मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शेर याद आता है—हर एक बात पे कहते हो
तुम कि तू क्या है/तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है! अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू यानी बात करने का अंदाज़ अथवा सलीक़ा या
तरीक़ा। जब कभी मैं मुस्लिम समाज और संस्कृति को केन्द्र में रखकर बनाई गई
फ़िल्में देखता हूँ तो ज़्यादातर फ़िल्मों को देखने के बाद जो पहली प्रतिक्रिया
मेरे ज़ेहन में उभरती है, वह यही है। बड़ी कोफ़्त होती है। एक अजीब क़िस्म की
अज़ीयत से दो-चार होता हूँ। सतही तौर पर देखें तो ये फ़िल्में मुसलमानों के
ज़ख़्मों पर मरहम रखने वाली लगती हैं, मुसलमानों की तरफ़दारी करने वाली नज़र आती
हैं। लेकिन हक़ीक़त में ये बिल्कुल अलग ‘रोल’ अदा करती हैं। कम-से-कम बॉलीवुड की बहुसंख्य फ़िल्मी कहानियों में जिन
स्टिरियोटाइप्स को बुना जाता है, वे अपने वास्तविक स्वरूप में मुसलमान-विरोधी
धारणाओं को पुष्ट करने वाले होते हैं। मैंने जान-बूझकर शब्द ‘धर्म’ का इस्तेमाल नहीं किया है क्योंकि मैं जानता
हूँ कि धर्म और समाज बिल्कुल जुदा चीज़ें हैं, जबकि बदक़िस्मती से हमारे मुल्क में
मुस्लिम समाज और इस्लाम दोनों को पर्यायवाची मान लिया गया है। (हालांकि यही बात
हिन्दू अथवा अन्य समाज और धर्म के लिए भी बहुत हद तक सही है।) आख़िर इतने मोटे भेद
को इतना महीन किसने और क्यों बना दिया? क्या यह किसी साजिश
का परिणाम है? या कि मुसलमानों ने ख़ुद ही अपने सिर ये लानत
लपेट रखी है? या कि बहुसंख्यक समाज के एक ख़ास तबक़े ने यह खोटा
सिक्का गढ़ा और फिर अपनी पहुँच और ताक़त के बल पर आम कर दिया? फिर सोचता हूँ कि हमारे यहाँ कुछ भी मुमकिन है। हमारा समाज तो ख़ुद ही ‘टैबू’ का ज़ख़ीरा है। जहाँ क़ुदरत का सबसे ख़ूबसूरत
रिश्ता भी ‘टैबू’ की गिरफ़्त में हो,
वहाँ दो फ़िरक़ों, दो जातियों, दो धर्मों के बीच अगर सम्वादहीनता, अजनबीपन या
अश्यपृश्यता की भावना घर किए बैठी भी है तो इसमें अजूबा क्या है!
बचपन की कुछ बातें याद आती हैं। घर के बड़े-बुज़ुर्गों की
ज़ुबानी हमारे जवान होने तक अक्सर ऐसी कहानियाँ दुहराई जाती रही हैं कि ‘हिन्दुओं के घर का कुछ मत खाना, वे सुअर का गोश्त खाते हैं।’ इस वाक्य में ‘हिन्दुओं’ की
जगह ‘मुसलमानों’ कर दीजिए और ‘सुअर’ की जगह ‘गाय’ तो भी यह वाक्य बिल्कुल सही है। इसके बाद फिर ‘शियाओं
के घर का पानी कभी नहीं पीना चाहिए क्योंकि वे पानी में पहले थूकते हैं, फिर तुमको
देते हैं।’ इस वाक्य में भी ‘शियाओं’ को ‘सुन्नियों’ से अपदस्थ कर
दीजिए तो भी यह झूठ नहीं हो जाएगा। फिर जब हम बड़े होते हैं, भिन्न-भिन्न
धार्मिक-समूहों और जातियों के लोगों से सम्पर्क में आते हैं, तब जाकर कहीं यह राज़
फ़ाश होता है कि अमाँ, हमारे पुरखे तो बड़े काइयाँ निकले!
