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बुधवार, 21 जून 2017

पर्दे में रहने दो, पर्दा न उठाओ



सन 1968 की घटना है। आत्मा राम की एक फ़िल्म आई थी। फ़िल्म का नाम था—शिकार। शिकार के लेखक थे—अबरार। अबरार यानी संत पुरुष। शिकार में एक गीत था। गीतकार थे—हसरत (जयपुरी) और आवाज़ थी आशा (भोसले) की, जिन्हें आजकल आशा ताई कहने का फ़ैशन है। यह बहुत कुछ मैक्लूहान के ग्लोबल विलेज़ या भारतीय संस्कृति के स्वर्गीय राग वासुधैव कुटुम्बकम की तर्ज़ पर नया-नया तैयार हुआ उत्तर आत्मीय शब्दबंध है। गीत के बोल थे—पर्दे में रहने दो, पर्दा न उठाओ / पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा। फिल्म में मुख्य भूमिका धर्मेन्द्र की थी जो अजय बने थे और नायिका का नाम किरण था, जिसको पर्दे पर जीने की ज़िम्मेदारी पुनश्च आशा (पारेख) ने निभाई थी। मैं आगे बढ़ने से पहले आपको सचेत करना चाहता हूँ कि उपरोक्त विवरण को आप फिल्मी डिस्क्लेमर की तरह काल्पनिक मानने की भूल न करें, क्योंकि ऐसा करते ही आप वर्तमान में आ जाएँगे। न सिर्फ़ आ जाएँगे, बल्कि खो भी जाएँगे और खोने के बाद आप जो हैं, वह नहीं रह पाएँगे। ऐसे में इस मैं-मैं के ज़माने में मुमकिन है कि आप कबीर-रोग अर्थात तू-तू के शिकार हो जाएँ! अतः सावधान! वैसे यदि आप आत्मा, राम, अबरार (संत), धर्म, इन्द्र, अजय, हसरत, आशा, किरण, पर्दा, रहस्य आदि का स्मरण रखेंगे तो अच्छा ही रहेगा।

रविवार, 16 अगस्त 2015

मीडिया मंडप में चिकित्सक से मुलाकात

हमारे एक मित्र हैं। पेशे से चिकित्सक हैं। एक दिन बातचीत हो रही थी। बातचीत के दौरान उन्होंने शिकायत की। उनकी शिकायत थी कि पत्रकार बेलगाम हो रहे हैं। मैंने उनका वाक्य सुधारा, 'पत्रकार नहीं मीडिया बेलगाम हो रहा है।' मित्र ने दलील दी, 'दोनों एक ही बात है। मीडिया अपने-आप में कोई ऐक्टिंग अथॉरिटी नहीं है।' मैंने विरोध किया, 'यह कोई तर्क नहीं है।' उसने उदाहरण पेश करते हुए कहा, 'मान लो कार से कोई दुर्घटना होती है तो इसका मतलब यह तो नहीं कि कार को दोषी ठहराया जाए! बल्कि किसी से भी पूछो तो वह यही कहेगा कि ड्राइवर की बदमाशी या लापरवाही के कारण हादसा हुआ। यानी दुर्घटना की स्थिति में कार नहीं ड्राइवर दोषी होता है। इस लिहाज़ से अगर मीडिया बेलगाम है तो साफ है कि मीडियाकर्मी बेलगाम हैं।' मैंने कहा, इसका मतलब आप की निगाह में मीडियाकर्मी ही मीडिया का निर्देशक है?’ मित्र ने मुस्कराते हुए कहा, 'बिल्कुल।' मैंने थोड़ा तुनकने वाले अंदाज़ में कहा, 'जी नहीं। मीडिया कोई कार नहीं है, और न ही कोई मीडियाकर्मी ही ड्राइवर है। यह आपकी निजी सोच है।' मित्र मानने को तैयार नहीं हुए। उन्होंने आरोप लगाया, 'तुम मीडिया में काम कर चुके हो इसलिए अपनी बिरादरी की असलियत छुपाने की कोशिश कर रहे हो।' मुझे बुरा लगा। मैंने विरोध जताया, 'ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। मैं मीडियाकर्मी रहा हूँ इसलिए जानता हूँ कि मीडिया और मीडियाकर्मी दोनों पर्यायवाची नहीं हैं। दोनों में बहुत फ़र्क़ है।' मित्र ने निर्णयात्मक स्वर में कहा, 'क्या तुम इस बात से भी इनकार करोगे कि मीडियाकर्मी ही मीडिया रूपी भवन के निर्माण के लिए ईंटें तैयार करते हैं?' मैंने दृढ़ता का प्रदर्शन किया, 'हाँ, बिल्कुल करूँगा क्योंकि मैं जानता हूँ कि मीडियाकर्मी मीडिया रूपी भवन के लिए ईंटों का निर्माण नहीं करते बल्कि वे स्वयं ईंट के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं।' मित्र ने ज़ोरदार ठहाका लगाया, 'अच्छा मज़ाक है।

