मीडिया पर लोग उंगली क्यों
उठाते हैं? मीडिया कुछ मामलों में इतना
दकियानूस क्यों है? कंटेंट को लेकर बेबहरापन क्यों है? मीडियाकर्मियों के साथ इन-हाउस शोषण पर
वरिष्ठ चुप क्यों रहते हैं? जन-सरोकार से जुड़ी ख़बरें अक्सर छूट क्यों जाती हैं? मीडियाकर्म अपनी विश्वसनीयता क्यों खोता जा रहा है? जब पेड न्यूज़ की सभी आलोचना करते हैं तो फिर इस
प्रवृति पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? आतंकवाद
और नक्सलवाद जैसे मुद्दों पर मीडिया उथली भाव-भंगिमा की गिरफ्त में क्यों है? क्या सचमुच मीडिया सत्ता का चापलूस या कि वर्ग विशेष का
प्रतिनिधि बनकर रह गया है? मीडिया में आमजन कहां ठहरते हैं? सवाल इतने हैं कि दिमाग कभी-कभी विद्रोह को आतुर हो
जाता है। लेकिन जवाब...?
पेड न्यूज़ की बात तो सभी
करते हैं, चिंता भी जताते हैं। लेकिन इस पर अंकुश की कोशिश नहीं होती। इसको लेकर
लगातार मीडिया की आलोचना होती रही है। अभी पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के
दौरान एक नई बात सामने आई कि इस बार पेड न्यूज़ का फॉर्म बदल दिया गया। पहले
ख़बरें छापने के लिए पैसा लिया जा रहा था। इस बार ख़बर नहीं छापने के एवज़ में
रूपये की उगाही हुई। आपकी राय क्या है इसपर?
एन के सिंहः देखिए, समाज का एक खास तबका इस तरह की बातें फैला रहा है
ताकि समाज को डीजेनरेट किया जा सके। मीडिया को समाज की नज़र में गिरा सके। इसको बहुत
बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा रहा है। खासतौर से पेड न्यूज़ वाली बात को सत्ताधारियों ने
तूल देने की कोशिश की है ताकि मीडिया की जो छवि है, उसको संदिग्ध बनाया जा सके।
मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं कि मीडिया दूध का धुला है। थोड़ी-बहुत खामियां तो हैं
लेकिन उतनी नहीं, जितनी बताई जा रही है। आप मीडिया के अच्छे कामों को दरकिनार नहीं
कर सकते। मैं पूछता हूं कि अन्ना आंदोलन के कवरेज के लिए मीडिया ने क्या लिया? मुम्बई आंतकी हमले के दौरान
मीडिया 24 घंटे कवरेज में जुटा रहा, उस दौरान उसे क्या मिला? बल्कि
ऐसी घटनाओं के दौरान तो हमने एडवर्टाइजमेंट भी गिरा दिए थे। आप जेसिका लाल
हत्याकांड को क्यों नहीं याद करते? जेसिका के हत्यारों को सज़ा किसने दिलवाई? यह
मीडिया का ही अचीवमेंट था कि जेसिका के दोषी जेल की सलाखों को पीछे हैं। .., तो
लोग सिर्फ मीडिया में निगेटिव ही क्यों ढूंढते हैं? उसकी अच्छाइयों को भी देखा जाना
चाहिए।
आपकी बातों से सहमत हूं।
वाक़ई कई मामलों में मीडिया ने लीक से हटकर काम किया। कई मामलों में मीडिया आम
आदमी की ज़ुबान बना। लेकिन क्या अच्छाइयों के नाम पर बुराइयों से नज़रें चुरा ली
जाए? आप जनता के विश्वास की क़ीमत नहीं वसूल सकते.., पेड
न्यूज़ की समस्या तो है ही।
एन के सिंहः लेजिटमेसी और
लीगैलिटी में बड़ा फ़र्क है। इसको समझने की ज़रूरत है। पेड न्यूज़ का मामला
लेजिटमेसी से जुड़ा है। इस मामले में क़ानून कुछ नहीं कर सकता। आप इस चीज़ की
आलोचना तो कर सकते हैं, लेकिन इसको रोकने के लिए क़ानूनी स्तर पर कुछ नहीं कर
सकते। वैसे भी लोकतंत्र में देश के सियासी भविष्य का फैसला आप जनता पर छोड़ते हैं
और ये भी मानते हैं कि जनता समझदार है। सबसे बड़ा उदाहरण तो चुनाव ही है, जब आप
मानते हैं कि देश की जनता अपना नेतृत्व चुनने में सक्षम है तो आप ये क्यों नहीं
मान लेते कि जनता मीडिया की अच्छाई-बुराई को भी समझने में सक्षम है? ख़बर की हकीक़त क्या है? वो समझ सकती है, समझती है। मेरी
तो जनता से यह अपील भी है कि अगर किसी को लगता है कि किसी चैनल पर चलाई जा रही कोई
