20वीं
सदी के अंतिम दशक में हिन्दुस्तान में जो कुछ घटित हुआ, उसने कम-अज़-कम बौद्धिक
जगत में कुछ ऐसे पारिभाषिक शब्द प्रचलित किए, जो अब तक हमारे लिए बिल्कुल अनजान
थे। ‘भूमंडलीकरण’ और ‘उदारीकरण’ को बतौर उदाहरण प्रस्तुत किया
जा सकता है। जिन ग्रामीण बालाओं को ‘बर्फ़
का गोला’ भी
कभी-कभार ही नसीब हो पाता था, उन्हें रूप बदलकर गाँव पहुँचा बॉलीवुड का नायक, कुएँ
से ‘कोका
कोला’
निकाल-कर पीने-पिलाने लगा। ‘याराँ
दा टशन’ का
वो दौर अब भी जारी है। ‘डीटीएच’ ने शहरी मध्य-वर्गीय स्त्रियों
की ठसक और ऐंठ के साथ ही रुतबे पर भी बुरा असर डाला है। गर्मी की छुट्टियाँ बिताने
या तीज-त्यौहार पर गाँव जाने वाली इन विदुषियों का प्रभामंडल छिन्न-भिन्न हो चुका
है। अब न तो इनकी पहले-सी आवभगत होती है और न ही कोई ‘सास भी कभी बहू थी’ की अकथ-कथा सुनने के लिए
ख़ुशामदी अंदाज़ में इनके आगे-पीछे ही करती हैं। और तो और दूरदर्शन पर शुक्रवार के
दिन आनेवाली फिल्मों का क्रेज़ भी खत्म हो चुका है। मार्शल मैक्लूहान के ‘ग्लोबल विलेज़’ का ‘ग्लोबल’ बेचारा कब-का ‘ग्लोकल’ द्वारा अपदस्थ किया जा चुका
है। फिल्मों का नायक तो पहले ही बदल चुका था, अब तो कथानक भी बदल गया है। कुछ
रामगोपाल वर्मा टाईप हो गए हैं तो कुछ ने ख़ुद को कपिल और राजू श्रीवास्तव की
श्रेणी में फिट कर लिया है। फिल्मों में ‘भूतिया
दौर’ भले
ही ढंग से कभी आ नहीं पाया हो, लेकिन टीवी सोप्स ने बॉलीवुड की इस कमज़ोरी को अपने
अथक-परिश्रम से ढंक लिया है। भगवान कृष्ण ने बड़ा होने से मना कर दिया है और अब तो
गणेश की भी उम्र नहीं बढ़ती क्योंकि दोनों का बाल-रूप ही बच्चों को अट्रैक्ट करता
है। हाँ, एक महादेव हैं, जिन्हें अब तक बच्चा बनने का सौभाग्य नहीं मिला है। ‘हनुमान’ और ‘मूसकराज’ जैसे इनके सहयोगियों को भी
अच्छा-ख़ासा ‘फुटेज’ मिलने लगा है। नगरीय सभ्यता
के कामकाजी-जीवन और परिवार के विघटन से जो धार्मिक और पौराणिक गैप पैदा हुआ था,
उसे टीवी ने बख़ूबी भर दिया है। दिन-रात खट-खटकर बेहाल लोगों की सेहत का ख़्याल
रखते हुए धर्म-दर्शन का पुण्य-लाभ भी वाया टीवी अथवा सिनेमा, घर बैठे ही प्राप्त किया
जा सकता है।
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