उन्होंने हमें अब तक फ़रेब में रखा जबकि राम तो बिल्कुल रहीम जैसा है और करतार भी
डेविड ही की तरह है! शिया दोस्त भी पानी वैसे ही पेश करता है
अपने सुन्नी दोस्त को जैसे एक सुन्नी दोस्त अपने शिया दोस्त को करता है! फिर ये जो हमारे बड़े-बुज़ुर्गों ने हमसे झूठ कहा, क्यों कहा? साथ ही यह हैरत भी कि जब इसी उम्र में हमने जान लिया कि ऐसा-वैसा कुछ भी
नहीं है तो फिर वे लोग ताउम्र इस तथ्य से नावाक़िफ़ कैसे रह गए? क्या उनके बड़े-बुज़ुर्गों ने भी उन्हें अंधेरे में रखा था? लेकिन जैसे हम इनके झूठ को बहुत दिनों तक सच नहीं मानते रह सके, वैसा ही
कुछ इनके साथ क्यों नहीं हुआ? ...तो क्या इन्होंने ख़ुद को
जान-बूझकर अंधेरे में रखा या ताउम्र अंधेरे में रहने का नाटक करते रहे? ...और अगर नाटक ही कर रहे थे तो आख़िर क्यों कर रहे थे? एक ही मुहल्ले, एक ही गाँव, एक ही ज़िले, एक ही राज्य और अंततः एक ही मुल्क
का बाशिंदा होने के बाद भी राम-रहीम या करतार-डेविड के बीच दूरी बनाए रखने की क्या
मजबूरी है? इनके मिल-जुल कर रहने या सुख-दुख में साथ होने से
या सांस्कृतिक रूप से एक होने से किसको ख़तरा हो सकता है भला! निश्चित रूप से दाल में कुछ तो काला ज़रूर है। वैसे एक बात क़ाबिल-ए-ग़ौर
यह भी है कि तब सामाजिक स्तर पर शाब्दिक प्रतिबंध और मिथ्या कथनों के माध्यम से ही
दो जातियों अथवा धर्मों के बीच अलगाव क़ायम रखने की कोशिश होती थी, किन्तु अब ‘साम, दाम, दण्ड, भेद’ तमाम तरह की नीतियों का अनुसरण
किया जा रहा है। कहने की ज़रूरत नहीं कि पहले की तुलना में कुण्ठा एवं घृणा का ये भाव
जो अधिक घनीभूत हुआ है, उसमें सम्प्रेषण के विभिन्न माध्यमों की भूमिका ‘कैटलिस्ट’ जैसी रही है। किसी जाति अथवा समुदाय विशेष
के लिए जो इतने सारे स्टीरियोटाइप्स क्रिएट किए गए हैं, वे महज़ फ़रेब हैं! कम-से-कम बुद्धिजीवी तबका तो यह जानता ही होगा! या
कि ये लोग भी हमारे पुरखों की तरह भोले हैं या जान-बूझकर अंधेरे में रहने का नाटक
कर रहे हैं?
हमारा सिनेमा क्या कर रहा है? ये जो इतने स्टीरियोटाइप्स हैं कि ‘मुसलमान कट्टर
होते हैं’; ‘मुसलमान भरोसे के क़ाबिल
नहीं होते’; ‘मुसलमान धोखेबाज़ होते
हैं’; ‘मुसलमान वतनपरस्त नहीं हो सकते’; ‘मुसलमान गंदगी पसंद होते हैं। उनके मुहल्ले में जाने
से पहले नाक पर रूमाल रख लेना’; ‘मुसलमान
पाकिस्तानपरस्त होते हैं’; ‘मुसलमान की
पहली मुहब्बत गांधी नहीं जिन्ना है’; ‘मुसलमानों
के लिए इस्लाम पहले है, वतन बाद में’; ‘मुसलमानों पर अन्य धर्मावलम्बियों की तुलना में उलेमाओं का असर अधिक होता
है’; ‘मुसलमान चार-चार शादियाँ करते हैं
और दस-दस बच्चे पैदा करते हैं’; ‘सारे
आतंकी मुसलमान होते हैं या मुसलमान आतंकवादी होते हैं’; ‘मुसलमानों का एक ख़ास ड्रेस कोड होता है। वे चौड़ी मोड़ी वाला पाजामा,
