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मंगलवार, 21 जुलाई 2015

न वो समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात

या रब, न वो समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात। दे और दिल उनको, जो न दे मुझको ज़ुबाँ और।।अब या तो इस शेर को उसकी तात्पर्य-वृत्ति के अनुकूल समझा जाए और तीखे व्यंग्य की दाद दी जाए। या फिर यूँ हो कि ग़ालिब को इस हेकड़ी के लिए ख़ूब खरीखोटी सुनाई जाए- अमाँ मियाँ ये ग़ालिब भी न, बड़े ख़ब्ती क़िस्म के शायर थे। चले न जाने आँगन टेढ़ा। ख़ुद तो सीधी-सादी बात को बेवजह घुमा-फिरा कर कहते हैं और इल्ज़ाम पाठक पर मँढ़ते हैं। मतलब यह कि जो भी बात समझ में न आए, वो बकवास है। अच्छा है कि ग़ालिब हमारे ज़माने में न हुए, वरना अपना सिर पीट लेते। वैसे ग़ालिब के ज़माने में आज जैसे क़द्रदान भी न हुए, वरना वो दीवान क्या खाकर लिखते! ख़ैर, ग़ालिब का ये शेर हमेशा मेरी ज़ुबान पर कुछ इस अंदाज़ में होता है, जैसे बाँध तोड़ने पर उतारू कोई उफनती हुई नदी। मुश्किल ये कि बार-बार दुहराऊँ तो ख़ब्ती कहे जाने का डर है। और ज़ुबाँ पर काबू रखूँ तो बेचारा दिल रुआँसा हुआ जाता है। दिमाग़ है कि ढाढ़स बँधाने की बजाय दिल को कोंचने में ज़्यादा मज़ा पाता है। कभी-कभी खीझ इतनी ज़्यादा बढ़ जाती है कि सिर के बाल नोंचने लगता हूँ। कई बार तो तन्हाई में ख़ुद को तमाचा भी जड़ चुका हूँ। लेकिन कोई फ़ायदा नहीं! दिल-दिमाग भारतीय लोकतंत्र के दो दलों की तरह बर्ताव करने से परहेज़ बरतने को तैयार ही नहीं होते! दिल और दिमाग की नूरा-कुश्ती थमती ही नहीं! समझौते की तमाम कोशिशें नाकाम। समझ में नहीं आता, क्या करूँ? कई बार सोचा कि दिल-दिमाग के झमेले में जिस्म को ही तकलीफ़ क्यों हो? लेकिन जिस्म ऑथोरिटी  नहीं है। ये पॉवर तो दिमाग के ही पास है। दिल उसी पॉवर में हिस्सेदारी चाहता है। इसलिए बात-बेबात हस्तक्षेप करता रहता है। वैसे दिल की बात भी वाजिब है। जिस भाषा को लोग समझते ही नहीं, उस भाषा में कुछ कहने की ज़रूरत क्या है? लेकिन दिमाग़ है कि ज़िद ठाने बैठा है! कहता है- अभिव्यक्ति के अनुकूल भाषा तो होनी ही चाहिए। जो लोग अभिधा-व्यंजना में फ़र्क़ नहीं कर सकते, उनके लिए हलकान होने की ज़रूरत नहीं है।

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