होली अपनी सतरंगी छटा बिखेरती हुई यूं निकल गई कि पता भी न चला। कई दोस्त तो तमाम विघ्न-बाधाओं को पार कर, घर भी गए थे। लौटे तो सब-के-सब रंगों में सराबोर। ऐसी बात नहीं कि कपड़े नहीं बदले गए थे। जिस्मों पर कपड़े बिल्कुल साफ और धुले-धुले ही थे, लेकिन मन पर चढ़ा फागुन का रंग बहुत गाढ़ा था। अपनी-अपनी कहानियां थीं, अपने-अपने रंग-ढंग और
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'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ
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उमस और ऊब का माहौल मन को कोंचते... ख़्वाहिस को बढ़ाते... बिल्कुल प्यास की तरह । जबकि नल की ट...
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