शनिवार को छत्तीसगढ़ में जो कुछ हुआ। वह अप्रत्याशित
नहीं था। आपको यह अटपटा लग सकता है। आपकी दृष्टि में मेरी ‘मानसिक
स्थिति’ भी संदिग्ध हो सकती है। वैसे भी हम जिस लोकतांत्रिक दौर से
गुज़र रहे हैं, उसमें कुछ भी असंदिग्ध नहीं है। यह आम धारणा है कि प्रभु-वर्ग या
उससे जुड़े लोगों के विरुद्ध जो कुछ भी निगेटिव होता है, वह अप्रत्याशित ही होता
है। प्रत्याशित घटनाएँ तो आमलोगों से जुड़ी होती हैं। दलित-आदिवासी और कमज़ोर तबके
के लोगों का शोषण-दमन-उत्पीड़न प्रत्याशित होता है। यही समाज और व्यवस्था-सम्मत
धारणा है। हत्या, लूट या बलात्कार हो या आंदोलन— ये तभी बड़े होते हैं, जब बड़े
लोगों के साथ हों या कि वे इनसे जुड़े हों। अब से पहले तक नक्सलियों ने सुरक्षा-बलों
को ही अपना निशाना बनाया था। सैंकड़ों जवान मारे गए होंगे। लेकिन राजनेताओं के
चेहरे पर ऐसी हवाइयाँ पहले कभी उड़ती नहीं देखी। यह देश के नक्सली इतिहास की सबसे
बड़ी घटना है। ऐसा नहीं कि हम दुखी नहीं हैं। हमारे लिए तो हर-एक ज़िन्दगी अहम है,
चाहे वह किसी कर्मा की हो या पटेल की या कि किसी ग़रीब आदिवासी की।
ज़िन्दगी इतनी आसानी से तो नहीं ही मिलती कि मौत भी जश्न
का कारण बन जाए। मौत तो मातम का ही कारण बन सकती है। हाँ, जो मौत के सौदागर हैं,
उनके लिए यह भी सफलता-असफलता का मापदंड हो सकता है। दर्जनों लोगों की मौत के कारण
यह घटना बड़ी नहीं हो जाती। यह घटना इसलिए बड़ी होती है कि इस घटना के शिकार वे
लोग हुए हैं, जो प्रभुवर्ग के हैं। जिनके बारे में यह धारणा आम है कि इन्हें कोई
निशाना नहीं बना सकता। कि मौत भी इनके पास फटकने से डरती है। यही वजह है कि 84 के
दंगों के तमाम प्रभावशाली आरोपी बाइज्ज़त बरी हो जाते हैं। भागलपुर और मुम्बई
दंगों की जाँच रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है। हत्यारे मसीहा के पद पर
बिठा दिए जाते हैं। हिंसा और नफ़रत के सौदागरों को राजकीय सम्मान मिलता है।
आदिवासी औरतों के साथ संगठित रूप से सामूहिक बलात्कार करने-करवाने वाले पुलिसकर्मी
राष्ट्रपति पदक से सम्मानित कर दिए जाते हैं।
छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष, उनके बेटे,
नेता प्रतिपक्ष रहे कर्मा समेत कई जन-प्रतिनिधियों की हत्या हुई है। विद्याचरण
शुक्ल ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। कई जवानों को शहादत देनी पड़ी। इन सभी
के व्यक्तित्व को कुछ पल के लिए भूल जाएँ तो व्यक्ति रूप में इनकी मौत अंदर तक
दहला देती है। एक ही वक़्त दर्जनों घरों में मातम का तसव्वुर भी कम त्रासद नहीं। ‘नक्सलियों
का यह कृत्य जघन्यतम है। इसकी जितनी भी निंदा की जाए, कम है। नक्सलियों के ख़िलाफ
कठोर कार्रवाई हो। राज्य सरकार शांति-व्यवस्था के मामले में बिल्कुल फिसड्डी या नाकारा
है। उसे बर्खास्त किया जाए।’ अगर हम भी प्रधानमंत्री,
गृहमंत्री या कोई और मंत्री होते या किसी राजनीतिक दल के नेता होते तो इन नपे-तुले
जुमलों से काम चला लेते। लेकिन हमारी समस्या यह है कि हम सामान्य शहरी हैं, जो
प्रत्येक अप्रिय घटना पर अपने अंदर ख़ौफ़ के अँधेरे को कुछ और घना होता पाता है।
छत्तीसगढ़ में पिछले तीन दशकों से क्या हो रहा है?
