हम जिस
युग में जी रहे हैं, वह अत्याधुनिक सूचना-तकनीकों से लैस है। चिट्ठी-पत्री,
लिफाफा-पोस्टकार्ड का ज़माना काफी पीछे छूट गया है। सार्वजनिक टेलीफोन-बूथों की
परंपरा भी दम तोड़ने की कगार पर आ पहुँची है। अब गाँवों के लोग भी मोबाइल फोन से
ही संवाद-सम्प्रेषण को तरजीह देने लगे हैं। सूचना और मनोरंजन का एकमात्र सहारा
दूरदर्शन और उसके लोकप्रिय प्रोग्राम ‘संध्या समाचार’
और ‘चित्रहार’ की जवानी को ढले भी अरसा बीत गया।
गाँवों में अब अधिकांश घरों की छत पर डीटीएच की छतरी आकाश को मुँह चिढ़ाती है। बिजली
की समस्या है, लेकिन कोई बात नहीं। सम्पन्न घरों के पिछवाड़े में जेनसेट पड़ा है।
जिन घरों और घरानों के प्रति लक्ष्मी अभी अधिक उदार नहीं हो सकी हैं, वैसे घरों
में इनवर्टर, बैट्रा और चार्जिंग उपकरणों ने इस कमी को पूरा कर दिया है। शहरों में
तो फिर भी एफएम ने रेडियो की लाज बचा रखी है, लेकिन गाँवों के लोगों ने इसका
फिलहाल बायकॉट कर रखा है। केवल दूरदर्शन और डीडी न्यूज़ देखने की बाध्यता ख़त्म हो
चुकी है और लोग आराम से मन-मुताबिक ढाई-तीन सौ चैनलों के जंगल में भटकते रहते हैं।
कहने की ज़रूरत नहीं कि उदारीकरण की सहेली सूचना-क्रांति ने हमारी परंपरागत
जीवन-संस्कृति को बदल दिया है और बदलाव की प्रक्रिया अभी जारी है। गाँव के वैसे
युवा जो बमुश्किल दस्तख़त करने की दक्षता रखते हैं, उनके पास भी मोबाइल है। मोबाइल
में इंटरनेट है और फेसबुक है।
वे भले ही किसी मंझे हुए विद्वान अथवा बुद्धिजीवी की
तरह तमाम राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय मुद्दों पर स्टेटस नहीं डालते हों। लेकिन आपकी
पोस्ट पर ‘लाईक’ या टूटी-फूटी हिन्दी में ‘कमेंट’
ज़रूर चस्पाँ करते हैं। आशय सिर्फ़ इतना है कि चौपाल और चाय की दुकान पर होने वाली
बैठकी और उस बैठकी में ख़र्च होने वाले वक़्त का अतिक्रमण सूचना-क्रांति ने कर
लिया है और अब ‘सोशल स्फीयर’ न सिर्फ परंपरागत ‘ठीये’
से स्थानांतरित हुई है, बल्कि उसका विस्तार भी हुआ है। जब ‘सोशल
स्फीयर’ का ज़िक्र आ ही गया है तो हम इस पर विस्तृत चर्चा से मुँह
नहीं चुराएँगे। वैसे भी अधुनातन लोकतांत्रिक गणराज्य में ‘सोशल
स्फीयर’ की महत्ता और उपयोगिता से किसको इनकार होगा!
