रविवार, 2 दिसंबर 2012

आज़ादी का अर्थ

इतने मदारी, इतने बंदर!
मस्त से बैठे कैम्प के अंदर
ठहाके लगाते, खैनी फांकते
अपनी-अपनी कमाई का हिसाब लगाते
अपने-अपने मजमे की भीड़ के बारे में
बातें करते...
मदोन्मत्त से इतराते-छितराते
भविष्य यानी कल की योजना बनाते
इलाकों का चयन, समय का चयन
ज़रूरी है, भीड़ इकट्ठी करने के लिए
तभी तो एक-दूसरे को बतलाते-समझाते
अपनी विद्वता-अनुभव का रोब जमाते
नवसिखुओं को नया गुर बतलाते
सोचते हैं कि अनुभव भी बड़ी चीज़ है!!

बड़े-बड़े कटोरे में
घाघरा-चोली पहने
भात परसती बहुरिया
मोटी-मोटी कलाइयों में
बड़ी-बड़ी ढेर सारी
चूड़ियों को बजाती
तंबू के अंदर-बाहर आती-जाती
बंदर को एक नज़र देख
कुछ टुकड़े
रोटी के छोड़ जाती

उपेक्षा से आहत बंदर
रोटी को देखता सोचता
रोटी को हाथ में ले कर
तोड़ता, फेंकता या खाता
भाग्य को कोसता
ख़ुद से रूठा अनमना सा

तंबू के भीतर से उठते ठहाकों में
अपनी ज़िन्दगी का सार ढूंढता
जीवन की स्वतंत्रता का मर्म
समझने का प्रयास करता...
मन को तैयार करता रहता
कल फिर भीड़ के बीच
मदारी के इशारे पर नाचना है
बहू रूठे है कैसे?
और सास चले है कैसे?

उसने मदारी के सारे इशारे-आशय
अपने दिमाग में बिठा लिए हैं
क्योंकि उसे मालूम है
वह जानता है-
एक छोटी सी भूल
मदारी की हाथ में भिंची छड़ी को...
पूरी छूट देती है कि वह-
उसकी पीठ पर यथार्थ का कटु इतिहास
उकेर दे...
सच कहूँ तो उसके अंदर का सच
जो ठुमके की आड़ में किसी तरह
छुपा बैठा है...
बहुत भयभीत है
वह डरता है भीड़ के सामने आने से
वह स्वतंत्रता का मतलब
ख़ूब अच्छी तरह समझता है

3 टिप्‍पणियां:

Featured Post

'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.      साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...