फिल्मों के बारे में अक्सर कहा जाता है कि होती तो
दो-ढाई घंटों की हैं, मगर कई फिल्मों का असर सदियों तक बना रहता है। अभी तो उम्र
के चौथे दशक की सीमा में प्रवेश मिला है। सदियाँ देखी नहीं है। लेकिन हां, बात
बेमानी नहीं। आज़ादी के बाद भारतीय सिनेमा ने कई रंग देखे। फिल्मों के कई दौर
आए-गए, नायक-महानायक हुए। फिल्म निर्माण इंडस्ट्री स्टैबलिश हुई और अब तो हालत ये
है कि सालाना सैंकड़ों की तादाद में फिल्में बनती हैं, रिलीज होती हैं। लोग
देखते-सराहते भी हैं। हमें लगता है कि साहित्य में जितनी धाराएं और आंदोलन हुए
हैं। फिल्मों में भी ऐसे ही वर्गीकरण हैं।
एक दौर अर्थपूर्ण फिल्मों का भी आया था। फिर कौव्वा भी
आया, बंदर भी आया। मार्केट की मार और आधुनिक परिवेश में लोगों के स्वाद एवं सोच
में आए बदलाव ने फिल्मों की मुख्य धारा से निम्न वर्गीय समाज को एक तरह से बेदखल
ही कर दिया था। नायक अमीर ही होगा। पृष्ठभूमि चाहे जैसी भी हो, नायिका के मेकअप और
पहनावे में राजसी ठाट-बाट ज़रूरी हो गया था। हालात ऐसे हो चले थे कि नौकरानी भी
नायिका की सहेली या बहन जैसी और कभी-कभी तो नायिका के समकक्ष खड़ी नज़र आती थी। वो
तो शुक्र मनाइए कि घर-घर पहुंची टीवी ने लोगों का जेनरल नॉलेज इतना मज़बूत कर दिया
है कि फिल्म की हिरोइनों को देखते ही पहचान लेते हैं।
बिना किसी कहानी के भी फिल्में बनने और हिट होने लगीं।
अच्छी स्क्रिप्ट होने के बाद भी फिल्में फ्लॉप होने लगीं। आलोचकों ने जब
निर्माता-निर्देशकों को घेरने की कोशिश की तो यहां भी बाज़ार की आड़ में सबकुछ
जायज़ ठहराने का चलन बढ़ा। फिर अचानक से फिल्मों का नया वर्गीकरण हो गया। हम आर्ट
फिल्में नहीं, कॉमर्शियल फिल्में बनाते हैं। हम दर्शकों का मनोरंजन और इस माध्यम
से आमदनी चाहते हैं। हमारा काम समाज सेवा या संदेश देना नहीं है। ऐसी ही अन्य अनेक
ऊल-जुलूल बातें और तर्कों ने माहौल ठंडा कर दिया। लोग फिल्में नहीं, ऋषि कपूर,
जितेन्द्र, धर्मेन्द्र, अमिताभ, शाहरुख़, सलमान और आमिर ख़ान को देखने जाने लगे।
लेकिन पता नहीं क्यों अचानक हवा का रुख़ बदला-बदला नज़र आने लगा है। ऐसी-ऐसी
फिल्में बनने और हिट होने लगी हैं कि कभी-कभी दांतों तले उंगली दबाने को जी चाहता
है।
गुरुकांत देसाई आपको याद ही होंगे। मणिरत्नम ने अपनी छवि
के विपरीत गुरू जैसी फिल्म बनाई। मल्लिका नाची ज़रूर थी। लोगों ने आनंदित भी महसूस
किया था लेकिन फिल्म के हिट होने की वजह ये नहीं थी। गुरू की स्क्रिप्ट बेहद
मज़बूत थी। हां, ये अलग बात है कि इस फ़िल्म से जो मैसेज दिया गया, वह बेहद
ख़तरनाक था। महात्मा गांधी इस फिल्म में बिसूरते से नज़र आए, क्योंकि अपनी
चालाकियों के कारण खाकपति से अरबपति बना झूठ और फ़रेब का गुरू, बड़ी बेशर्मी से