लेकिन उससे पहले थोड़ा ‘फ्लैश बैक’ में चला जाए और परंपरागत
सूचना तकनीकों को ‘री-कॉल’ किया जाए। ऐसा करना ज़रूरी तो
नहीं, लेकिन हमें यक़ीन है कि इससे ‘सोशल स्फीयर’ यानी ‘सार्वजनिक
अथवा सामाजिक दायरा’ को स्थूल अर्थों में परिभाषित करने की विवशता नहीं रह
जाएगी। वैसे भी ‘न्यूज़’ का अर्थ सिर्फ नॉर्थ, इस्ट, वेस्ट
और साउथ नहीं रह गया है। अब तो हमने इसको नया अर्थ-संदर्भ दे दिया है- न्यू
इन्फॉर्मेशन। कोई भी समाचार अब ख़ालिस समाचार नहीं रह गया है। ख़बरें भी सत्य
घटनाओं पर आधारित किसी धारावाहिक जैसी हो गई हैं और नाट्य रुपांतरण भी
सौंदर्य-प्रसाधन के रूप में अपनी अनिवार्यता साबित कर चुका है। अभिव्यक्ति की
आज़ादी और राजनीतिक दलों के बीच इतिहास की प्रतिस्पर्धी खींचतान में सौ साल पुरानी
घटनाएँ और नीतियाँ भी आज की ताज़ा ख़बर बनने लगी हैं। लिहाजा परंपरागत
सूचना-तकनीकों के बारे में बात अर्थहीन या अनावश्यक नहीं लगनी चाहिए।
मानव
सभ्यता अपने ‘आखेट युग’ से ही सामूहिकता की महत्ता
को समझती आई है और तब से यह अवधारणा थोड़े-बहुत परिवर्तनों के साथ आज तक चली आती
है। सामूहिक हित को संरक्षित और सुरक्षित रखने की चाह ने ही ‘समाज’
की अवधारणा को धरातल दिया। इसी वजह से विचार-विनिमय की ज़रूरत भी महसूस
हुई होगी और फिर सम्प्रेषण के तरीक़े ढूंढे गए होंगे। कभी ढोल-नगाड़े और विशेष
सुर(सामान्यतः संगीत में जिसको पंचम सुर कहते हैं।) या फिर लुकाठी(रात में) की मदद
से संबंधित लोगों तक संदेश या सूचना पहुँचाने की कोशिश की जाती थी। लोग इकट्ठा
होते। मुद्दों अथवा समस्याओं पर विचार-विमर्श करते और फिर समाज-हित में निश्चित
निष्कर्ष पर पहुँचते। यह निष्कर्ष अथवा निर्णय संबंधित समाज पर बाध्यकारी होता था।
आप आधुनिक अर्थों में इसको जनमत कह सकते हैं। समुदाय अथवा कबीले के सरदार या
मुखिया के नेतृत्व में इस तरह का जुटान हुआ करता था, जिसे ‘पंचायत’(इसका
पंचायती राजव्यवस्था से कोई संबंध नहीं है।) कहा जाता था। इसी की चरम परिणति प्राचीन
भारत के लिच्छवी गणतंत्र और वहाँ की शासन व्यवस्था के रुप में हमारे सामने आती है।
ख़ुद महात्मा बुद्ध ने सफल गणराज्य के जो सूत्र बताए थे, वे लिच्छवी की गणतांत्रिक
व्यवस्था के आंकलन पर ही आधारित थे। उन्होंने कहा था कि गणराज्य की सफलता के लिए
ज़रूरी है कि जल्दी-जल्दी सभाएँ हों और उनमें अधिक से अधिक सदस्य शरीक हों। राज्य
के कामों को लोग सामूहिक उत्तरदायित्व के रूप में लें और मिल-जुलकर उन्हें पूरा
करें। क़ानूनों का ईमानदारी से पालन हो और ऐसे क़ानून न बनाए जाएँ, जो जन-विरोधी
हों। बुज़ुर्गों के विचारों का सम्मान किया जाए। महिलाओं के साथ बदसलूकी न हो और लोग
कर्तव्य के प्रति ईमानदार हों। आधुनिक लोकतंत्रिक ढाँचे से भी यही उम्मीद की जाती
है। महात्मा बुद्ध के दौर में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के लिए जिन आदर्शों को अहम
माना गया था, आधुनिक युग में भी वे उतने ही महत्वपूर्ण हैं। तकनीकी और सामाजिक-राजनीतिक
बदलावों के बावजूद यह परंपरा आज भी विद्यमान है। ढंग-ढब में बदलाव के बाद भी इसका
मूल अब तक अक्षुण्ण है। इस बात से इनकार नहीं कि संचार-साधनों और यातायात की
उपलब्ध सुविधाओं के आलोक में तत्कालीन समाज का दायरा सीमित था। न बड़े-बड़े मुल्क
थे और न ही आज की तरह पेचीदी शासन-व्यवस्था। लिहाजा ‘सोशल
