प्रेम-1
आता है तो आ ही जाता है
दिल एक नादान परिंदा है
उम्र का पाबंद कहां
जग की रीतों को क्या जाने
मतवाला भौंरा है यह तो
सपनों की अपनी दुनिया का
थाम ले मन की डोर अगर तो
थाम ले मन की डोर अगर तो
छोर थाम बस उड़ता जाता
सबकुछ सहता, हंसता रहता
जगत्-बुद्धि जो होती इनमें
प्यार के पचड़े में क्यों पड़ते?
मुँह पर स्याही पोत जगत सा
क्यों न छुप-छुप रतिरत् रहते!
उसके लिए नहीं, जो प्रेम करता है
भावना के भव-सागर में डूबता-उतरता
लहरों को उठता-गिरता देख
बालक सा किलक उछलता है
सम्मोहित सा आँखें खोले
अंधों सा ठोकर खाता
गिरता और संभलता है
भरी दोपहरी जेठ की, फिर भी
छत पर नंगे पैर टहलता है
अंदर-अंदर घुलता-गलता
जलता छल-प्रपंच में फिर भी
यिशु के अंतिम शब्दों को
हंसता-जपता, जपता और हंसता है
प्रेम-3
प्रेम पाप है...!
उसके लिए जो प्रेम नहीं करता
मानव तन में कांच का मन ले
महज प्रेम का प्रपंच रचता है
बैठ, बदन पर खूब रगड़ता
तेल-फुलेल किसिम-किसिम के
फिर राम नाम का जाप लगाता
सदाचार के पाठ पढ़ाता
तेल-फुलेल किसिम-किसिम के
फिर राम नाम का जाप लगाता
सदाचार के पाठ पढ़ाता
वही मौका पा कर अंधियारे में
व्यभिचार भी करता है
ऐसे कामी का-पुरुष को तब
पोंगे समाज की पंडिताई
साधु का दर्जा देती है
प्रेम-4
पागल न इतना जानता है
इस कुरूप काईं समाज में
जो सिर्फ बगुला भगत को
पूजता और पहचानता है
प्रेम-चेतना फैलाने की
व्यर्थ ही कोशिश करता है
ऐसे में यह रोज़ कहीं पर
रंगे सियारों के जमघट में फंस
कीचड़, कालिख, पत्थर, अपशब्द...
प्रताड़ित ही होता रहता है
फिर भी हंसता-मुस्काता
हाथ जोड़ बड़ी मृदुता से
सबको क्षमा बांटता जाता
अपनी धुन में मस्त बावरा
पत्थर पर लिखता ही रहता
नाखूनों से, जीवन के संदेश
पत्थर पर लिखता ही रहता
नाखूनों से, जीवन के संदेश
लेकिन आदम-हौव्वा के वंशज
कैसे भला इसको समझेंगे
यह संतति तो पनपी ही है
शैतानों के बहकावे से...




bahut sundar.
जवाब देंहटाएंjis vyakti par kavita aadharit hai, uski aatma me pravesh to ho gaya hai, lekin lay aur tuk ko achchhi tarah sambhalne ki jarurat hai.
जवाब देंहटाएंwah..kai aayam..
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