साधन की शुद्धता (जो कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ सबसे सशक्त हथियार साबित हो सकता
था) का मज़ाक उड़ाता है और कठ-दलीली की हद यह कि मैंने चोरी, झूठ और दग़ाबाज़ी के
सहारे जो कुछ भी हासिल किया, उसमें अपने शेयरधारकों को भी पूरा हिस्सा दिया। यानी
चोरी का सामूहिक उत्तरदायित्व और इसमें भी ईमानदारी(!)। बताने की
ज़रूरत नहीं कि फ़िल्म एक ऐसे विध्वंसक आइडिया पर आधारित थी, जहां सिस्टम तोड़ने
वाला अपराधी, फ़रेबों में माहिर शख्स, बड़ी शान से कहता है कि बनिया हूँ, बात भी
सोच-समझ कर ही ख़र्च करता हूँ (सिर्फ नियमों को तोड़ने, प्रतिपक्षी को कमज़ोर करने
और देशहित को ठेंगा दिखाने से गुरेज नहीं करता)।
फिल्म लोगों को बेहद पसंद आई। समीक्षकों और कला-मर्मज्ञों
की तरफ से ख़ूब वाह-वाही भी मिली। फ़िल्म ने नया इतिहास रचा। सही मायने में ये उत्तर-आधुनिक,
बाज़ार केन्द्रित और उपभोक्तावादी संस्कृति को परिभाषित करने वाली फिल्म थी।
नैतिकता-अनैतिकता के मकड़जाल से परे, ‘जियो जी भर के’
टाईप की लाईफ स्टाईल वाली फिल्म। जहां साधन नहीं, साध्य महत्वपूर्ण है। जहां बस
किसी भी तरह हासिल कर लेने को ही जीत समझा जाता है। क़ायदे से कहें तो निरे
स्वार्थ को जनहित का सर्वस्वीकृत मुहावरा घोषित करने का बलात् प्रयास था- गुरू। आज
हमारे देश में जो कुछ भी ग़लत हो रहा है और उसे जिस ढंग और जिन तर्कों के सहारे
जायज़ ठहराने की कोशिश की जा रही है। गुरु भाई की ही शैली और अंदाज़ हैं।
मणिरत्नम की ही एक और फिल्म है- रावण। फ़िल्म रिलीज़ से
पहले ही समीक्षकों की नाक सिकुड़ गई थी, भौंहें अजीब सी मुद्रा अख्तियार कर चुकी
थीं। भाव था- हुंह.., इसी को फिल्म कहते हैं। उबाऊ, थकाऊ, पकाऊ... और न जाने
क्या-क्या। जबकि फिल्म को गंभीरता से देखने वाला व्यक्ति, कथित समीक्षकों की बात
से कतई इत्तेफाक नहीं रखता। गंभीर दर्शकों के लिए अगर यह सेल्यूलाइड पर पहला दलित
डिस्कोर्स था तो मनोरंजन और हास्य प्रेमियों के लिए भी मसाले की कमी नहीं थी।
पटकथा में कहीं ठहराव नहीं, रवानी ऐसी कि नज़र पर्दे से हटने को तैयार नहीं। फिर
भी फ़िल्म पिट गई। कारण जानने के लिए बाज़ार की बिकाऊ संस्कृति और उत्तर आधुनिक ‘गुड
लुकिंग सेंस’ वाला मनोविज्ञान समझना होगा।
आज का दर्शक और बाज़ार (दोनों) ‘मदर इंडिया’ के
दौर से काफी आगे निकल चुका है। अब फिल्मों में सबकुछ सुंदर और सुडौल दिखाने का ही
रिवाज़ है। हालांकि पिपली लाईव, धोबीघाट जैसी फिल्में भी बनी हैं और लोगों ने
सराहा भी है।(लेकिन फिलहाल हम नायक और मिथ की बात कर रहे हैं और वह भी गुरू और
रावण के संदर्भ में तो इस मुद्दे पर फिर कभी।)
सवाल वाजिब है कि क्या फिल्मों का भी कोई ‘क्लास’ होता है? दर्शकों का भी कोई वर्ग विशेष होता
है क्या?
