होली अपनी सतरंगी छटा बिखेरती हुई यूं निकल गई कि पता भी न चला। कई दोस्त तो तमाम विघ्न-बाधाओं को पार कर, घर भी गए थे। लौटे तो सब-के-सब रंगों में सराबोर। ऐसी बात नहीं कि कपड़े नहीं बदले गए थे। जिस्मों पर कपड़े बिल्कुल साफ और धुले-धुले ही थे, लेकिन मन पर चढ़ा फागुन का रंग बहुत गाढ़ा था। अपनी-अपनी कहानियां थीं, अपने-अपने रंग-ढंग और
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'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ
1. साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...
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लोकतंत्र है। अर्थतंत्र है। भेंड़तंत्र है। भीड़तंत्र है। लूटतंत्र है। सर्वत्र फैला ढोंगतंत्र है। यंत्रवाद है। बौद्धिक साम्राज्यवाद है। सिय...
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“ साहब मैं पटना से बोल रहा हूँ। आपसे कुछ भी नहीं छुपाउंगा। बिल्कुल सच बताउंगा। मैं लव मैरिज करने के बाद अब पछता रहा हूँ। बीवी ब्लैकमे...
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