। ठीक है, आतमजीत
सिंह की ‘लैला-मंजनूं’ के चश्मे से देखें
तो रम्पत की ‘लैला-मजनूं’ बिल्कुल फूहड़ हैं,
वे बहरे-तबील और चौबोले की जगह पर सस्ते फिल्मी गाने ज़्यादा गाते हैं। लैला और
कैश के बीच ‘मदरसे’ में जो पाक मुहब्बत परवान
चढ़ सकती थी, उसको जोकर के द्विअर्थी संवाद दूषित बनाते हैं। लेकिन साहब पेट तो
इसी से चलता है। नौटंकी के परम्परागत कलाकारों के जीवन-बसर की कोई और राह न तो
कला-संस्थानों/विभागों ने निकाली है और न ही कला में आ रही गिरावट और अश्लीलता पर ज़ार-ज़ार
रोने वाले कला-प्रेमियों ने। बल्कि नौटंकी के स्वर्णिम अतीत को वर्तमान करने की
दिशा में क्रियाशील लोगों के प्रति भी इनके मन में कुढ़न और आक्रोश है। एक कलाकार
ने राहत इंदौरी का शेर पढ़ा, “कल तक दर दर फिरने वाले, घर के
अन्दर बैठे हैं / और बेचारे घर के मालिक, दरवाज़े पर बैठे हैं”। हालांकि इनसे यह
पूछा जा सकता है कि जब आप घर में थे तो घर की मर्यादा का ध्यान क्यों नहीं रखा? अपनी कला को, इस विधा को, इसके स्वर्णिम शिखर से च्युत
क्यों किया अथवा होने दिया? अगर उसी वक़्त तमाम
कलाकारों ने श्याम सुंदर का विरोध किया होता तो ‘वेरायटी’ की नींव ही नहीं पड़ती। ख़ैर, मकान तो जैसा कल था, आज भी
है, बस मक़ीन बदल रहे हैं। नौटंकी के परम्परागत कलाकारों के बहुत से तम्बू उखड़ गए
हैं, कुछ हैं जो अब भी अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं। नये-पुराने अभिनेताओं, नई-पुरानी
कहानियों और साज-सज्जा के साथ नौटंकी अब भी जारी है।
जनवरी-मार्च 2017 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जनवरी-मार्च 2017 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)
Featured Post
'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ
1. साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...
-
लोकतंत्र है। अर्थतंत्र है। भेंड़तंत्र है। भीड़तंत्र है। लूटतंत्र है। सर्वत्र फैला ढोंगतंत्र है। यंत्रवाद है। बौद्धिक साम्राज्यवाद है। सिय...
-
उमस और ऊब का माहौल मन को कोंचते... ख़्वाहिस को बढ़ाते... बिल्कुल प्यास की तरह । जबकि नल की ट...
-
बाढ़ का पानी अब उतार पर था। जलमग्न धरती कहीं-कहीं अपना कूबड़ दिखाने लगी थी। छोटी-छोटी मछलियों की छलमलाहट बढ़ गई थी। वही जल-धारा, जो कल...
