वह अंधेरे में बैठा
देखता रहा दीपक टिमटिमाता
छप्पर पर उल्लू बैठा रहा
खरों को उखाड़-उखाड़ ढूँढता रहा कीड़ा
देखता रहा दीपक टिमटिमाता
छप्पर पर उल्लू बैठा रहा
खरों को उखाड़-उखाड़ ढूँढता रहा कीड़ा
देर तक सीली ज़मीन पर हाथ टिका कर
बैठने से उभरे चकत्ते में कुनमुनाती पीड़ा
बेख़बर ठण्ड से ठिठुरा गठरी बना
एकटक देखता रहा दीपक टिमटिमाता
बैठने से उभरे चकत्ते में कुनमुनाती पीड़ा
बेख़बर ठण्ड से ठिठुरा गठरी बना
एकटक देखता रहा दीपक टिमटिमाता
आशा की लौ कभी धीमी - कभी तेज़ होती रही
और वह वर्तमान को भूल
भविष्य में जाने की बजाए भूतगामी हो गया
माज़ी की अंधेरी कोठरी में कुछ ढूँढता रहा
चाहता तो था कि वह भी कुछ बने, कुछ करे
जीवन की सुविधायें जुटाए
अक्सर कोशिशें भी करता था
पर समय बहुत बेमुरव्वत
कभी साथ ही नहीं दिया
और वह वर्तमान को भूल
भविष्य में जाने की बजाए भूतगामी हो गया
माज़ी की अंधेरी कोठरी में कुछ ढूँढता रहा
चाहता तो था कि वह भी कुछ बने, कुछ करे
जीवन की सुविधायें जुटाए
अक्सर कोशिशें भी करता था
पर समय बहुत बेमुरव्वत
कभी साथ ही नहीं दिया
समय...
पत्नी के रूठ कर मायके चले जाने पर
मनाते वक़्त वह हमेशा कहता
समय सदा एक सा नहीं रहता
कि वह बदलता है- बदलता रहता है
कि हमारा भी समय बदलेगा
और तुम्हारी सारी इच्छाएँ पूरी करूँगा
कि इसमें मुझे तुम्हारे सहयोग की ज़रूरत है
कि तुम मेरे साथ रहो, सहयोग करो
वह बहुत अच्छी है, मान जाया करती है
साथ लौट आती है अपने घर
लेकिन समय है कि बदलता ही नहीं
अड़ियल टट्टू की तरह अटका पड़ा है
और वह कुछ बदलता न देख
फिर-फिर चली जाती है...
मनाते वक़्त वह हमेशा कहता
समय सदा एक सा नहीं रहता
कि वह बदलता है- बदलता रहता है
कि हमारा भी समय बदलेगा
और तुम्हारी सारी इच्छाएँ पूरी करूँगा
कि इसमें मुझे तुम्हारे सहयोग की ज़रूरत है
कि तुम मेरे साथ रहो, सहयोग करो
वह बहुत अच्छी है, मान जाया करती है
साथ लौट आती है अपने घर
लेकिन समय है कि बदलता ही नहीं
अड़ियल टट्टू की तरह अटका पड़ा है
और वह कुछ बदलता न देख
फिर-फिर चली जाती है...
थक गया है
अब वह आश्वासन नहीं दे सकता
कि उसकी आशावादिता चूक गई है
रोटी, कपड़ा और मकान
ये तीन शब्द...
हाँ, शब्द ही तो हैं
लेकिन हथौड़े की तरह
बार-बार दिमाग पर वार
अब वह आश्वासन नहीं दे सकता
कि उसकी आशावादिता चूक गई है
रोटी, कपड़ा और मकान
ये तीन शब्द...
हाँ, शब्द ही तो हैं
लेकिन हथौड़े की तरह
बार-बार दिमाग पर वार
इन शब्दों के अर्थ तो वह भी जानता है
पर निदान...
पर निदान...
दीपक की टिमटिमाती लौ बुझ गई है
छप्पर पर उल्लू बोल रहा है
अंधेरे में आँखें फाड़ने के बावजूद
भविष्य की धुँधली परछाईं भी नज़र नहीं आती
वह घबरा कर आँखें मूँद लेता है
सिर को घुटनों के बीच फँसाकर
घुटनों को हाथों से जकड़ने के बाद
ख़ुद को सुरक्षित महसूस करता है
बिल्कुल कछुए की तरह...
छप्पर पर उल्लू बोल रहा है
अंधेरे में आँखें फाड़ने के बावजूद
भविष्य की धुँधली परछाईं भी नज़र नहीं आती
वह घबरा कर आँखें मूँद लेता है
सिर को घुटनों के बीच फँसाकर
घुटनों को हाथों से जकड़ने के बाद
ख़ुद को सुरक्षित महसूस करता है
बिल्कुल कछुए की तरह...
क्या गजब का लेखन किया है !
जवाब देंहटाएंलाजवाब रचना !
वाकई लाजवाब है ..मन खोद-कुरेद कर रख दिया
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