स्फीयर’ भी विस्तृत नहीं रहा होगा। तकनीकी विकास के साथ-साथ
सार्वजनिक दायरों का विस्तार भी हुआ है। आज़ादी के संघर्ष में रेल और तार की
सुविधा का क्या योगदान रहा? आप भलिभांति जानते हैं। ‘सोशल
स्फीयर’ के प्रभाव को आधुनिक भारत में स्वतंत्रता आंदोलन और महात्मा
गाँधी के राजनीतिक-वैचारिक गतिविधियों के आईने में अधिक सहजता और आसानी से समझा जा
सकता है। यह ऐतिहासिक तथ्य है जिसकी
अभिव्यक्ति एडवर्ड एस. हर्मन ने भी की है
और यह माना है कि “लोकतांत्रिक व्यवस्था के सुचारू संचालन या लोकतंत्र के
लिए आंदोलन की सबसे बड़ी ख़ूबी ‘सोशल स्फीयर’ का
निर्माण ही रही है। अर्थात ऐसे स्पेस या प्लेटफॉर्म का निर्माण, जहाँ किसी
राजनीतिक समुदाय अथवा समूह के लिए ज़रूरी मुद्दों पर चर्चा और बहस हो सके और ऐसी सूचनाओं
को विचारार्थ रखा जा सके, जिसका सामाजिक जीवन अथवा सिविल सोसाइटी में महत्व हो और
जिसमें आम आदमी की भागीदारी और राय अहमियत रखती हो।”
सामुदायिक ज़िन्दगी में ऐसी भागीदारी, नागरिक की हैसियत से बेहद ज़रुरी है।
महात्मा गाँधी ने ग्राम-स्वराज की जो कल्पना की थी, उसके मूल में यही था। लेकिन यह
आज तक दुर्भाग्यवश स्वप्न ही बना हुआ है। जनमत कोई वायवीय अवधारणा नहीं है। बल्कि
उसका एक ठोस वैचारिक धरातल है और समाज के अंतिम व्यक्ति की राय और सहमति भी
महत्वपूर्ण कारक के रूप में सर्वथा स्वीकार्य।
आज हमारे
मुल्क में लोकतंत्र है। जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है। हमारे प्रतिनिधि
लोकसभा और विधानसभा में पहुँचते हैं। और वहाँ बैठ, देश और राज्य के लिए नीतियों का
निर्धारण करते हैं। नीतियों को अमलीजामा पहनाने के लिए कार्यपालिका है। अनीति की
रोकथाम के लिए न्यायपालिका है। सामाजिक हितों को नुकसान पहुँचाने वालों, यानी
असामाजिक तत्वों पर नकेल के लिए पुलिस-प्रशासन है। तमाम क्षेत्रीय,
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं की सूचनाएँ हम तक पहुँचाने के लिए मीडिया है।
किसी घटना अथवा मुद्दे पर विचारों की व्यक्तिक-अभिव्यक्ति के लिए सोशल साइट्स हैं।
अतः सैद्धांतिक रूप से हम यह कह सकते हैं कि हम जिस लोकतांत्रिक देश में रहते हैं,
वह सुव्यवस्थित है और सभी सत्ता प्रतिष्ठानों के दायित्व निश्चित हैं। लेकिन यह
सत्य सिर्फ हमारे ही मुल्क के लिए नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम देशों के लिए
सैद्धांतिक स्तर तक ही सीमित है। व्यवहारिक स्तर पर यह तमाम ढाँचे कुछ और ही कहानी
बयान करते हैं। व्यवसायिक दबाव समूहों, राजनीतिक स्वार्थों, धार्मिक वैमनस्य, निजी
हितों के टकराव, अंतर्राष्ट्रीय दबाव और पूँजीवाद द्वारा नियोजित कथित
प्रतिस्पर्धाएँ, जिस राष्ट्र अथवा राज्य की तस्वीर हमारे सामने पेश करती हैं, वह
लोकतांत्रिक मूल्यों और जिम्मेदारियों के बिल्कुल मुख़ालिफ़ हैं। ऐसे में
सूचना-तंत्र, संचार माध्यम या फिर सीधे-सीधे कहें तो मीडिया की निष्पक्ष भूमिका
बेहद ज़रूरी हो जाती है। जब हम कहते हैं कि किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए ‘सोशल
स्फीयर’ का अस्तित्व बेहद ज़रूरी है, तो इसका मतलब यह होता है कि
जनहित से जुड़े मुद्दों पर आम लोगों के हित और उनकी राय को अहमीयत देना ज़रूरी है।
और यही काम सोशल स्फीयर करते हैं। मुद्दा अथवा विषय विशेष के गुण-दोषों के