क्या बाज़ार की पसंद और व्यक्ति की पसंद में कोई फर्क नहीं रहा?
रावण के फ्लॉप होने में न तो फिल्मांकन का दोष था, न
निर्देशक ही नौसिखुआ था और न ही नायक-नायिका के अभिनय में ही कोई कमी थी। बल्कि
फिल्म की कमी थी- राम के मिथ को दलित डिस्कोर्स में तब्दील करना। ग़रीब और दलित की
विश्वसनीयता हमेशा से संदिग्ध रही है। ये प्रभु वर्ग द्वारा प्रचारित-प्रसारित
समाज सम्मत धारणा है। दोषी राम नहीं, रावण ही होगा। यह आज की बात नहीं है।
ऋग्वैदिक काल से ही आर्यों और देवों के कुकृत्य भी सुकृत्य स्वीकार किए जाते रहे
हैं। ऋषि अगस्त्य (ऋग्वेद की कई ऋचाओं की रचना इन्होंने की थी) से तो हम सभी
परिचित हैं। सुर-असुर, सवर्ण-दलित, देव-राक्षस के अंतर्संबंधों को समझने के लिए ऋषि
अगस्त के सुकृत्यों से उत्तम उदाहरण मेरी दृष्टि में दूसरा नहीं हो सकता। उनकी
तेजस्विता और अलौकिक व्यक्तित्व से स्वयं भगवान राम तक प्रभावित थे। तभी तो वनवास
के दौरान वे स्वयं ऋषि अगस्त्य से मिलने, उनकी कुटिया(आश्रम) में गए थे, जो विंध्य
के दक्षिण के सबसे रमणीय प्रदेश में अवस्थित थी।
अब विडंबना देखिए कि जिन राक्षसों से ऋषिगण और
साधु-सन्यासी त्रस्त और भयभीत रहा करते थे, वही राक्षस ऋषि अगस्त के सामने थर-थर
कांपा करते थे। उनका भय राक्षसों पर इतना हावी था कि वे कभी उनकी तरफ आँख उठाकर
देखने तक की हिम्मत नहीं करते थे। यही राक्षस जब कथित देवासुर संग्राम के बाद ऋषि
अगस्त और देवों से अपनी प्राण रक्षा के लिए समुद्र में जा छुपे तो क्रोधित अगस्त
ने समुद्र को भी दंडित किया और उसका सारा जल पी गए। (उन्हें इस सुकृत्य के लिए
समुद्र चुलुक्य की उपाधि मिली।) अब ज़रा कंट्रास्ट देखिए कि जब देवों ने सृष्टि की
रक्षा के लिए विनती की तो अगस्त ने मूत्र-विसर्जन द्वारा समुद्र-जल को पुनः मुक्त
किया। इसी कारण समुद्र का जल खारा है।
ऋषि अगस्त की वजह से ही समुद्र का जल खारा हुआ या कि
समुद्र का जल ऋषि अगस्त का मूत्र है। इसमें हमारी दिलचस्पी नहीं है। दिलचस्प बात
यह कि ऋषि पुलस्त्य के पुत्र होने और ब्रह्म पुराण के कथावाचकों में शुमार, वैदिक
ऋचाओं के रचयिता अगस्त के पास आख़िर वह कौन सी शक्ति थी कि मार-काट और भयादोहन के
लिए कुख्यात राक्षस भी उनके भय से थर-थर कांपने को मजबूर थे। ज्ञान और धर्म के
उद्गाता अगस्त को पराजित राक्षसों पर दया क्यों नहीं आई? जब राक्षस युद्ध-भूमि से भाग खड़े हुए तो उन्हें जीवन-दान
क्यों नहीं दिया? हमने तो सुना है कि “संतन को कहां सीकरी सो काम?”