ख़बर संदिग्ध है या कि पेड न्यूज़ है,
तो वो इस बात की शिकायत बीईए में करें। बीईए उस चैनल पर कार्रवाई करेगा। पेड
न्यूज़ को लेकर सरकार को परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। इसे जनता की बुद्धिमत्ता
पर छोड़ दिया जाना चाहिए। वह ख़ुद ही स्याह-सफेद का फ़र्क कर लेगी। आप जनता को
मूर्ख नहीं मान सकते।
बिल्कुल आपकी बात सही है कि
पेड न्यूज़ लीगैलिटी का मामला नहीं है। जनता समझदार है, वो सही-ग़लत समझने में
सक्षम है। लेकिन कंटेंट का बेबहरापन तो आपकी नज़रों से छुपा नहीं है। केन्द्र
सरकार ने कंटेंट की निगरानी की बात की तो आपलोगों ने विरोध किया था। लोगों ने कहा
कि हम अपनी मॉनिटरिंग खुद ही करेंगे। ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन भी बना। लेकिन
कंटेंट के मामले में बेबहरापन अभी तक थमा नहीं है।
एन के सिंहः बीईए के गठन को अभी
ढाई साल ही हुए हैं और इस दौरान हमने कंटेट के मसले पर गंभीरता से काम भी किया है।
विज़ुअल्स के मुद्दे पर हमने दिशा-निर्देश जारी किए। उसका असर भी नज़र आ रहा है।
दंगा होने की स्थिति में ऐसी कोई भी तस्वीर दिखाने पर पाबंदी है, जिसके आधार पर
किसी समुदाय की पहचान स्पष्ट होती हो। विभत्स दृश्य आपको न्यूज़ चैनल्स की स्क्रीन
पर अब नज़र नहीं आते। (थोड़ा ठहर कर)... हां, ये बात सच है कि पेट्रोल की कीमत में
अगर एक रूपये या पचास पैसे की बढोतरी होती है तो ये सभी चैनल्स के लिए बहुत बड़ी
ख़बर हो जाती है। ख़ाद-बीज की कीमतों में कई गुना इजाफा भी मीडिया की नज़रों से
अनदेखा ही रह जाता है। यहां मार्केट का दबाव नज़र आता है। टीआरपी की भूख नज़र आती
है। वैसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को अस्तित्व में आए अभी कुल मिलाकर 15 साल ही हुए
हैं.., तो बहुत सी चीज़ें अभी डेवलपिंग प्रोसेस में ही हैं। इन्हें ठीक होने में
समय लगेगा। वक्त के साथ चीज़ें बदलेंगी। हमलोग तो प्रिंट मीडिया के पीयर्स के साथ
बैठकर बातचीत की योजना बना रहे हैं ताकि प्रिंट में भी कंटेंट को लेकर सकारात्मक
बदलाव संभव हो सके।
आपने कहा कि ख़बरों का चयन
कहीं न कहीं मार्केट के नज़रिए से होता है। टैम मशीनें कितनी हैं देश में, क्या ये
वाक़ई टीवी की पूरी व्यूअरशिप का प्रतिनिधित्व करती है?
एन के सिंहः देखो, देश की कुल
आबादी करीब 123 करोड़ है। देश में कुल 24 करोड़ परिवार हैं, जिनमें से 16 करोड़ के
पास टीवी है। इन 16 करोड़ में से साढ़े आठ करोड़ टीवी ग्रामीण इलाकों में हैं,
जबकि साढ़े सात करोड़ टीवी अर्बन एरिया में। तो ये कहना कि टीवी दर्शकों का बड़ा
तबका शहरों में रहता है, ग़लत है। हां, यहां पर बात फिर मार्केट की आ जाती है।
अहमदाबाद जैसे एक शहर में जितनी टैम मशीनें हैं, उसकी तुलना में बिहार में काफी कम
लगाई गई हैं। मामला पर्चेज़ वैल्यू का है। कम्पनियों का मालूम है कि बिहार
इंडस्ट्रियल स्टेट नहीं है। यहां के लोगों का पर्चेज़िंग पावर भी कम है। यानी जिन
शहरों या राज्य की पर्चेज़िंग पावर ज्यादा है, टैम मशीनें वहां ज्यादा लगाई गई
हैं।
(बिच में टोकते हुए)... लेकिन
सवाल तो ये भी है कि जब हम इन चीज़ों को समझते-जानते हैं, फिर भी टैम रेटिंग को
लेकर हाय-तौबा मची रहती है। मीडियाकर्मियों की जान हर हफ्ते टैम रिपोर्ट पर अटकी
होती है। आखिर क्यों? जबकि हम जानते हैं इसी रेटिंग के चक्कर में कंटेंट के
साथ भी खिलवाड़ होता है। आउटपुट के लोगों की परेशानी बढ़ती है। बात तो ये भी हो
रही थी कि टैम रिपोर्ट को मासिक या फिर वार्षिक कर दिया जाए.., तो इस दिशा में
बीईए क्या कर रहा है?