कुर्ता और टोपी पहनते हैं। आँखों में सुरमा लगाते हैं और कंधे पर मुसलमानी गमछा
रखते हैं।’ इन्हें गढ़ा किसने है? क्या
कभी यह सोचा गया कि फ़िल्मों में इन स्टीरियोटाइप्स का इस्तेमाल अंततः लोक-समाज
में प्रचलित भ्रांत-धारणाओं को पुष्ट करने का ही काम करते हैं? अनुपम खेर कहते हैं कि फिल्में केवल मनोरंजन का साधन नहीं होतीं, बल्कि
वे सामाजिक बदलाव का भी माध्यम हैं। लेकिन इस बदलाव की दिशा क्या है? दुष्यंत कुमार का एक शेर है कि “सिर्फ हंगामा खड़ा करना
मेरा मकसद नहीं/सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए”।
लेकिन हिन्दी सिनेमा का वर्तमान, विशेष रूप से मुसलमानों के संदर्भ में केवल
हंगामे और स्टीरियोटाइप्स को मज़बूत बनाने तक ही सीमित है। यह सामाजिक बदलाव की
दिशा में नहीं, बल्कि सदियों से पोषित भ्रांत-धारणाओं को सुदृढ़ करने की दिशा में
अग्रसर है। नतीज़तन बदलाव की शक्ल में जहाँ एक तरफ़ नफ़रत और बदगुमानियाँ बढ़ रही
हैं तो दूसरी तरफ भय और कुण्ठा का विस्तार हो रहा है। सन 2015 में केन्द्रीय
संस्कृति मंत्री ने कहा कि “पूर्व राष्ट्रपति डॉ. कलाम
मुसलमान होने के बावजूद एक राष्ट्रवादी व्यक्ति थे।” कुछ
लोगों ने विरोध किया तो कुछ ने यह सफ़ाई पेश की कि मंत्री का मोटिव वो नहीं था जो
समझा गया। क्या सचमुच मंत्री का इरादा नेक था? क्या यह एक
अन्य स्टीरियोटाइप कि ‘मुसलमान देशभक्त नहीं होता’ पर आधारित नहीं था? हमारी ज़्यादातर मुस्लिम सोशल फ़िल्मों में
क्या यही बात बार-बार दुहराने की कोशिश नहीं की जा रही है? वे
एक आदर्श मुस्लिम को चुनते हैं, फिर उसके बरक्स पूरे मुस्लिम समुदाय को प्रतिपक्ष
के रूप में खड़ा कर कन्फ्लिक्ट पैदा करते हैं। धारणा क्या बनती है? सारे मुसलमान बुरे नहीं होते। यानी कुछ अच्छे मुसलमान भी होते हैं लेकिन
बुरे तथा अराजक मुसलमानों की तादाद बहुत ज़्यादा है। अर्थात एक समाज के रूप में
मुसलमान राष्ट्रविरोधी है। भले व्यक्ति रूप में कुछ अच्छे हों। अब ज़रा आप इस
स्टीरियोटाइप का विरोध कीजिए। परिणाम यह होगा कि आप कट्टर और साम्प्रदायिक व्यक्ति
के रूप में चिह्नित कर दिए जाएँगे। अकबर इलाहाबादी का एक शेर है—हम आह भी करते हैं
तो हो जाते हैं बदनाम/वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता। यह स्थिति बिल्कुल
‘जबड़ा मारे रोवे न दे’ वाली है।
मार्शल मैक्लूहान कहते हैं कि सिनेमा ‘हॉट मीडियम है। अर्थात यह दर्शक के दिलो-दिमाग़ पर त्वरित और
गहरा असर डालता है। गर्म-मिज़ाजी और त्वरित प्रतिक्रिया को जन्म देता है।’ जाहिर है कि सिनेमा बनाने वाले इस तथ्य से भलीभांति परिचित होंगे! परिचय के बावजूद वे जिस तरह से बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ गुमराही,