शनिवार, 11 जुलाई 2015

मालिकों का बोझ ढोता मीडिया

दो विवाद और चार मीडिया समूह। पहला विवाद इंडियाज़ डॉटर डॉक्यूमेंट्री से जुड़ा है तो दूसरे का रिश्ता वक़्त ने किया क्या हसीं सितम धारावाहिक से है। प्रत्यक्ष रूप से जो प्रदर्शित किया गया, वह यह था कि विवाद का सम्बंध इंडियाज़ डॉटर और वक़्त ने किया क्या हसीं सितम के कंटेंट से है। दोनों ही मामलों में राष्ट्र की छवि और राष्ट्रवाद की आड़ लेकर प्रतिस्पर्धी मीडिया समूहों ने अपने-अपने क्षुद्र हितों का पोषण करने की नापाक़ कोशिश की। नतीज़ा क्या निकला? हम-आप से छुपा नहीं है। टाइम्स और एनडीटीवी समूह के बीच व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा की चरम परिणति केन्द्र सरकार के उस बचकाना फैसले में हुई, जिसकी वैश्विक स्तर पर आलोचना हुई। जिन्हें डॉक्यूमेंट्री में दिलचस्पी नहीं भी हो सकती थी, वैसे लोगों ने भी प्रतिबंध के कारण उत्सुकता के अतिरेक में देख लिया और एनडीटीवी ने तो डॉक्यूमेंट्री के लिए निश्चित प्रसारण समय पर अपना स्क्रीन भी ब्लैक रखा। टाइम्स नाउ पर अर्णब गोस्वामी ने दावा किया कि इंडियाज़ डॉटर वास्तव में भारत की छवि धूमिल करने वाला वृत्तचित्र है, जबकि देश के बहुसंख्यक बुद्धिजीवी तबके की सोच इसके विपरीत थी। जनसत्ता के संपादक ओम थानवी की प्रतिक्रिया थी कि जिस किसी ने बीबीसी की डॉक्युमेंट्री 'इंडियाज़ डॉटर' देख ली है, उसने बड़ी सहजता से इस बलात्कार-विरोधी फिल्म को भारत में प्रतिबंधित करवाने वाली मानसिकता और अभिव्यक्ति का गला घोंटकर दुनिया भर में भारत की नाक कटवाने वाली बुद्धि पर तरस ही खाया होगा। बहरहाल यह एपिसोड अब लगभग ख़त्म हो चुका है और अगर मैं ग़लत नहीं हूँ तो हममें से ज़्यादातर लोग इसको भूल भी चुके हैं!

