‘अक्कड़-बक्कड़’ है क्या? औपन्यासिक कृति या कोई बाल-क्रीड़ा? रपटन-भरी भाषा में फिसलती-गिरती ज़िन्दगी की शल्यक्रिया या किसी बेशर्म गप्पी
का वायवीय गल्प? यह क्या सचमुच वैसा ही है जैसा कि ‘अस्सी-नब्बे पूरे सौ?’ शैली तो कुछ ऐसी ही है जैसे
कोई बच्चा शब्दों से मगन-भाव खेल रहा हो! लय और लोच के सहारे
भावात्मक रूप से हल्के हिंडोले पर डोल रहा हो! लेकिन ऐसा है
नहीं। पाठ के समय धैर्य और सावधानी ज़रूरी है क्योंकि असावधानी की स्थिति में
रपटने, वाग्जाल में उलझने, शब्दों के कीचड़ में लिथड़ने और लक्ष्यार्थ तक पहुँचने
में बिल्कुल जलालपुरिए की तरह अंततः विफल रहने की पूरी गुंजाइश है। सावधानी और
गंभीरता इसलिए भी कि यह ‘व्यंग्य उपन्यास’ है और बकौल श्रीलाल शुक्ल ‘व्यंग्य लेखन का सम्बंध
सामाजिक स्थिति की मूल्यगत आलोचना से है।’ तो उपन्यास पढ़ते
वक़्त इस सूत्र-वाक्य को दिमाग़ में रखना ज़रूरी है, तभी हम वास्तविक कथ्य और
वातावरण तक पहुँच पाएँगे क्योंकि उपन्यास की भाषा में भी रपटन है। यह आपको नंगलों
की तरह भटका भी सकती है और आप किसी क्षेत्र-विशेष की मरीचिका में उलझ सकते हैं,
कथ्य और वातावरण के ‘भेदाभेद’ को समझने
से चूक सकते हैं।
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