ये जो टीवी पर अपने चैनल का बूम
थामे, बाँहें चढ़ाए, बड़ी-बड़ी बातें करता हुआ शख़्स आपको नज़र आता है। जो तमाम
घटनाओं की बारीकियों से आपको रू-ब-रू करवाता है। जो सरकार की नीतियों की धज्जियाँ
पूरे आत्म-विश्वास के साथ उड़ाता है। वही, जिसके किसी थाने या दफ़्तर में पहुँचते
ही पुलिस और कर्मचारी मुस्तैद नज़र आने लगते हैं, थोड़ी घबराहट के शिकार भी हो
जाया करते हैं। जो कभी स्टूडियो में बैठा, किसी राज्य के मंत्री की जिम्मेदारी तय
करता दिखता है। जो तमाम छोटी-बड़ी घटनाओं पर एक्सपर्ट कमेंट देने में बिल्कुल भी
झिझक महसूस नहीं करता। वही, जो मजदूरों की हड़ताल या बंद के दौरान उनकी समस्याओं
की बजाय देश और कम्पनी की अर्थ-व्यवस्था को होने वाले नुकसान को लेकर ज्यादा
चिंतित नज़र आता है। जो बंद के दौरान स्टूडियो में बैठे रहने के बावजूद यात्रियों
से ज़्यादा परेशानी महसूस करता है और बंद का आह्वान करने वालों को कठघरे में खड़ा
करता है। जो सड़कों पर बरसात के मौसम में होने वाले वक़्ती जल-जमाव को भी सरकार के
निकम्मेपन की निशानी क़रार देता है। जो राजनीति से लेकर विदेश नीति और क्रिकेट से
लेकर केट विंसलेट तक के बारे में तमाम छोटी-बड़ी जानकारी रखता है।
गुरुवार, 19 सितंबर 2013
शुक्रवार, 6 सितंबर 2013
वीरा हार को अभिशप्त है, क्यों?
फिल्मों के बारे में अक्सर कहा जाता है कि होती तो
दो-ढाई घंटों की हैं, मगर कई फिल्मों का असर सदियों तक बना रहता है। अभी तो उम्र
के चौथे दशक की सीमा में प्रवेश मिला है। सदियाँ देखी नहीं है। लेकिन हां, बात
बेमानी नहीं। आज़ादी के बाद भारतीय सिनेमा ने कई रंग देखे। फिल्मों के कई दौर
आए-गए, नायक-महानायक हुए। फिल्म निर्माण इंडस्ट्री स्टैबलिश हुई और अब तो हालत ये
है कि सालाना सैंकड़ों की तादाद में फिल्में बनती हैं, रिलीज होती हैं। लोग
देखते-सराहते भी हैं। हमें लगता है कि साहित्य में जितनी धाराएं और आंदोलन हुए
हैं। फिल्मों में भी ऐसे ही वर्गीकरण हैं।
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