गुरुवार, 14 मई 2015

मीडिया का माइंड गेम

मेरे मुख़ालिफ़ ने चाल चल दी है/और अब/मेरी चाल के इंतेज़ार में है/मगर मैं कब से/सफेद ख़ानों/सियाह ख़ानों में रक्खे/काले-सफ़ेद मोहरों को देखता हूँ/मैं सोचता हूँ/ये मोहरे क्या हैं…” (जावेद अख़्तर, ये खेल क्या है) उलझन वाजिब है। शतरंज की बिसात को जंग का मैदान समझें या खेल! सफ़ेद-काले मोहरों को लकड़ी का टुकड़ा मानें या हक़ीक़त! अगर यह महज खेल है तो फिर हार-जीत का ज़्यादा महत्व नहीं। और जो हार-जीत अहम है तो फिर खेल को जंग की तरह क्यों न लें? और यह भी कि क्या मोहरे सांकेतिक हैं जो किसी बड़े यथार्थ को रेप्रज़ेन्ट करते हैं? आज के इस उत्तर-आधुनिक युग में जब जंग को खेल की तरह और खेल को जंग की तरह लेने की संस्कृति विकसित हो चुकी है, तो उलझन वाजिब है। 1990 में कुवैत-मुक्ति के लिए प्रारम्भ हुआ खाड़ी युद्ध। सितंबर 2001 में अपहृत विमानों के माध्यम से वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर कथित अटैक और फिर उसके बाद तालिबानी अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमला। 2003 में जैविक हथियारों की आड़ में इराक के विरुद्ध युद्ध और सद्दाम हुसैन को युद्धापराध का दोषी क़रार देकर फांसी की सज़ा। इज़्राइल-फिलिस्तीन के बीच सतत् झड़पें। ये तमाम जंग खेल ही तो थे/हैं। बल्कि खेल से कहीं ज़्यादा रोमांचक, ज़्यादा यथार्थ, बिल्कुल हाइपर-रियल। मुमकिन है, आपको उपरोक्त बातें हँसी-खेल जैसी लगें! लगनी भी चाहिए।

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

उपभोक्तावाद की असंसदीय मुहिम

समझ का उम्र से रिश्ता है भी और नहीं भी है। वैसे ही जैसे उम्र और ज़िन्दगी के गुज़रने में फ़र्क़ होता है। हम जिस मुल्क में रहते हैं, वहाँ बड़ी आबादी की सिर्फ़ उम्र गुज़रती है, ज़िन्दगी नहीं। इसके विपरीत एक तबका ऐसा भी है, जिसकी ज़िन्दगी तो गुज़रती है, लेकिन उम्र है कि साठ में भी छब्बीसवें बसंत का मुखौटा चस्पाँ किए इतराती फिरती है। जलने वाले जलते हैं तो जलें, उनकी बला से! अतः उम्र का सम्बंध ज़िन्दगी से है भी और नहीं भी। आदर्श स्थिति तो यही है कि दोनों अन्योन्याश्रित हों! किन्तु ऐसा विरले ही हो पाता है क्योंकि उम्र का सम्बंध प्रकृति से है और ज़िन्दगी का भौतिक संसाधनों, लालसा और आत्मिक उल्लास से। भौतिक कारक अधिक अहमियत रखते हैं। अतः त्याग से आत्मिक उल्लास की प्राप्ति का मार्ग विकट भी है और संदिग्ध भी, क्योंकि लालसा मनुष्य की अनिवार्य दुर्गुण है। कबीर ने सही पहचाना था- माया महा ठगनी हम जानी/तिरगुन फांस लिए कर डोले/बोले मधुरे बानी।