लेकिन ऋषि अगस्त का व्यक्तित्व और कृतित्व उनके नाम से जुड़े शब्द ‘ऋषि’ से बिल्कुल भी मेल नहीं
खाता।
बात
फिर वहीं आकर ठहरती है कि इतिहास विजेताओं का होता है। पराजित जातियाँ हमेशा दुष्ट
ही होती हैं। दस्यु ही होती हैं। उनका दलन और शोषण, धर्म-सम्मत होता है। तब
नीति-अनीति का मानदंड भी विजेता ही तय करते हैं और पराजित जातियों का चरित्रांकन
भी उसी के अनुरूप किया जाता है। बाद में यह मिथ का रूप ले लेता है और रूढ़ हो जाता
है। विजेता कभी दोषी नहीं होते। पराजित कभी साधु नहीं हो सकता। स्थूल अर्थों में
कहें तो विश्व का सबसे बड़ा ‘आर्म्स सप्लायर’, ‘आर्थिक विस्तारवाद’ का प्रणेता, दो-दो विश्व-युद्धों
का निर्णायक और समय-समय पर अपने व्यापारिक हितों के लिए छोटे और कमज़ोर देशो की क़ुर्बानियाँ
लेने वाला अमेरिका, आधुनिक विश्व का एकमात्र शांतिदूत है।
वीरा का दुर्भाग्य भी यही है। वह अनैतिक समाज-व्यवस्था
में नैतिकता का दंड भोग रहा है। यहां लक्ष्मण द्वारा शूपनखा की नाक का काटा जाना
न्यायोचित है। राम
द्वारा छल से बलि की हत्या न्याय-संगत है। लेकिन रावण द्वारा सीता का हरण महापाप।
वीरा भी उसी प्रभुवर्ग द्वारा संचालित समाज का अंग है। लिहाजा नीति, नैतिकता एवं
न्याय के लिए संघर्ष और मानवीय गुणों से भरपूर होने का दंड तो उसे भोगना ही
पड़ेगा। वीरा चूँकि दलित है, इसलिए उदार तो कदापि नहीं हो सकता! नीच-कुल का व्यक्ति न्याय-अन्याय और नैतिक-अनैतिक का मानदंड
तय कैसे कर सकता है? यह काम तो ऋषि अगस्त जैसे प्रभुओं
का काम है।
गुरू का नायक चोरी करता है, झूठ बोलता
है, लेकिन
प्रशंसनीय बना रहता है। लोगों की ज़ुबान पर उसके डायलॉग चढ़ जाते हैं। वह रोल मॉडल
की सी हैसियत लेकर हमारे दिल-दिमाग में जज़्ब हो जाता है। वीरा ईमानदार है, छल
नहीं कर सकता। पराई स्त्री के साथ दुर्व्यवहार नहीं कर सकता। शोषण के ख़िलाफ़ है।
व्यवस्था की दमनकारी नीतियों के खिलाफ संघर्ष कर रहा है। पुलिसकर्मी उसकी बहन को
शादी के मंडप से उठा ले जाते हैं और थाने में पूरी रात उसके साथ बलात्कार करते हैं, लेकिन
वह ख़ुद पुलिसवाले की पत्नी को पूरे सम्मान के साथ मुक्त करता है। फिर भी असभ्य
है। जबकि रागिनी का पति यानी एसपी, अपने देव नाम के विपरीत दस्यु वाली हरकतें करता
है। यहाँ तक कि वीरा की हत्या के लिए अपनी पत्नी का इस्तेमाल ‘चारे’ के रूप में
करता है। छल से निहत्थे वीरा की हत्या करता है।
गुरू का कृत्य आधुनिक समाज के लिए विकास का नया ‘आइडिया’ देता है। यह
आधुनिक पूंजी-केन्द्रित नगरीय समाज को पाप-बोध से मुक्ति देता है। उचित-अनुचित के
द्वंद्व से उन्हें मुक्त करता है। मध्यवर्ग खुद को फिल्म देखने के बाद हल्का महसूस