घृणा और प्रतिक्रियावाद की दिशा में प्रवृत्त करने की साजिश में जुटे हैं, वह इस
माध्यम की आदर्श अवस्थिति को खंडित करने वाली है। ऐसा नहीं है कि तमाम फ़िल्मों
में ऐसा ही हो रहा है या हमेशा से ऐसा ही होता रहा है, बल्कि हिन्दुस्तान की पहली
बोलती फ़िल्म ‘आलमआरा’ थी जो ‘मुस्लिम सोशल’ थी और जो भारतीय सिनेमा का पहला गीत
था, वह भी ‘दे दे ख़ुदा के नाम पर’ था।
पहले की ऐसी बहुत सी फ़िल्में हैं, जिसका नायक मुस्लिम नामधारी हुआ करता था और
फ़िल्में हिट भी हुआ करती थीं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ‘कूली’। विभिन्न सामाजिक-पारिवारिक-आर्थिक समस्याओं पर बड़ी ही अर्थपूर्ण एवं
सकारात्मक फ़िल्में बनी हैं, बन भी रही हैं। लेकिन जैसे ही ‘मुस्लिम
सोशल’ फ़िल्म की बारी आती है, चीज़ें बिल्कुल बदल जाती हैं।
वैसे हिन्दुस्तानी सिनेमा में एकांगी सोच का बोलबाला कोई नयी घटना नहीं है। यह
प्रारम्भ से ही सम्यक समाज के दृश्यांकन में एक तरह से विफल रहा है और यही कारण है
कि भारत की यथार्थ संस्कृति की बजाय खोखली और क्षद्म सांस्कृतिक भाव-रेखा
खींच-खींच कर एक समृद्ध सांस्कृतिक समाज को अलगाव-आधारित विपन्नता के गह्वर में
धकेलता रहा है। राही मासूम रज़ा ने ‘सिनेमा और संस्कृति’ में इस तथ्य को उद्घाटित करते हुए लिखा भी है कि “हमलोग
‘हिन्दू सोशल’ और ‘मुस्लिम सोशल’ फिल्में बनाते हैं। ‘हिन्दू सोशल फिल्में’ देखिए तो आपको ऐसा लगेगा जैसे
सारे मुसलमान पाकिस्तान भेजे जा चुके हैं और यदि ‘मुस्लिम
सोशल फिल्म’ देखिए तो लगेगा कि हिन्दुस्तान में कोई हिन्दू
रह ही नहीं गया है और सारे मुसलमान नवाब हो गए हैं और अपना मज़े में शायरी कर रहे
हैं। मुसलमान चोर, जेबकतरा, दुकानदार, वकील, सिपाही, ‘चना
जोर गरम’ बेचने वाला वगैरह नहीं हो सकता। मुस्लिम सोशल
फिल्मों में या तो वह नव्वाब होगा या शायर या नव्वाब का मुसाहिब। ‘मेरे महबूब’ और ‘मेरे हुजूर’ जैसी फिल्में हिट होती हैं और ‘तीसरी क़सम’ फ्लॉप। नतीज़ा यह निकला कि वही फ़िल्में हिट होती हैं (या हिट होने लगी
हैं) जिनका भारतीय संस्कृति से कोई रिश्ता नहीं होता।(पृ.29) जो बात राही साहब
अपने दौर की फ़िल्मों के लिए कह गए हैं, वही बात हम अपने दौर की फ़िल्मों के लिए
दुहरा सकते हैं। विशेष रूप से मुस्लिम सोशल फ़िल्मों के संदर्भ में तो पक्का। परिवर्तित
परिस्थितियों में फिल्म का मुसलमान किरदार या तो धार्मिक रूप से कट्टर होगा,
स्मगलर होगा, चोर-उचक्का, या फिर डॉन या आतंकवादी होगा। धोखे से कोई सफ़ेदपोश
मुसलमान का किरदार किसी फ़िल्म में आ जाए तो वह किसी ख़ास विचारधारा का
छद्मनामधारी प्रवक्ता लगता है, सामान्य मुस्लिम समाज का नुमाइंदा तो बिल्कुल नहीं।
आख़िर क्यों?
