फिल्म विशेषांक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
फिल्म विशेषांक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 26 जुलाई 2018

तुम कब ठहरोगे?


मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शेर याद आता है—हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है/तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है! अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू यानी बात करने का अंदाज़ अथवा सलीक़ा या तरीक़ा। जब कभी मैं मुस्लिम समाज और संस्कृति को केन्द्र में रखकर बनाई गई फ़िल्में देखता हूँ तो ज़्यादातर फ़िल्मों को देखने के बाद जो पहली प्रतिक्रिया मेरे ज़ेहन में उभरती है, वह यही है। बड़ी कोफ़्त होती है। एक अजीब क़िस्म की अज़ीयत से दो-चार होता हूँ। सतही तौर पर देखें तो ये फ़िल्में मुसलमानों के ज़ख़्मों पर मरहम रखने वाली लगती हैं, मुसलमानों की तरफ़दारी करने वाली नज़र आती हैं। लेकिन हक़ीक़त में ये बिल्कुल अलग रोल अदा करती हैं। कम-से-कम बॉलीवुड की बहुसंख्य फ़िल्मी कहानियों में जिन स्टिरियोटाइप्स को बुना जाता है, वे अपने वास्तविक स्वरूप में मुसलमान-विरोधी धारणाओं को पुष्ट करने वाले होते हैं। मैंने जान-बूझकर शब्द धर्म का इस्तेमाल नहीं किया है क्योंकि मैं जानता हूँ कि धर्म और समाज बिल्कुल जुदा चीज़ें हैं, जबकि बदक़िस्मती से हमारे मुल्क में मुस्लिम समाज और इस्लाम दोनों को पर्यायवाची मान लिया गया है। (हालांकि यही बात हिन्दू अथवा अन्य समाज और धर्म के लिए भी बहुत हद तक सही है।) आख़िर इतने मोटे भेद को इतना महीन किसने और क्यों बना दिया? क्या यह किसी साजिश का परिणाम है? या कि मुसलमानों ने ख़ुद ही अपने सिर ये लानत लपेट रखी है? या कि बहुसंख्यक समाज के एक ख़ास तबक़े ने यह खोटा सिक्का गढ़ा और फिर अपनी पहुँच और ताक़त के बल पर आम कर दिया? फिर सोचता हूँ कि हमारे यहाँ कुछ भी मुमकिन है। हमारा समाज तो ख़ुद ही टैबू का ज़ख़ीरा है। जहाँ क़ुदरत का सबसे ख़ूबसूरत रिश्ता भी टैबू की गिरफ़्त में हो, वहाँ दो फ़िरक़ों, दो जातियों, दो धर्मों के बीच अगर सम्वादहीनता, अजनबीपन या अश्यपृश्यता की भावना घर किए बैठी भी है तो इसमें अजूबा क्या है!

रविवार, 8 मार्च 2015

‘डार्क रीऐलिटी’ के चितेरे हैं मधुर

20वीं सदी के अंतिम दशक में हिन्दुस्तान में जो कुछ घटित हुआ, उसने कम-अज़-कम बौद्धिक जगत में कुछ ऐसे पारिभाषिक शब्द प्रचलित किए, जो अब तक हमारे लिए बिल्कुल अनजान थे। भूमंडलीकरण और उदारीकरण को बतौर उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है। जिन ग्रामीण बालाओं को बर्फ़ का गोला भी कभी-कभार ही नसीब हो पाता था, उन्हें रूप बदलकर गाँव पहुँचा बॉलीवुड का नायक, कुएँ से कोका कोला निकाल-कर पीने-पिलाने लगा। याराँ दा टशन का वो दौर अब भी जारी है। डीटीएच ने शहरी मध्य-वर्गीय स्त्रियों की ठसक और ऐंठ के साथ ही रुतबे पर भी बुरा असर डाला है। गर्मी की छुट्टियाँ बिताने या तीज-त्यौहार पर गाँव जाने वाली इन विदुषियों का प्रभामंडल छिन्न-भिन्न हो चुका है। अब न तो इनकी पहले-सी आवभगत होती है और न ही कोई सास भी कभी बहू थी की अकथ-कथा सुनने के लिए ख़ुशामदी अंदाज़ में इनके आगे-पीछे ही करती हैं। और तो और दूरदर्शन पर शुक्रवार के दिन आनेवाली फिल्मों का क्रेज़ भी खत्म हो चुका है। मार्शल मैक्लूहान के ग्लोबल विलेज़ का ग्लोबल बेचारा कब-का ग्लोकलद्वारा अपदस्थ किया जा चुका है। फिल्मों का नायक तो पहले ही बदल चुका था, अब तो कथानक भी बदल गया है। कुछ रामगोपाल वर्मा टाईप हो गए हैं तो कुछ ने ख़ुद को कपिल और राजू श्रीवास्तव की श्रेणी में फिट कर लिया है। फिल्मों में भूतिया दौर भले ही ढंग से कभी आ नहीं पाया हो, लेकिन टीवी सोप्स ने बॉलीवुड की इस कमज़ोरी को अपने अथक-परिश्रम से ढंक लिया है। भगवान कृष्ण ने बड़ा होने से मना कर दिया है और अब तो गणेश की भी उम्र नहीं बढ़ती क्योंकि दोनों का बाल-रूप ही बच्चों को अट्रैक्ट करता है। हाँ, एक महादेव हैं, जिन्हें अब तक बच्चा बनने का सौभाग्य नहीं मिला है। हनुमान और मूसकराज जैसे इनके सहयोगियों को भी अच्छा-ख़ासा फुटेज मिलने लगा है। नगरीय सभ्यता के कामकाजी-जीवन और परिवार के विघटन से जो धार्मिक और पौराणिक गैप पैदा हुआ था, उसे टीवी ने बख़ूबी भर दिया है। दिन-रात खट-खटकर बेहाल लोगों की सेहत का ख़्याल रखते हुए धर्म-दर्शन का पुण्य-लाभ भी वाया टीवी अथवा सिनेमा, घर बैठे ही प्राप्त किया जा सकता है।

Featured Post

'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.      साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...