अब तो
ज़माना बदल रहा है। ख़ास तौर से शहरों में माँ-बाप अपने बच्चों की पसंद को तरजीह
देने लगे हैं। ‘लव कम अरेंज मैरेज’ का चलन
है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में अभी भी शादी का परंपरागत तौर-तरीक़ा ही स्थापित है।
ऐसी शादियाँ बिना ‘अगुआ’ के मुमकिन नहीं हुआ करतीं। अगुआ
की भूमिका को समझने का सबसे आसान तरीक़ा तो यही है कि आप किसी मवेशी मेले में जाएँ
और वहाँ गाय-भैंस या बैल की बिक्री में जुटे दलाल की बातें सुनें। जैसी बातें वहाँ
पर होती हैं, कमोबेश वैसे ही संवाद अगुआ के मुँह से निर्झर की तरह उस वक़्त झड़ते
हैं, जब वह किसी विवाह योग्य वर अथवा वधू के बारे में संबंधित पक्ष को बता रहा
होता है। अगुआ की छवि कैसी होती है? इसको जानने के लिए लोकगीतों पर भी
ग़ौर किया जा सकता है। अगुआ से जुड़ा शायद ही कोई ऐसा लोकगीत आपको मिले, जिसमें
उसकी प्रशंसा की गई हो या धन्यवाद दिया गया हो!
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)
Featured Post
'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ
1. साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...
-
लोकतंत्र है। अर्थतंत्र है। भेंड़तंत्र है। भीड़तंत्र है। लूटतंत्र है। सर्वत्र फैला ढोंगतंत्र है। यंत्रवाद है। बौद्धिक साम्राज्यवाद है। सिय...
-
उमस और ऊब का माहौल मन को कोंचते... ख़्वाहिस को बढ़ाते... बिल्कुल प्यास की तरह । जबकि नल की ट...
-
बाढ़ का पानी अब उतार पर था। जलमग्न धरती कहीं-कहीं अपना कूबड़ दिखाने लगी थी। छोटी-छोटी मछलियों की छलमलाहट बढ़ गई थी। वही जल-धारा, जो कल...
.jpg)