पिछली सदी के आख़िरी दशक से अब तक बनी मुस्लिम सोशल
फ़िल्मों पर ग़ौर करें तो ‘मुसलमान आतंकवादी होते हैं।’, ‘मुसलमान युवक अक्सर गुमराह हो जाते हैं और इस्लाम
के नाम पर अपने ही देश के ख़िलाफ़ शत्रुओं से हाथ मिला लेते हैं।’, ‘मुसलमानों का बुद्धिजीवी तबका भी अंधेरे में है।’, ‘मुसलमान आतंकवादी होते हैं, लेकिन कुछ अच्छे भी
होते हैं।’, ‘मुसलमानों में पाकिस्तान
के प्रति कुछ ख़ास प्रेम होता है।’, ‘वह
मुल्ले-मौलवियों के नियंत्रण में रहता है।’, ‘मुल्ले-मौलवी नहीं चाहते कि मुसलमान देश की मुख्यधारा का हिस्सा बनें।’, ‘सारे मदरसे आतंकवाद का गढ़ होते हैं।’ आदि-इत्यादि। ऐसा नहीं है कि ऐसी दरियादिली सिर्फ़ मुस्लिम सोशल फ़िल्मों
या मुस्लिम किरदारों को लेकर ही दिखाई जाती रही है, बल्कि ईसाई, पारसी और सिख
समुदायों के मामले में भी सिनेमा ने हमेशा स्टीरियोटाइप्स को ही तरजीह दी है। हिन्दुस्तानी
सिनेमा के शुरुआती दौर से अब तक की अधिसंख्य फ़िल्मों पर ग़ौर करें तो आप पाएँगे
कि ईसाई पुरुष पात्र सामान्यतः शराबी होंगे या फिर विलेन होंगे या किसी विलेन के
गुर्गे, जबकि स्त्री-पात्र बिल्कुल बिंदास। वह अपने प्रेमी से विवाह-पूर्व सेक्स
में बिल्कुल भी नहीं हिचकेगी। वह पुरुषों के साथ बिना किसी लाज-संकोच के
घूमने-फिरने वाली होगी। फ़िल्म ‘जूली’
और ‘बॉबी’ को देखकर ऐसा ही लगता है।
यही क्यों? ‘गाइड’ की रोज़ी और ‘कॉकटेल’ की
वेरोनिका के किरदार से जो आपकी समझ बनती है, वह भी तो यही है। सिख भोला तो होगा
ही, साथ ही गुस्सैल और निडर भी होगा। संता-बंता जैसे चुटकुलों की आड़ में ‘सिख मूर्ख होते हैं’ जैसी भ्रांत-धारणा को आम किसने किया? हालांकि यह भी ग़ौर करने वाली बात है कि फ़िल्मों में सिखों की उपस्थिति अभी
महज एक-डेढ़ दशक पुरानी बात ही है। उससे पहले की अधिसंख्य हिन्दी फ़िल्मों में सिख
सिरे से ग़ायब हैं। फ़िल्मी सिख स्त्रियाँ भी सामान्य से अधिक चपल और शोख़ होंगी।
प्रसंगवश एक बात याद आ रही है। हमारी एक सिख मित्र ने कभी बातचीत के दौरान कहा था
कि ‘यार ये दिल्ली के जो पढ़े-लिखे दल्ले हैं, उन्हें लगता
है कि पंजाबी लड़कियाँ सेक्स के लिए ईज़ली उपलब्ध होती हैं। नौकरी या कोई भी
छोटा-मोटा लालच दिखाओ, फ़ौरन तुम्हारा बिस्तर गर्म करने को तैयार हो जाएँगी।’ यह बात उसने किसी मिथ्या धारणा के आधार पर नहीं कही थी, बल्कि यह उसका
अनुभव था। फिल्म का कोई भी पारसी किरदार कभी भी ढंग से न तो उर्दू बोल पाता है और
न ही हिन्दी। आख़िर क्यों? कहने की आवश्यकता नहीं कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी
स्वार्थी-तत्त्वों द्वारा स्टीरियोटाइप्स को इतना अधिक मज़बूत कर दिया जाता है कि
एक सामान्य आदमी अंततः ‘हैरत’ में
