पर्वत ऊँचा होता है। अडिग होता है। पत्थरों का होता है। तभी सदियों तक तना होता है। माटी के ढूह की उम्र कभी नापी है, किसी ने? गली-मुहल्ले में हो या बियाबान में..., या तो शरारती बच्चे कूद-कूद कर उसका मलीदा बना देंगे या फिर हवा-पानी अपना काम कर जाएगी। ज्यादा अड़ियल और हिम्मती निकली तो मूसकराज उसे इतना खोखला बना देंगे कि वह दलदल जैसी तासीर ग्रहण कर लेगी।
मिट्टी का टीला ज्यादा दिनों तक अस्तित्व में नहीं रह सकता। उसके नहीं रहने के कारण, कुछ भी हो सकते हैं। जाड़े में आप मिट्टी के टीले पर बैठें या कि पहाड़ की चट्टान पर, दोनों ही ठंड का ही एहसास कराएंगे। गर्मी में दोनों की तासीर गर्म हो जाती है। वैसे एक बात मिट्टी के ढूह में ऐसी है जो इसे पहाड़ या चट्टान से अलग करती है। वह ये कि मिट्टी, पत्थरों की तरह न तो ज्यादा गर्म होती है और न ही ज्यादा ठंडी। यहां एक ख़ास किस्म का समन्वय होता है जो सकून बख्शता है।