विवेचन-विश्लेषण से लेकर, उसमें संशोधन-समाशोधन और जनहित के महत्व को तरजीह के लिए
सत्ता प्रतिष्ठान पर दबाव तक का काम सोशल स्फीयर में ही मुमकिन है। ‘सोशल
स्फीयर’ का बड़ा हिस्सा मीडिया ही है, क्योंकि किसी भी सूचना का पहला
आगम यही है। यह अलग बात है कि मीडिया से मिलने वाली कोई ख़बर या सूचना बाद में कई
अन्य माध्यमों से आम लोगों तक पहुँचती है। मसलन आपने टीवी या अख़बार में देखा या
पढ़ा कि सरकार रीटेल में एफडीआई को मंजूरी देने का मन बना रही है। आपने अपने मित्र
को बताया। आपके मित्र ने इसे सोशल साइट पर शेयर किया या फिर किसी अन्य को बातचीत
के दौरान इसकी सूचना दी और इस तरह इस ख़बर का फैलाव होता रहा। लेकिन व्यक्ति विशेष
या कई व्यक्तियों तक मात्र सूचना-सम्प्रेषण से ही जनमत का निर्माण नहीं हो जाता।
प्लेटफॉर्म यहीं पर महत्वपूर्ण हो उठता है। समाचार चैनल या फिर अख़बारों के
संपादकीय पृष्ठ पर इस मुद्दे को लेकर विशेषज्ञों की राय और एफडीआई से होने-वाले
नफ़े-नुकसान के विवेचन-विश्लेषण के बाद आप राय बनाते हैं और फिर उसी के अनुरूप
अपनी प्रतिक्रिया देते हैं, जो फिर निश्चित माध्यम से सरकार तक पहुँचती है और उस
पर दबाव बनता है। यानी सोशल स्फीयर एक ऐसा राजनीतिक मंच है जिस पर ख़बरों, विचारों
और बहसों के ‘सोश्यल डिस्ट्रीब्यूशन’ की
जिम्मेदारी है। और बताने की ज़रूरत नहीं कि इस आधुनिक सूचना-तकनीक से लैस युग में
यह जिम्मेदारी मीडिया पर ही है। इसलिए जब हम सोशल स्फीयर की बात करते हैं तो
प्रकारांतर से मीडिया की ही बात कर रहे होते हैं।
वैश्विक
अर्थव्यवस्था और सोवियत संघ के विघटन के बाद बढ़ते अमेरिकी हस्तक्षेप और दबावों के
बीच मार्शल मैक्लूहान का यह दावा बिल्कुल सही प्रतीत होता है कि अब ‘ग्लोबल
विलेज’ का ज़माना है। सिर्फ स्थानीय स्तर पर सामुदायिक हित, राज्य
अथवा राष्ट्रहित से आगे बढ़कर वैश्विक हित की बातें होने लगी हैं। ऐसे में
सार्वजनिक दायरे की पुरानी परिभाषाएँ और सामूहिक हित की अवधारणाएँ भी बदली हैं,
बदल रही हैं। ख़ैर, जर्मन दार्शनिक जुर्गन हेबरमास के शब्दों में कहें तो “सोशल
स्फीयर हमारे सार्वजनिक जीवन का वह प्रभावी दायरा है, जो जनसाधारण से जुड़े मुद्दों
पर बिना किसी दबाव के जनमत का निर्माण करता है।” लेकिन
हेबरमास का यह दावा तथ्यात्मक स्तर पर ग़लत साबित होता है। इसके लिए हमें कहीं दूर
जाने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर दृष्टिपात ही काफी
होगा। रीटेल सेक्टर में एफडीआई की मंजूरी के लिए सरकार को न सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय
मीडिया बल्कि राष्ट्रीय मीडिया का दबाव भी झेलना पड़ा। एफडीआई के पक्ष में सोशल
स्फीयर में जो जनमत दर्शाया गया, वह न तो जनसाधारण की तरफ से था, न जनमत के अनुकूल
और न ही दबाव-रहित। यानी इस मामले में मीडिया ने सार्वजनिक उत्तरदायित्व का पालन
नहीं किया।
‘सोशल
स्फीयर’ अपने परंपरागत गुण और मूल्यों को पीछे छोड़ चुका है। जाहिर
है इसके लिए जितनी जिम्मेदार सत्ता-व्यवस्था है, उससे कहीं ज़्यादा जिम्मेदार
मीडिया है क्योंकि आधुनिक युग में सामाजिक हितों के पोषण और उसके वक़ालत की
जिम्मेदारी इसी पर है। मीडिया क्षेत्र में पूँजीपतियों के प्रवेश और उनके कब्ज़े
के बाद से यह जनहित की बजाय कॉर्पोरेट हितों के प्रति ज्यादा जिम्मेदार होती गई
है। विचारधाराओं के आधार पर होने वाली बहसों का दौर कब का ख़त्म हो चुका है और