करता है और मुस्कराते हुए, संवादों की जुगाली करते हुए, हॉल से बाहर निकलता है।
जबकि ‘रावण’ प्रभु-वर्ग के चरित्र को नग्न करता है। ‘वीरा’ वह दर्पण है, जिसमें इन्हें
अपने तमाम धत्कर्म और पाप मुँह चिढ़ाते नज़र आते हैं। लिहाजा इस फिल्म को देखने के
बाद वर्ग-विशेष के दर्शक का वैचारिक स्वाद कसैला हो उठता है- ‘हुंह, यह भी कोई फ़िल्म है महाराज!’ यही आधुनिक विश्व की ट्रेजडी है। सत्ता और
सामाज-व्यवस्था का यही सनातन चरित्र है।
निष्पक्ष दृष्टि से अगर रावण की कथा का विश्लेषण करें तो
स्पष्ट हो जाएगा कि पूरी फिल्म सुर-असुर, सत्य-असत्य और सुसाधन-कुसाधन के मसले पर
डिस्कोर्स करती है। मणिरत्नम ने जो भूल-ग़लती गुरू में की थी। रावण में उसका सुधार
था। यहां नायक को छल बल से परहेज है, जो उसकी मौत का कारण भी बनता है। यहां प्रेम
निस्वार्थ था। नायक ने पूंजी जुटाने के लिए विवाह नहीं किया था। लेकिन अचरज की
बात, दर्शकों ने वीरा को नायक स्वीकार नहीं किया। फिल्म पिट गई।
अचरज की बात है कि ‘गुरूकांत’ भी
अभिषेक थे और ‘वीरा’ भी वही बने थे। दोनों ही फ़िल्मों
में नायिका के पद पर विश्व सुंदरी ऐश्वर्या राय ही थीं। दोनों फिल्मों के निर्देशक
भी बॉलीवुड के जाने-माने हस्ताक्षर मणिरत्नम ही थे। फिर भी एक सुपर-हिट हुई और
दूसरी को सुपर-फ्लॉप का तमगा मिला। पाठकों को ‘पेज़-थ्री’ फिल्म की याद ज़रूर होगी। फिल्म को रिलीज़ से पहले ही ‘सी-ग्रेड की मूवी’ बताया गया था। मधुर भंडारकर
की बखिया उधेड़ने में आलोचकों ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। फिल्म आधुनिक
मध्यवर्गीय जीवन की सच्चाइयों पर आधारित थी। इसलिए सफ़ेदपोश ख़ुद को बेपर्दा महसूस
कर रहे थे। लिहाजा कड़ा विरोध स्वभाविक था। लेकिन फिर भी ‘पेज-थ्री’ हिट रही। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि
शोषक और शोषित दोनों का जातीय समाज एक-ही था। जबकि ‘रावण’ में प्रभु और दलित वर्ग के बीच के सदियों से जारी संघर्ष को
मिथ के माध्यम से प्रस्तुत किया गया था। यह फिल्म न तो सुविधाभोगी मध्य-वर्ग और न
ही प्रभु-वर्ग का हित-पोषण करती थी। बल्कि यह तो सदियों से प्रचलित उनकी श्रेष्ठता
के सिद्धांत पर ही प्रश्न-चिन्ह लगाने वाली फिल्म थी, लिहाजा यह नकार दी गई।
बताने की ज़रूरत नहीं कि हमारा समाज अभी भी सामंती ढांचे
में ही रचा-बसा है। कपड़े बदल जाने से, रहन-सहन और लाईफ स्टाईल बदल जाने से,
अंग्रेज़ी सीख लेने से और संसाधन जुटा लेने से, समाज नहीं बदल जाता। समाज सोच से
बदलता है। दुर्भाग्य से इस मामले में भारतीय समाज की स्थिति बहुत बेहतर नहीं कही
जा सकती। आज भी व्यक्ति और व्यक्तित्व से ज्यादा, जाति की अहमियत है। गुरू इसलिए
