रविवार, 1 जुलाई 2012
गुरुवार, 31 मई 2012
कुछ कणिकाएँ... कुछ क्षणिकाएँ... यूं ही आएँ-बाएँ!!!
(1)
ले आए ये कैसा प्याला
पिये बिना ही जग मतवाला
देख-देख आँखें चुँधियाईं
जग का ऐसा रूप निराला
कब से आँखें धधक रही हैं
जिगर में भड़की है ज्वाला
गुरुवार, 17 मई 2012
गुरुवार, 12 अप्रैल 2012
देवी ये न्याय है या प्रहसन?
साल की पहली तारीख़ थी। सुबह का वक़्त था। नये साल के
स्वागत में आधुनिक लोकतंत्र का एक मसीहा यानी जन-प्रतिनिधि व्यस्त था। पूर्णिया में
अपने आवास पर विधायक राज किशोर केसरी ने दरबार सजा रखा था। दरबारी और भक्त आ-जा
रहे थे, अपना-अपना दुखड़ा सुना रहे थे। फरियाद कर रहे थे, मुराद पा रहे थे। ठंड ने
संवेदनाओं को भी सर्द कर रखा था। कहीं किसी के भीतर घुट रही वेदना ने धीरे-धीरे
प्रतिरोध और फिर प्रतिशोध की ज्वाला का रूप ले लिया था।
शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012
मेरा फ़रिश्ता
मेरे नन्हे, ज्यादा दिनों का
नाता नहीं तुझसे
अभी तो आया है, लेकिन है बड़ा
जादूगर!
मेरे नन्हे, मेरे मन को तूने
बांध लिया है
तेरे जाने ने मुझे जिन्दगी
में पहली बार
अकेलेपन, सूनेपन और बेरंग
जीवन का अर्थ
सीधे-सीधे और बेखटके ही समझा
दिया है
तेरी सूरत आँखों में कुछ बेतरह
जज़्ब है
जब भी सोचता हूँ..,
तू सोते में मुस्कराता
पोर-पोर के दर्द को
अंगड़ाइयों में तोलता
कभी मानूस निगाहों से देखता
कभी कुछ अजीब सा मुँह बनाता
ठीक मेरी बगल में..,
शनिवार, 31 मार्च 2012
कील है कि गड़ी है अभी तक
फिल्मों के बारे में अक्सर कहा जाता है कि होती तो
दो-ढाई घंटों की हैं, मगर कई फिल्मों का असर सदियों तक बना रहता है। अभी तो उम्र
के चौथे दशक की सीमा में प्रवेश मिला है। सदियां देखी नहीं है। लेकिन हां, बात
बेमानी नहीं। आज़ादी के बाद भारतीय सिनेमा ने कई रंग देखे। फिल्मों के कई दौर
आए-गए, नायक-महानायक हुए। फिल्म निर्माण इंडस्ट्री स्टैबलिश हुई और अब तो हालत ये
है कि सालाना सैंकड़ों की तादाद में फिल्में बनती हैं, रिलीज होती हैं। लोग
देखते-सराहते भी हैं। हमें लगता है कि साहित्य में जितनी धाराएं और आंदोलन हुए
हैं। फिल्मों में भी ऐसे ही वर्गीकरण हैं।
बुधवार, 28 मार्च 2012
हम चुप क्यों रहते हैं?
वे लोग जब भी आते हैं
बात-बात पर मुस्कराते हैं
आप जो कुछ भी कहते हैं
समझने के अंदाज़ में...
अरना भैंसे की तरह सिर हिलाते हैं
...
जब हम पानी मांगते हैं
वे प्रदूषण की बात करते हैं
जब हम अनाज मांगते हैं
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)
Featured Post
'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ
1. साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...
-
लोकतंत्र है। अर्थतंत्र है। भेंड़तंत्र है। भीड़तंत्र है। लूटतंत्र है। सर्वत्र फैला ढोंगतंत्र है। यंत्रवाद है। बौद्धिक साम्राज्यवाद है। सिय...
-
उमस और ऊब का माहौल मन को कोंचते... ख़्वाहिस को बढ़ाते... बिल्कुल प्यास की तरह । जबकि नल की ट...
-
बाढ़ का पानी अब उतार पर था। जलमग्न धरती कहीं-कहीं अपना कूबड़ दिखाने लगी थी। छोटी-छोटी मछलियों की छलमलाहट बढ़ गई थी। वही जल-धारा, जो कल...