तब्दील हो जाता है। तुलनात्मक रूप से यदि देखें तो ‘मुस्लिम
सोशल फ़िल्मों’ और अन्य फ़िल्मों में मुसलमान किरदारों की
हालत दयनीय है। वह या तो धर्मभीरू, धर्मांध, पर-धर्मावलम्बियों के प्रति नफ़रत से
लबरेज़, गद्दार, राष्ट्रविरोधी, आतंकवादी, अपराधी आदि है या फिर बड़ा ही
परहेज़गार, ग़रीब या नेकी का फ़रिश्ता, अतिशय राष्ट्रवादी, या बिल्कुल नमूना टाइप।
2017 में एक फ़िल्म आई थी ‘अलिफ़’। फ़िल्म का एक किरदार है—जमाल। अब ज़रा उसकी
एंट्री देखिए। बंदा बाइक पर सवार है। सिर पर हरी पगड़ी है। कुर्ता भी हरा है और
पाजामा काला। बाल काफ़ी लम्बे-लम्बे हैं। कंधे पर मुसलमानी गमछा है। आँखों पर
सस्ता-काला चश्मा है। दाढ़ी-मूँछें माशाअल्लाह बड़ी ही स्टाइलिश हैं। अरे हाँ, आँखों
में इन्होंने सुरमा भी लगा रखा है। अगले ही सीन में यह भी क्लियर हो गया। अब ज़रा
उनकी बाइक पर ग़ौर कीजिए। सड़क किनारे जितने प्लास्टिक स्टीकर्स मिलते हैं,
सारे-के-सारे इन्होंने अपनी बाइक के थोबड़े पर चिपका रखे हैं। ‘786’, ‘माशाअल्लाह’, ‘अल्लाह-मुहम्मद’ और पता
नहीं क्या-क्या! गाड़ी के दोनों तरफ जो सेफ्टी लेग-गार्ड है,
उस पर इस्लामी झंडा डंडे के सहारे फर्र-फर्र करता लहरा रहा है। बनारस की सड़क पर
इस शान से इसकी सवारी निकाली गई है कि इस जोकर को देखकर बेशाख़्ता फ़िल्म ‘जोधा-अकबर’ का गीत ‘अज़ीमुश्शान
शहंशाह जलालुद्दीन अकबर’ चीख़ने को दिल मचलने लगता है। अद्भुत
दृश्य-निर्माण! अभिभूत होने को जी चाहता है, लेकिन फिर सोचता
हूँ कि ऐसा नमूना शायर दुनिया के किस हिस्से में पाया जाता होगा! फ़िर ख़्याल आता है कि मैं जो देख रहा हूँ वह हक़ीक़त नहीं, फ़िल्म है और
इसके सभी पात्र काल्पनिक हैं। मदरसे में मैंने भी पढ़ाई की है और भलीभांति जानता
हूँ कि वहाँ ज़्यादातर परिवार अपने बच्चों को सिर्फ इसलिए भेजते हैं ताकि वह
दीन-इस्लाम की प्राथमिक जानकारी प्राप्त कर सकें। उसके बाद उन्हें सामान्य स्कूल
में रोज़गारपरक शिक्षा के लिए नामांकित कर दिया जाता है। बहुत कम छात्र होते हैं,
जो हाफ़िज़-ए-कुरान या मौलवी-क़ारी आदि की पढ़ाई करते हैं। लेकिन इस फ़िल्म में तो
उल्टी ही गंगा बह रही है। हकीम साहब की बहन जो पाकिस्तान ब्याही गई थीं,वहाँ की
जहालत से परेशान होकर किसी तरह बनारस लौटी हैं और वह अपने भाई को इल्म की अहमियत
समझा रही हैं। अच्छी बात है। कोई ज़रूरी नहीं कि जिस्मानी मर्ज़ का इलाज करने वाला
शख़्स ज़ेहनी-मर्ज़ का शिकार न हो। ख़ैर, अलिफ़ को मदरसे से निकाल ‘सेन्ट अल-हनीफ़ इंटर कॉलेज’ में दाख़िला करा दिया
जाता है। कॉलेज के नाम पर ग़ौर कीजिए और फिर आगे के कथानक पर अपना सिर पीट लीजिए। बहुसंख्यक
हिन्दू बच्चों के बीच बेचारा अलिफ़ अकेला मुसलमान। यहाँ मदरसे के मौलवी और मुहल्ले