एन के सिंहः देखो हमारी कोशिश
है कि टैम रेटिंग को वीकली की बजाय क्वार्टरली कर दिया जाए। कोशिश अभी जारी है,
भविष्य में ऐसा संभव है। जहां तक व्यूअरशिप का सवाल है तो समझना बेहद आसान है,
मार्केट पैसा वहीं लगाएगा जहां उसको मुनाफे की उम्मीद नज़र आएगी। यानी फिर वही
पर्चेज़िंग पावर वाली बात...
पहले टीवी चैनल्स के लिए
आर्थिक स्तर पर कोई बाध्यकारी नियम नहीं थे। लेकिन अब सुनने में आ रहा है कि अगर
आप न्यूज़ चैनल खोलना चाहते हैं तो आपको सौ करोड़ का एसेट्स शो करना होगा। क्या
आपको नहीं लगता कि ये मीडिया को कॉर्पोरेट्स की गोद में डाल देने जैसा है? इसका मतलब क्या है?
एन के सिंहः टीवी चैनल्स के
लिए 20 करोड़ का ऐसेट्स ज़रूरी कर दिया गया है, लेकिन ये बिल्कुल ग़लत है। नैतिकता
का मानदंड जो सरकार ने तय किया है, बिल्कुल ही बेतुका है। बीस करोड़ से कम की
हैसियत वाले की नैतिकता सरकार की नज़र में संदिग्ध है। यानी अम्बानी इसलिए ज्यादा
नैतिक हैं कि उनके पास 20 करोड़ से ज्यादा की सम्पत्ति है। हम नहीं मानते ऐसा। अगर
मनोरंजन चैनल्स के लिए ये बात कही जाती तो समझ में आती है, लेकिन अगर न्यूज़
चैनल्स के लिए भी वही मानदंड अपनाया जाता है तो साफ है कि न्यूज़ यानी मीडिया के
मोटिव की अनदेखी की जा रही है। सरकार चाहती तो जॉब स्योरिटी के लिए स्पेशल सपोर्ट
सिस्टम खड़ा कर सकती थी। लेकिन उसने ये शॉर्टकट चुना है।
हम न्यूज़ चैनल्स में काम
करते हैं। लोगों को ख़बरों से रू-ब-रू कराना हमारा काम है। लेकिन एक बात समझ में
नहीं आती कि न्यूज़ चैनल पर हम हर आधे घंटे पर मनोरंजन क्यों परोसते हैं। सास-बहू
सीरियल में क्या हो रहा है.., राजू श्रीवास्तव किस पर व्यंग्य कर रहे हैं और किसको
हंसा रहे हैं। क्या ये ठीक है?
एन के सिंहः नहीं-नहीं, सुधार
आ रहा है। कुछ चैनल्स ने तो ऐसे प्रोग्राम बंद कर दिए हैं। इसको कम करने की कोशिश
की जा रही है। देखो, एक बात तो तय है कि आप भड़ैंती कर के न्यूज़ में नहीं बने रह
सकते। इसके लिए आपको कंटेंट की तरफ लौटना ही पड़ेगा। वैसे ये भी एक सच्चाई है कि
समृद्धि बढ़ने के साथ ही समाज में इंटरटेनमेंट की मांग भी बढ़ती है। तो इस लिहाज
से लोग टार्गेट फिक्स करते हैं।
क्या भारतीय मीडिया भी भारतीय
समाज की तरह कास्ट बायस्डनेस का शिकार है? मीडिया का कंटेट डिसाईड
करनेवाला तबका आपकी नज़र में क्या ऐसा ही है?
एन के सिंहः नहीं-नहीं, ऐसी
बात नहीं है। आप भी मीडिया में हैं। आप ही बताएं, आपने कभी ऐसा दबाव महसूस किया।
हैं, मीडिया में कुछ मूढ़ टाईप के लोग हैं, होते हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि
पूरा सिस्टम ही ऐसा है।
मुझे कई बार महसूस हुआ है कि
कुछ मसलों पर मसलन नक्सल और आतंकवाद के मुद्दे पर मीडिया सत्ता से भी ज्यादा तीखा
हो जाता है। मेरी समझ में ये नहीं आता कि किसी नक्सली की गिरफ्तारी के साथ नक्सली
साहित्य की बरामदगी का क्या मतलब होता है?
