शनिवार को छत्तीसगढ़ में जो कुछ हुआ। वह अप्रत्याशित
नहीं था। आपको यह अटपटा लग सकता है। आपकी दृष्टि में मेरी ‘मानसिक
स्थिति’ भी संदिग्ध हो सकती है। वैसे भी हम जिस लोकतांत्रिक दौर से
गुज़र रहे हैं, उसमें कुछ भी असंदिग्ध नहीं है। यह आम धारणा है कि प्रभु-वर्ग या
उससे जुड़े लोगों के विरुद्ध जो कुछ भी निगेटिव होता है, वह अप्रत्याशित ही होता
है। प्रत्याशित घटनाएँ तो आमलोगों से जुड़ी होती हैं। दलित-आदिवासी और कमज़ोर तबके
के लोगों का शोषण-दमन-उत्पीड़न प्रत्याशित होता है। यही समाज और व्यवस्था-सम्मत
धारणा है। हत्या, लूट या बलात्कार हो या आंदोलन— ये तभी बड़े होते हैं, जब बड़े
लोगों के साथ हों या कि वे इनसे जुड़े हों। अब से पहले तक नक्सलियों ने सुरक्षा-बलों
को ही अपना निशाना बनाया था। सैंकड़ों जवान मारे गए होंगे। लेकिन राजनेताओं के
चेहरे पर ऐसी हवाइयाँ पहले कभी उड़ती नहीं देखी। यह देश के नक्सली इतिहास की सबसे
बड़ी घटना है। ऐसा नहीं कि हम दुखी नहीं हैं। हमारे लिए तो हर-एक ज़िन्दगी अहम है,
चाहे वह किसी कर्मा की हो या पटेल की या कि किसी ग़रीब आदिवासी की।
रविवार, 26 मई 2013
शनिवार, 18 मई 2013
मर्ज कुछ, इलाज कुछ
छुटपन की एक घटना याद आती है। गाँव की एक लड़की, गाँव
के ही युवक के साथ पकड़ी गई। मामला प्रेम-प्रसंग का था। बड़े-बुज़ुर्गों की सदारत
में पंचायत बैठी। दोनों पंचायत में पेश हुए। पंचों को बताया कि वे एक-दूसरे से
प्यार करते हैं और शादी करना चाहते हैं। लेकिन
पंचों ने प्रस्ताव को नकार दिया। मामला नैतिक-अनैतिक के बिन्दु तक ही सीमित कर
दिया गया। सवाल-जवाब से ज़्यादा दोनों की लानत-मलामत हुई और सज़ा मुक़र्रर कर दी
गई। दो-चार शोहदे टाईप के जवान मुस्तैदी से उठे और बाँस की कच्ची कमाचियाँ काट लाए।
इस तरह प्रेमी-युगल की पीठ पर भरी पंचायत में सदाचार की लकीरें उकेरी गईं। दोनों
को माँ-बाप ही नहीं बल्कि सामाजिक संस्कार की अवहेलना का भी दोषी ठहराया गया। सज़ा
और सुनवाई का केन्द्र-बिन्दु प्रेम नहीं था।
गुरुवार, 9 मई 2013
हलाल का बदला झटका
सआदत
हसन मंटो की एक छोटी सी कहानी है- ‘हलाल और झटका’। यह कहानी आज बेतरह याद आ रही है। कहानी में दो किरदार हैं।
पहला कहता है- “मैंने उसकी शहरग पर छुरी रखी,
हौले-हौले फेरी और उसको हलाल कर दिया।” दूसरा चौंकता है- “यह तुमने क्या किया?” सवाल के जवाब में पहले का
सवाल आता है- “क्यों?”
दूसरा अपने सवाल को थोड़ी तफ्सील देता है- “इसको हलाल क्यों किया?” पहला रस लेते हुए कहता है- “मज़ा
आता है, इस तरह...” दूसरा खीझ कर कहता है- “मज़ा आता है के बच्चे... तुझे झटका करना चाहिए था... इस तरह।” और हलाल करने वाले की गर्दन का झटका हो गया। हो सकता है कि मंटो
अपने दौर का सच लिख रहे हों! लेकिन यह हमारे दौर का भी
सच है।
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