के साहेबान से माँ-बाप परेशान, उधर हिन्दू शिक्षक की निर्दयता से अलिफ़ की सांसत
में जान। लहजा काव्यात्मक हो रहा है। क्या करूँ, मुस्लिम सोशल फ़िल्में होती ही
इतनी गंभीर हैं कि जोकर भी शायर हो जाता है। मदरसे का मौलवी है कि अलिफ़ का स्कूल
छुड़वाने पर आमादा है और हिन्दू शिक्षक है जिसकी निगाह में अलिफ आतंकवादी है। मुझे
तो आज तक ऐसा हिन्दू शिक्षक नहीं मिला और उम्मीद है किसी सभ्य हिन्दू को भी ऐसा
कोई मुसलमान शिक्षक नहीं मिला होगा। फिर इस फ़िल्म का मैसेज क्या है? यही कि मुस्लिम समाज मुल्लों और मदरसों की गिरफ़्त में है। अगर कोई इनके
चंगुल से निकलना भी चाहता है तो हिन्दू कट्टरपंथी निकलने नहीं देते। विशेष क्या है? वही जो अधिकांश फ़िल्मों में होता है।
‘फ़िराक़’ और ‘शाहिद’
जैसी फ़िल्में जो भारत के सामाजिक रग-ओ-रेशे का यथार्थ चित्रण करने
वाली हैं, पिट जाती हैं, जबकि हवा-हवाई
कहानियों और स्टीरियोटाइप्स को लेकर बनाई गई फ़िल्मों को सिर-आँखों पर बिठाया जाता
है। ‘रोड टू संगम’ और ‘अलिफ़’ जैसी फ़िल्में ऐसी ही हैं। ऊपरी तौर पर दोनों
ही फ़िल्में ‘मुस्लिम सोशल’ हैं,
लेकिन जब आप बारीकियों में जाते हैं तो पाते हैं कि अरे ये तो ‘एंटी मुस्लिम’ हैं! ‘आप लोग
बुरा मत मानिएगा, पर हम ई जानना चाहते हैं कि ये गाड़ी
गांधीजी का न होके किसी मुसलमान भाई या जिन्ना का होता तो का आप हमको रोकते?’(रोड टू संगम) हसमत भाई का यह जो सवाल है, कितना
जायज़ है? सिर्फ़ सम्वाद की बात नहीं है। उस दृश्य को ग़ौर
से देखिए। वे सारे मुसलमान जो हसमत भाई को दुकान खोलने से रोकने आए हैं, उनके चेहरों को ग़ौर से देखिए। यह है क्या? क्या
आपको यह संवाद सुना-सुना सा नहीं लग रहा? देश को आज़ाद हुए
आधी सदी से ज़्यादा हो गया। मुल्क के बंटवारे की उम्र भी उतनी ही हुई। लेकिन एक
ख़ास तबके के दिमाग़ में आज भी शब्द पाकिस्तान किसी साँप की मानिंद कुंडली मारे
बैठा है। कभी पाकिस्तान, कभी जिन्ना, कभी आतंकवाद तो कभी इस्लाम—घूम फिर आ मौगी, वही
गीत गा मौगी। मैं पूछता हूँ कि ‘जला है जिस्म
जहाँ दिल भी जल गया होगा/कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है’(ग़ालिब)। मैं इसी मुल्क में पैदा हुआ। मुझे तो यह भी नहीं
पता कि पाकिस्तान की चौहद्दी क्या है। वो तो किशोरावस्था में जब मैं दरभंगा के एक
साहित्यिक गोष्ठी में गया तो पता चला कि यहाँ पर एक मिनी पाकिस्तान है। पता लगाया
तो वह ‘उर्दू बाज़ार’ निकला।
मुसलमान बस्तियों और बाज़ारों को पाकिस्तान का लकब बख़्शनेवालों से पूछना चाहिए कि
वे आख़िर क्यों हर शहर-हर बस्ती में पाकिस्तान ढूँढते फिरते हैं? यह क्यों नहीं मान लेते कि भारत का मुसलमान उतना ही भारतीय है
जितने कि वे हैं! दिक़्क़त किसको है और क्यों है?