एन के सिंहः ये समझ का फेर
है। समस्या तो ये भी है कि आज की तारीख़ में मीडिया इंस्टिट्यूट मशरूम की तरह उग
आए हैं। जहां न तो मीडिया एथिक्स और न ही मीडिया से जुड़े क़ानून और न ही कंटेंट
के बारे में कुछ पढ़ाया जाता है। सिर्फ डिग्रियां बांटी जा रही हैं। तो ऐसे लोगों
से आप कैसे अक्लमंदी की उम्मीद रख सकते हैं...
एक और बात, जब हम किसी
बलात्कारी के बारे में ख़बर चलाते हैं तो उसे बलात्कार का आरोपी बताते हैं। इसी
तरह हत्या का आरोपी होता है। गबन का आरोपी होता है। लेकिन अचरज की बात ये कि पुलिस
अगर किसी संदिग्ध को पकड़ती है तो वो सीधे आतंकवादी हो जाता है, सीधे नक्सली हो
जाता है। मतलब...
एन के सिंहः माहौल तो सभी ने
मिलकर बिगाड़ा है। मीडिया तो वही दिखाएगा या बताएगा, जो पुलिस जानकारी देगी। इन
मामलों में मीडिया का मेन सोर्स तो पुलिस की तरफ से दी गई जानकारी ही है। यहां पर
एक बात और ध्यान देने वाली है, वो ये कि नक्सली हों या आतंकवादी, वो दरअसल लिमिटेड
पब्लिक फीगर की श्रेणी में आते हैं। लिहाजा हमारे पास एट द मोमेंट कुछ खास करने
जैसी स्थिति नहीं होती। दरभंगा वाले मसले को ही लीजिए, साइकिल मैकेनिक की
गिरफ्तारी हुई। पुलिस ने बताया आतंकवादी। हमने भी चलाया आतंकवादी। उसके बाद एक तरह
से हमने इस मामले में जासूसी की, सच जानने की कोशिश की तो बात कुछ और ही निकली।
दरअसल ये स्टेट एपरैटस की समस्या है। स्टेट की बदमाशी है। कुछ लोग बायस्ड हो सकते
हैं, सभी नहीं। उम्मीद है चीज़ें बदलेंगी, लेकिन इसमें थोड़ा वक्त लगेगा।...(थोड़ा
रुक कर कुछ सोचने के बाद)... पहले आतंकवादी सीमा पार से आते थे, घटना के बाद
क्लियर भी हो जाता था और इस मामले में इंटेलिजेंस और पुलिस को सहूलत भी रहती थी।
लेकिन अब देश में होमग्रोन टेररिज्म है। पुलिस के सामने संकट है कि वह इसको रोके
तो रोके कैसे..।
बहुत ही सटीक सवाल पूछे हैं और हर विवादित पहलू को छुआ है ,,ये बेबाक साछात्कार सरहनीय है आशा है आप् इस सिलिसिले को जारी रखेंगे
जवाब देंहटाएं.....(अहमद कमाल )
good interview...keep it up.
जवाब देंहटाएंसवाल बहुत दीर्घ हैं, इनको छोटा करना था, छोटे और तीखे सवालों की शैली साक्षात्कार के दौरान बेहतर मानी जाती है। परंतु सवालों की पंक्ति बेहतरीन है।
जवाब देंहटाएंबहुत ही जागरूक और चुटीली बहस ...मीडिया किस तरह से पूंजी के शोषक रूपों के साथ नाभिनाल हैं ..
जवाब देंहटाएंपढ़कर अच्छा लगा ...
अधिकतर खबरे उनके हितों के फेवर में रहती हैं ....और आम जनता में जनहित की चेतना को कुंद करने के सभी प्रयास किये जाते हैं बजाय जागरूक बनाने के ...बधाई भाई यह पढवाने के लिए
आप मीडिया पर चर्चा कर रहे थे या फिर समाज पर या वर्तमान समस्या पर या फिर आम लोगों की समझ पर या फिर अपने दिमाग की सफाई कर रहे थे..माफ करना कई हमत्वपूर्ण बाते सामने आने के बाद भी यह दिशाहीन लगी...एक साक्षात्कार मेें सभी पहलूओं पर चर्चा नहीं कर सकते है..यह मूल धारा की मीडिया का सक्षात्कार नहीं था..कुछ स्पष्ट नहीं हुआ भाई.
जवाब देंहटाएंदीपक शरण वर्मा,