बुधवार, 28 मार्च 2012

हम चुप क्यों रहते हैं?


वे लोग जब भी आते हैं
बात-बात पर मुस्कराते हैं
आप जो कुछ भी कहते हैं
समझने के अंदाज़ में...
अरना भैंसे की तरह सिर हिलाते हैं
...
जब हम पानी मांगते हैं
वे प्रदूषण की बात करते हैं
जब हम अनाज मांगते हैं
वे पर्यावरण की बात करते हैं
जब हम काम मांगते हैं
वे वैश्विक अर्थव्यवस्था
और उदारीकरण की बात करते हैं
...
वे गरीबी मिटाने की बात करते हैं
इसके लिए तरीके ढूंढने की खातिर
विशेषज्ञ समिति का गठन करते हैं
जिसकी समय सीमा लगातार...
लगातार बढाई जाती रहती है
हम उम्मीद में बैठे रहते हैं
...
वे सशक्तिकरण की बात करते हैं
और एनजीओ को अनुदान देते हैं
हम भूख के मारे कमज़ोर...
और कमज़ोर होते जाते हैं
जब भूख की पीड़ा
असहनीय होने लगती है
तो हम चिल्ला उठते हैं-
...रोटी... रोटी...
वे मुस्कराते हुए फिर आते हैं
हफ्ते भर के लिए सड़ा अनाज
गोदाम से निकाल हमें बांट जाते हैं
हम भूखे हैं...
इसलिए टूट पड़ते हैं
सड़ा अनाज खा-खाकर
फिर-फिर, रोज़-रोज़ मरते हैं
...
वे खुश होते हैं
हम चुप रहते हैं
जबकि हम जानते हैं
हमारी चुप्पी में ही
उनकी खुशी छुपी बैठी है
फिर भी हम चुप रहते हैं!
सवाल हमें कोंचता है
कोंचता ही रहता है...
हम चुप क्यों रहते हैं?
    *******
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