एक तो मुसलमानों की समस्याओं को केन्द्र में रखकर कोई
फ़िल्म बनती नहीं। ज्यादातर फिल्मों का मुसलमान नकली होता है। मुस्लिम सोशल के नाम
पर आतंकवाद और बेसिर-पैर के कथानकों पर फिल्में अधिक बनाई जाती हैं। धोखे से अगर
कभी मुसलमानों की हक़ीक़त बयान करने वाली यथार्थ फिल्में बन भी जाएँ तो वे चल नहीं
पातीं क्योंकि हालात पहले जैसे नहीं रहे। धरातल पर सियासत और मज़हब के झंडाबरदारों
ने नफ़रत की जो खेती की है उसने बहुसंख्यक मानस को कलुषित कर दिया है। अब वे यह
हज़म ही नहीं कर पाते कि मुसलमान या कोई अन्य अल्पसंख्यक समुदाय का व्यक्ति नायक
भी हो सकता है। (आज़ादी के बाद के हालात में भी कभी ऐसी स्थिति नहीं बनी थी, जैसी
कि आज।) क्या आपको फिल्म ‘शाहिद’ याद है। जेल
में आतंकवाद के नाम पर बंद किए गए बेगुनाह मुसलमानों को रिहा करवाने वाला वकील! अक्तूबर 2013
में हंसल मेहता की यह फ़िल्म रिलीज़ हुई थी। फ़िल्म चली
नहीं। क्यों? इसका जवाब हंसल मेहता ने ख़ुद ही दिया था
कि “देश के बहुसंख्यक दर्शक मुसलमान नायक की फ़िल्में देखना
पसंद नहीं करते। यह हमारे देश की कड़वी सच्चाई है कि हिन्दी फ़िल्मों के
नायक-नायिकाओं के नाम मुस्लिम परिवारों से नहीं लिए जाते। रेगुलर हिन्दी फ़िल्मों
का नायक मुख्य रूप से राज,
रोहित, अजय, विजय ही होता है। ज़रूरत है कि दर्शक ‘शाहिद’ को फिर से देखें और
उसके जज़्बे को समझें। यह हमारे दौर की एक ज़रूरी फ़िल्म है।”(जागरण सखी, जून 2014, पृ.107,
अजय ब्रह्मात्मज) गुजरात दंगे पर आधारित नंदिता दास की
फ़िल्म ‘फ़िराक़’ के साथ क्या
हुआ? वही जो ‘शाहिद’ के साथ हुआ। ‘सिर्फ़ सात सुरों में इतनी क़ाबलियत
कहाँ कि ऐसी नफ़रत का सामना कर सकें।’(फ़िराक़, खान साहब) जब पूरे मुल्क में नफ़रत के पटाख़े फूट रहे हों
तो ‘प्यार के सुर’ कहाँ
सुनाई पड़ते हैं। बदलाव की पहली शर्त तो यही है कि पहले मुसलमानों को इंसान तस्लीम
किया जाए। फिल्मों में इंसान के रूप में मुसलमान की खोज भूसे के ढेर में सुई की
तलाश जैसा काम है। ‘माइ नेम इज़ ख़ान’
के नायक और ‘फ़िराक़’ के समीर शेख़ में
साम्य दिखता है। भय दोनों के दिल में है, लेकिन दर्द ज़्यादा गहरा है। उसको जो
पहचान दी गई है, उसकी नहीं है। इसका सबसे शानदार उदाहरण है—‘जॉली
एलएलबी-2’। यह मुस्लिम सोशल फिल्म है, अगर आप इसके नायक का
नाम जगदीश्वर मिश्रा उर्फ जॉली को बदल दें तो। लेकिन यदि यह जॉली जलाल मियाँ होते
तो क्या फिल्म को जो रिस्पौंस मिला, वही मिलता? लेख बहुत
लम्बा हो रहा है। बातें अधूरी छूट रही हैं। खेद है। किन्तु अपूर्ण जीवन में कथ्य
की पूर्णता क्यों चाहिए? मैं तो हिन्दुस्तान के मुसलमान को
पाकिस्तान का पर्यायवाची बनाने वाले मानस से बुद्ध का वही प्रश्न दोहराना चाहता
हूँ जो उन्होंने अँगुलीमाल से पूछा था—मैं तो ठहर गया। तुम कब ठहरोगे?

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