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रविवार, 24 अप्रैल 2016

अक्कड़-बक्कड़ः कथ्य और स्वरूप में विरल उपन्यास

अक्कड़-बक्कड़ है क्या? औपन्यासिक कृति या कोई बाल-क्रीड़ा? रपटन-भरी भाषा में फिसलती-गिरती ज़िन्दगी की शल्यक्रिया या किसी बेशर्म गप्पी का वायवीय गल्प? यह क्या सचमुच वैसा ही है जैसा कि अस्सी-नब्बे पूरे सौ?’ शैली तो कुछ ऐसी ही है जैसे कोई बच्चा शब्दों से मगन-भाव खेल रहा हो! लय और लोच के सहारे भावात्मक रूप से हल्के हिंडोले पर डोल रहा हो! लेकिन ऐसा है नहीं। पाठ के समय धैर्य और सावधानी ज़रूरी है क्योंकि असावधानी की स्थिति में रपटने, वाग्जाल में उलझने, शब्दों के कीचड़ में लिथड़ने और लक्ष्यार्थ तक पहुँचने में बिल्कुल जलालपुरिए की तरह अंततः विफल रहने की पूरी गुंजाइश है। सावधानी और गंभीरता इसलिए भी कि यह व्यंग्य उपन्यास है और बकौल श्रीलाल शुक्ल व्यंग्य लेखन का सम्बंध सामाजिक स्थिति की मूल्यगत आलोचना से है। तो उपन्यास पढ़ते वक़्त इस सूत्र-वाक्य को दिमाग़ में रखना ज़रूरी है, तभी हम वास्तविक कथ्य और वातावरण तक पहुँच पाएँगे क्योंकि उपन्यास की भाषा में भी रपटन है। यह आपको नंगलों की तरह भटका भी सकती है और आप किसी क्षेत्र-विशेष की मरीचिका में उलझ सकते हैं, कथ्य और वातावरण के भेदाभेद को समझने से चूक सकते हैं।

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

न वो समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात

या रब, न वो समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात। दे और दिल उनको, जो न दे मुझको ज़ुबाँ और।।अब या तो इस शेर को उसकी तात्पर्य-वृत्ति के अनुकूल समझा जाए और तीखे व्यंग्य की दाद दी जाए। या फिर यूँ हो कि ग़ालिब को इस हेकड़ी के लिए ख़ूब खरीखोटी सुनाई जाए- अमाँ मियाँ ये ग़ालिब भी न, बड़े ख़ब्ती क़िस्म के शायर थे। चले न जाने आँगन टेढ़ा। ख़ुद तो सीधी-सादी बात को बेवजह घुमा-फिरा कर कहते हैं और इल्ज़ाम पाठक पर मँढ़ते हैं। मतलब यह कि जो भी बात समझ में न आए, वो बकवास है। अच्छा है कि ग़ालिब हमारे ज़माने में न हुए, वरना अपना सिर पीट लेते। वैसे ग़ालिब के ज़माने में आज जैसे क़द्रदान भी न हुए, वरना वो दीवान क्या खाकर लिखते! ख़ैर, ग़ालिब का ये शेर हमेशा मेरी ज़ुबान पर कुछ इस अंदाज़ में होता है, जैसे बाँध तोड़ने पर उतारू कोई उफनती हुई नदी। मुश्किल ये कि बार-बार दुहराऊँ तो ख़ब्ती कहे जाने का डर है। और ज़ुबाँ पर काबू रखूँ तो बेचारा दिल रुआँसा हुआ जाता है। दिमाग़ है कि ढाढ़स बँधाने की बजाय दिल को कोंचने में ज़्यादा मज़ा पाता है। कभी-कभी खीझ इतनी ज़्यादा बढ़ जाती है कि सिर के बाल नोंचने लगता हूँ। कई बार तो तन्हाई में ख़ुद को तमाचा भी जड़ चुका हूँ। लेकिन कोई फ़ायदा नहीं! दिल-दिमाग भारतीय लोकतंत्र के दो दलों की तरह बर्ताव करने से परहेज़ बरतने को तैयार ही नहीं होते! दिल और दिमाग की नूरा-कुश्ती थमती ही नहीं! समझौते की तमाम कोशिशें नाकाम। समझ में नहीं आता, क्या करूँ? कई बार सोचा कि दिल-दिमाग के झमेले में जिस्म को ही तकलीफ़ क्यों हो? लेकिन जिस्म ऑथोरिटी  नहीं है। ये पॉवर तो दिमाग के ही पास है। दिल उसी पॉवर में हिस्सेदारी चाहता है। इसलिए बात-बेबात हस्तक्षेप करता रहता है। वैसे दिल की बात भी वाजिब है। जिस भाषा को लोग समझते ही नहीं, उस भाषा में कुछ कहने की ज़रूरत क्या है? लेकिन दिमाग़ है कि ज़िद ठाने बैठा है! कहता है- अभिव्यक्ति के अनुकूल भाषा तो होनी ही चाहिए। जो लोग अभिधा-व्यंजना में फ़र्क़ नहीं कर सकते, उनके लिए हलकान होने की ज़रूरत नहीं है।

