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शनिवार, 17 नवंबर 2012

थोड़ा वक्त लगेगा अभी



मीडिया पर लोग उंगली क्यों उठाते हैं? मीडिया कुछ मामलों में इतना दकियानूस क्यों है? कंटेंट को लेकर बेबहरापन क्यों है? मीडियाकर्मियों के साथ इन-हाउस शोषण पर वरिष्ठ चुप क्यों रहते हैं? जन-सरोकार से जुड़ी ख़बरें अक्सर छूट क्यों जाती हैं? मीडियाकर्म अपनी विश्वसनीयता क्यों खोता जा रहा है? जब पेड न्यूज़ की सभी आलोचना करते हैं तो फिर इस प्रवृति पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? आतंकवाद और नक्सलवाद जैसे मुद्दों पर मीडिया उथली भाव-भंगिमा की गिरफ्त में क्यों है? क्या सचमुच मीडिया सत्ता का चापलूस या कि वर्ग विशेष का प्रतिनिधि बनकर रह गया है? मीडिया में आमजन कहां ठहरते हैं? सवाल इतने हैं कि दिमाग कभी-कभी विद्रोह को आतुर हो जाता है। लेकिन जवाब...?

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