क्या हम सब उससे वाक़िफ़ हैं? अगर हाँ, तो फिर शनिवार की घटना
को आप अप्रत्याशित कैसे मान सकते हैं! किसका विकास हुआ है छत्तीसगढ़ में?
छत्तीसगढ़ किनके नाम पर अलग राज्य बना? अजीत जोगी की सरकार रही हो
या रमन सिंह की, सभी ने आँखें मूँदकर उद्योगपतियों की चरण पूजा की है। आदिवासियों
की ज़मीनें छीनी गईं, मुआवज़े की लूट हुई। रोटी-मकान और रोज़गार माँगने पर गोलियों
का शिकार बनाया गया। अहिंसक तरीके से पुलिस के अत्याचारों के ख़िलाफ़ संघर्ष करने
वालों को देशद्रोही बताकर जेल में ठूंसा गया। हत्यारे और बलात्कारी
अधिकारियों-पुलिसकर्मियों और नेताओं के ओहदे बढ़े, पुरस्कार मिला। तो फिर ऐसी
स्थिति में निरीह आदिवासी अपनी अस्तित्व रक्षा के लिए क्या करें?
अगर देश लोकतांत्रिक है तो सभी को जीवन का अधिकार है।
अगर देश जनतांत्रिक है तो सत्ता का वास्तविक दायित्व, जनहित होना चाहिए। अगर
जनतंत्र में जनता का हित, चंद पूंजीपतियों की तिजोरी भरने की शर्त पर सत्ता द्वारा
अपहृत कर लिया जाए, तो समस्या पैदा होती है। नक्सली ग़लत कर रहे हैं। उन्हें सज़ा
मिले। लेकिन सत्ता-पोषित आतंकवाद, लूटतंत्र और भ्रष्ट-व्यवस्था के ख़िलाफ़ कौन
अभियान चलाएगा? सत्ता को निर्देशित करने वाले हमेशा सात पर्दों की
आड़ लिए रहते हैं। देश और संसाधनों से ज्यादा इनके सुरक्षा-प्रबंधों पर ध्यान दिया
जाता है। किसी ख़ास कम्पनी को फ़ायदा पहुंचाने के लिए नीतियाँ बदल दी जाती हैं। ऐसी
निर्लज्ज स्थिति में आम-आदमी क्या करे? क्या सभी को अन्ना की तरह
टोपी लगाकर, किसी चौराहे पर बैठ जाना चाहिए या केजरीवाल की तरह पार्टी बना लेनी
चाहिए? या कि सभी को सामूहिक रूप से ख़ुदकुशी कर लेनी चाहिए?
नक्सली समस्या आजकल की नहीं है। काफी पुरानी है। फिर
इसका हल क्यों नहीं निकला? सरकार सिर्फ हथियार से इन्हें
ख़त्म करना चाहती है। आदिवासियों की समस्या का समाधान कोई नहीं चाहता, क्योंकि आदिवासियों
की समस्या का समाधान होगा तो पूंजीपतियों के लिए समस्या पैदा हो जाएगी। अभी इस
घटना के बाद एक बार फिर नये सिरे से आदिवासियों का सरकारी क़त्लेआम होगा। जबकि हत्यारे
(नक्सली!) अपने सुरक्षित ठिकानों में आराम फ़रमा
रहे होंगे। आप संदिग्धों की सूची बनाइए, पकड़िए और फिर थर्ड डिग्री टॉर्चर कर उनका
जीवन नरक बनाइए। लेकिन हकीक़त तो यह है कि आज राजनीति, राजनीतिक दल, उसके नेता,
उनके द्वारा निर्मित सत्ता-व्यवस्था और उनकी नैतिकता... सबके-सब संदिग्ध हैं।
(जनसत्ता के 'समांतर' कॉलम में 31 मई 2013 को प्रकाशित)
(जनसत्ता के 'समांतर' कॉलम में 31 मई 2013 को प्रकाशित)

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