रविवार, 22 फ़रवरी 2015

भरि-भरि मारै बान

हम जब भोजन बनाते हैं तो ध्यान उसके स्वाद पर ही होता है। चिकित्सक भले पौष्टिकता का आग्रह पालें। सामान्य व्यक्ति के लिए तो स्वाद भोजन की सबसे बड़ी विशेषता है। जिन लोगों को स्वाद में दिलचस्पी नहीं होती, वे वैसे लोग होते हैं जिन्हें किसी रोग अथवा व्याधी ने जकड़ रखा हो! उनके लिए सेहत अधिक अहम होती है। हालांकि स्वाद के प्रति आकर्षण तो वहाँ भी बना ही रहता है। भय भले हाथ पर अंकुश लगा दें, नेत्र और जीभ ललचते ही रहते हैं। मान लीजिए आप किसी के मेहमान हुए! मेज़बान के घर शाही पनीर बना। उसके रंग-सुगंध से ही आपकी क्षुधा का ग्राफ ऊपर चढ़ने लगा। लेकिन आपने पहला कौर मुँह में डाला और निगलने की बजाय उगल दिया। कारण यह कि रसोइया भोजन बनाते समय नमक डालना भूल गया था। नमक की अनुपस्थिति से शाही पनीर के रंग अथवा गंध पर तो फ़र्क़ नहीं पड़ा, लेकिन स्वाद बिगड़ गया। आपके सामने पड़ी प्लेट में वह अब भी उतना ही मनोहारी दिख रहा है। उसकी गंध जो आपके नथूनों तक पहुँच रही है, उसके जादू से अब भी आपके मुँह में पानी भरा है। लेकिन दूसरा कौर मुँह तक लाने की इच्छा नहीं हो रही। क्या ऐसी ही स्थिति तब भी नहीं आती, जब सब्ज़ी में नमक की मात्रा सामान्य से अधिक हो? व्यंग्य के नाम पर लिखे जा रहे अकूत साहित्य पर दृष्टिपात करें तो बहुत हद तक यही स्थिति नज़र आती है। वाक्य-वक्रता के बल पर व्यंग्य तो दूर हास्य भी उत्पन्न नहीं किया जा सकता। फिर भी किया जा रहा है। मंचाश्रयी कवियों का काम तो फिर भी शारीरिक-सांकेतिक पराक्रमों से चल सकता है, किन्तु लेखन के मामले में भाव के बिना साहित्य के भवसागर को पार करना, असम्भव है। यदि साहित्य आस्वाद का विषय है तो पढ़ते समय पाठक को स्वाद तो मिलना ही चाहिए। लेकिन कुछ-एक को छोड़ दें तो व्यंग्य की नैया के ज़्यादातर खेवनहार वाक्य-वक्रता की पतवार ही थामे नज़र आते हैं और व्यंग्य की नैया है कि न इस किनारे आती है, न उस किनारे जाती है, बस शब्दों के बीच भंवर में फंसी चकरघिन्नी की तरह बस गोल-गोल घूमती जाती है। पाठक को कुछ वाक्यों के बाद ही चक्कर आने शुरू होते हैं और फिर मितली से उल्टी तक की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है। इस प्रकार पाठक को आस्वाद के रूप में न तो हास्य की अनुभूति हो पाती है और न ही व्यंग्य का बोध। ऐसी परिस्थिति में शब्दों की मर्यादा खंडित होती है और शिल्पी की छवि भी।

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'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.      साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...