कठपुतली! एक व्यंजनामूलक शब्द है— सामान्य-जीवन में
भी, कला-साहित्य में भी। तुलसी-रचित रामचरितमानस के किष्किन्धाकाण्ड में भगवान शिव
अपनी पत्नी पार्वती से कहते हैं, ‘उमा दारु जोषित की
नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई।।’ फ़िल्म 'आनंद' के लिए गुलज़ार इसी भाव को अपने अंदाज़ में संवादबद्ध करते हैं। आनंद अपने
मित्र डॉ. भास्कर से कहता है— “हम सब रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं,
जिनकी डोर उस ऊपर वाले के हाथों में है।” हालांकि गुलज़ार के
इस संवाद से अधिक परिपक्व कथन जॉर्ज बकनर का है, उनके मुताबिक ‘हमलोग महज कठपुतलियाँ हैं, जिनकी डोर अज्ञात शक्तियों के हाथों में है।’ सहज शब्दों में कहें तो हम उन शक्तियों द्वारा नियंत्रित और संचालित हैं, जो हमेशा
नेपथ्य में रहती हैं। यही बात सातवें अखिल भारतीय पुतुल महोत्सव के उद्घाटन अवसर
पर बिना किसी अगर-मगर के कपिला वात्सायन ने कही— “ऐसे या वैसे, चाहे जैसे, हम सब ‘पपेट्स’ हैं।” फिर भी यह प्रश्न तो मन को व्यथित करता ही है कि क्या सचमुच हाड़-मांस का
हमारा यह शरीर भी काठ सरीखा निर्जीव है? और यह भी कि क्या
हम जो कुछ भी करते-सोचते हैं, वह सब महज हमारा भ्रम है? कि हमारी प्रज्ञा, हमारा विवेक, हमारी दृष्टि और दृष्टिकोण, हमारी भावनाएँ—इनका
कोई महत्व नहीं है? कि यह सब कल्पना-मात्र हैं? मानव-अस्तित्व से जुड़े इन भारी-भरकम
प्रश्नों को यदि हल्के में ही लें और इनकी सांकेतिकता को भी सामान्यीकृत कर लें,
फिर भी यह बात कम परेशान करने वाली तो ख़ैर नहीं ही है कि हाड़-मांस से निर्मित, प्रकृति
का सर्वश्रेष्ठ प्राणी भी अन्ततः कठपुतली सरीखा है, जिसकी एक-एक गतिविधि पर किसी अज्ञात कुल-शील शक्ति का नियंत्रण है! इस लिहाज़ से देखें तो कठपुतलियाँ, मनुष्य से अधिक स्वभाविक जान पड़ती हैं; विशेष रूप से तब, जब यह साहित्य और सामान्य जीवन में प्रयुक्त होने वाले
मुहावरे से इतर, रंगमंच पर अवतरित होती हैं।
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