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

केवल दो नर ना अघाते थे

10-12 साल पहले की एक घटना है। घटना का मीडिया से कोई सम्बंध नहीं है। तब हमारे गांव में कुल पाँच ही दुकानें हुआ करती थीं। उनमें से भी केवल तीन ही लोकतांत्रिक थीं अर्थात ऐसी दुकानें जहाँ प्रत्येक वर्ग-समुदाय और स्वभाव के लोग बिना किसी दुराव-छिपाव के आ-जा सकते थे। शेष दो दुकानों पर वही लोग आते-जाते थे, जिन्हें ताड़ी-दारू की तलब हुआ करती थी। मैं जिस घटना का ज़िक्र करने वाला हूँ, उसका सम्बंध शेष दो दुकानों में से किसी एक से है! घटना का मुख्य पात्र इनरदेव मंडल है। हमारे गाँव के ही एक मुहल्ले का निवासी। जो बस-खलासी का काम करता था। स्वभाव का दबंग तो था ही उसको अपनी ताक़त का घमंड भी था। इसलिए गाँव के बड़े-बुज़ुर्ग कभी भी उसको यह समझाने का जोख़िम नहीं उठा पाए कि भई ताड़ी-दारू नहीं पीते। सेहत ख़राब होती है। हमउम्रों में कभी इतनी हिम्मत हुई नहीं कि कोई उसके साथ तू-तड़ाक कर सके। नशेड़ी भले हो लेकिन वह शील का बिल्कुल पक्का-सच्चा था। शोहदों से उसकी पुरानी दुश्मनी थी। अगर किसी बंदे से ऊँच-नीच हो गई और इनरदेव को पता चल गया तो फिर उस बंदे की हड्डी टूटे-न-टूटे, दो-तीन दिन के लिए खाट पकड़ना तो तय ही था। लेकिन उस शाम इनरदेव जमकर पीने के बावजूद नशे में नहीं था। उसके अंदर का दबंग भी पस्त पड़ा हुआ था और उसकी अकड़ न जाने कहाँ ग़ायब हो गई थी। वह सिर झुकाए शर्मिंदा सा पान की गुमटी से पीठ टिकाए खड़ा था। हाँ, उसकी बहन ज़रूर ग़ुस्से में थी और अपने भाई के कथित दोस्त को लानत-मलामत भेज रही थी। सामने वाला बंदा भी शर्मिंदा था और बार-बार यही सफ़ाई पेश कर रहा था कि यार मुझे नहीं पता था कि ये तेरी ही बहन है। बात दरअसल ये थी कि इनरदेव को उसके दोस्त ने पार्टी दी थी। उसका दोस्त भी बस स्टैंड में ही काम करता था। होगी ख़ुशी की कोई बात! ...तो दोनों ने पहले पासीखाने में चखने के साथ ताड़ी का लुत्फ़ उठाया और फिर झूमते हुए पान खाने आ पहुँचे। पनवाड़ी जिस वक़्त पान लगा रहा था और ये दोनों सुरूर में झूम रहे थे, ठीक उसी वक़्त इनरदेव की बहन दुकान से सौदा ले घर लौट रही थी। जब वह पान की गुमटी के पास से गुजर रही थी तभी इनरदेव के मित्र की निगाह उस पर पड़ी और उसने एक भद्दा सा फ़िकरा कस दिया। लड़की ने पहले तो उस व्यक्ति के कुल-ख़ानदान की शान में क़सीदे पढ़े। फिर भाई को भी लताड़ दिया। कोई और मौक़ा होता तो इनरदेव अब तक उस व्यक्ति की हड्डियाँ चटखा चुका होता। किन्तु आज ख़ुद उसकी बहन पर फ़िकरा कसा गया था और वह था कि सिर झुकाए मौन खड़ा था। वह अपने दोस्त की सफ़ाई के जवाब में बार-बार दाँत पीसते हुए धीमी आवाज़ में एक ही बात दुहरा रहा था- चुपचाप चल जाओ। ताड़ी पिला के नाक काट लिया। भाग जाओ!’ इनरदेव ने अपने मित्र के पैसे की ताड़ी पी थी, इसलिए उसके हाथ शिथिल पड़ गए। इनरदेव ने अपने मित्र के पैसे का चखना चखा था, इसलिए उसकी ज़ुबान क्रोध के अतिरेक के बावजूद अपशब्द निकाल पाने में स्वयं को असहज महसूस कर रही थी। दूसरों की माँ-बहनों की बेइज़्ज़ती बर्दाश्त नहीं कर पाने वाला इनरदेव आज स्वयं अपनी बहन के क्रोध में भागीदार नहीं बन पा रहा था। आप चाहें तो इन तीन पात्रों को प्रतीकात्मक मान सकते हैं। इनरदेव को मीडिया, इनरदेव की बहन को जनता और इनरदेव के मित्र को पूँजी के रूप में यदि देखें तो वर्तमान मीडिया का वास्तविक चित्र और चरित्र उद्घाटित हो सकता है। लेकिन यह इनरदेव के साथ अन्याय होगा! इनरदेव को तो अपनी भूल पर पछतावा था। लेकिन मीडिया इसको भूल नहीं बल्कि अपना कौशल मानता है। वह चखना और ताड़ी को इंज्वॉय कर रहा है। पूँजी द्वारा जनता के साथ भद्दा मज़ाक उसके लिए शर्म या आक्रोश का विषय नहीं है।

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'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.      साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...