रामकथा बाँचने वाली शैली में कहूँ तो भारत
भूमि के कण-कण में राम हैं, भारतीय मानस के क्षण-क्षण में राम हैं। भारत-भूमि पर
वास करने वाले जन-जन में राम हैं। राम हैं तो भारत है। राम हैं तो हिन्दुस्तान है।
राम मनुष्य-मात्र के कल्याण का निमित्त हैं। राम हैं तो मंगल है। राम करुणा-पुरुष
हैं। राम मर्यादा-पुरुष हैं। दुष्ट-दलन करने वाले राम हैं। दुख-हरण करने वाले राम
हैं। राम हैं तो वाल्मीकि हैं। राम हैं तो कबीर हैं। राम हैं तो तुलसीदास हैं। ऐसे
लोगों की संख्या भी कम नहीं जो यह मानते हैं कि वाल्मीकि हैं तो राम हैं। कबीर हैं
तो राम हैं। तुलसीदास हैं तो राम हैं। धर्म और साहित्य इसी बिन्दु पर अलग होते
हैं। पहला पक्ष दूसरे के विरुद्ध साक्ष्य लेकर उपस्थित होगा और यह दावा पेश करेगा
कि राम तो आदि और अनंत हैं। राम का ज़िक्र तो वेदों में है, पुराणों में है, उपनिषदों
और अरण्यक में है। वाल्मीकि नहीं होते तो भी राम होते। कबीर नहीं होते तो भी राम
होते। तुलसीदास नहीं होते तो भी राम होते। राम तो भगवान हैं। घट-घट व्यापी हैं,
अविरल और अविनाशी हैं। आस्था तो यही कहती है, किन्तु विवेक विरोध करता है।
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