हिट हुई क्योंकि वह भारत के आधुनिक प्रभुवर्ग का प्रतिनिधित्व करती थी। (साधन की
शुद्धता जाए भाड़ में, जितना जमा कर सकते हो करो, जैसे जमा कर सकते हो करो।) रावण
इसलिए फ्लॉप हो गई क्योंकि वो इसी प्रभु वर्ग के ख़िलाफ़ बनी थी। मिथ को चुना गया,
या राम-रावण के समांतर फिल्म बनी, इसलिए फ्लॉप हो गई, ये बात सही नहीं है। बल्कि
फिल्म के फ्लॉप या अस्वीकार की असली वजह है कि साधन सम्पन्न का यशोगान ही संभव है,
आलोचना नहीं। गुरूकांत देसाई के सामने वीरा की औक़ात ही क्या है! दलित और
संसाधन-विहीन वीरा, सत्ता प्रतिष्ठान के स्वामी देव को नैतिकता का पाठ भला कैसे
पढ़ा सकता है? वीरा का हृदय कैसे विशाल हो सकता है? बस
यही वह कील है!
*नया पथ(जनवरी-जून 2013) के सिनेमा विशेषांक(संयुक्तांक) में प्रकाशित

जबरदस्त विशलेषण भाई.....
जवाब देंहटाएंदोनों फिल्मों का.. मैं इस एंगल से इस फिल्म को देखने में असफल रहा था... मुझे लगता है आपका एंगल बिल्कुल सही लगता.. हिट और फिट के पार्मूले के विपरित
प्रिय अकबर ... तु्म्हारी शैली लाजवाब है ....... ऐसा प्रतित होता है कि इस कम उम्र में ही तुमने काफी कुछ पढ़ लिया है और शायद बहुत कुछ अनुभव भी किया है ..... तुमने इस लेख के जरिए लेख के पाठकों को झकझोरने का प्रयास किया है कि समाज में कितना विरोधाभास है ......... मतलब की और फिर बेमतलब की .....या फिर कहूं समाज को मेसेज देनेवाली फिल्में और ऐसी फिल्में जो बिना सिर-पैर की और अर्थविहीन फिल्में ...... या कहूं यथार्थ को जीती फिल्में और य़थार्थ से परे की फिल्में..... फिल्में तुमने इतनी बारीकी से देखी काबिले तारीफ है ..... लेकिन फिल्में बनानेवालों के पास अपना तर्क है .... लेटेस्ट फिल्म का ही जिक्र करता हूं चेन्नई एक्स्प्रेस ... यह बस टाईम पास है ...... थकाऊ दिन बीताने के बाद इसे देखो यह तुम्हें रिलैक्स्ड मोड में ला देगा ..... मद्रास कॉफी .... देखो ...... यह तुम्हारे जेहन में राजीव गांधी की याद ताजा कर देगा ...शायद तुम महसूस करोगे कि उनकी हत्या ने देश की प्रगति पर विराम लगा दिया .......... सत्याग्रह ... देखो ....... सामाजिक और असामाजिक तत्त्वों को एक साथ पर्दे पर देखोगे ... सच्ची घटनाओं पर आधारित यह फिल्म भ्रष्टाचार और अन्याय के प्रति सभी को जगाने का एक प्रयास है ..... यानी एक जगह डायरेक्टर ने आपको एन्टरटेने किया है, दूसरी जगह आपके समक्ष अतीत को बखूबी रखा है और तीसरी जगह वर्तमान में समाज कैसा है उससे आपको परिचित कराया है ...... हर मूड की फिल्में बनीं हैं और बन रही हैं ......... आप किस मूड में हैं यही सबसे ज्यादा मायने रखता है .........
जवाब देंहटाएं