उसकी जगह पप्पाराजी क़िस्म की पत्रकारिता और सनसनी की संस्कृति ने अपनी जड़ें जमा
ली हैं। अब चर्चा के केन्द्र में नीति नहीं, व्यक्ति होते हैं। सार्वजनिक हितों की
बजाय सियासी दलों और पूँजीपतियों के हित साधे जा रहे हैं। रिपोर्टिंग के स्तर में
ओछापन साफ नज़र आने लगा है। मीडिया ने समाजिक हितों की तिलांजलि देकर ख़ुद को
व्यापारिक संस्थान के रूप में परिवर्तित कर लिया है। तथ्यों की बजाय फ़िजूल के
तर्कों और शोशेबाज़ियों को तरजीह दी जाने लगी है। सामाजिक हितों की अनदेखी की जा
रही है। राष्ट्रहित के मुद्दे ग़ायब हो रहे हैं। आसन्न लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र
अभी से सियासी दल अपनी नीतियों को सार्वजनिक बहस के केन्द्र में लाने की बजाय
अप्रत्यक्ष रूप से स्टिंग और व्यक्तिगत आरोपों-प्रत्यारोपों से जनता का मन बहला
रहे हैं। आप कोई भी न्यूज़ चैनल देख लीजिए या किसी अख़बार का पन्ना पलट लीजिए।
वहाँ पर या तो व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोपों की भरमार होगी या फिर किसी सेलेब्रेटी
के रोमांस के किस्से होंगे। सार्वजनिक दायरे से जुड़े व्यक्ति के प्रेम-प्रसंगों
की मसालेदार रिपोर्टिंग होगी या फिर पेड स्टिंग का स्टंट होगा। राष्ट्रीय समस्याओं
से जुड़ी नीतियों और उस पर जनमत के रूझानों की झलक तक दुर्लभ होते जा रहे हैं।
सोशल स्फीयर में आई इस गिरावट के लिए कुछ विद्वान राजनीति में प्रबंधकों के बढ़ते
हस्तक्षेप को जिम्मेदार मानते हैं। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। बल्कि ग्लोबलाईजेशन
ने पूँजीवादी साँड को बेलगाम कर दिया है और अब वो सत्ता-प्रतिष्ठानों को न सिर्फ
रौंद रहा है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनिवार्य अंगों को भी छिन्न-भिन्न कर
रहा है। यह बात सिर्फ भारतीय परिप्रेक्ष्य में ही सही नहीं है, बल्कि यह महामारी
विश्व-व्यापी हो गई है। हाल ही में कथित विश्व-शक्ति अमेरिका की अर्थ-व्यवस्था को
एक दिन में सड़क पर लाकर धन-कुबेरों ने अपनी औक़ात दिखाने का प्रयास किया था।
स्थिति
त्रासद और दुखद तो है। सोशल स्फीयर में चर्चा का केन्द्रबिन्दु बदल गया है। नतीजतन
सार्वजनिक जीवन में शून्य पैदा हो गया है। जहाँ पर सार्वजनिक हित की चर्चा होनी
थी, वहाँ पर अब नितांत निजी और व्यक्तिगत बातों और अफ़ेयर्स को महत्व मिल रहा है।
कॉर्पोरेट की कठपुतली बने सियासी दलों के लिए यह बात भले ही राहत वाली हो, लेकिन
लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करने वालों और समस्याओं से जूझते मुल्क के
बाशिंदों के लिए यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। बल्कि एक सच तो यह भी है कि पहले
जिस मीडिया का इस्तेमाल सियासी दलों ने अपने हितों के लिए किया था और पूंजीपतियों
से अपनी नज़दीकियों को और प्रगाढ़ करने की ग़रज़ से मीडिया में उनके प्रवेश की
राहें आसान की थीं, वही अब उनके लिए गले की हड्डी बन गया है। मीडिया संस्थानों की
पक्षपाती रिपोर्टिंग और सत्यों को तोड़ने-मरोड़ने की प्रवृत्ति इसी का नतीज़ा है।
हालांकि इसके कुछ फ़ायदे भी हुए हैं। मीडिया में ख़बरों और मुद्दों की एकरसता भंग
हुई है। विविधता बढ़ी है और सबसे अहम बात ये कि व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनीतिक
जीवन का जो पुराना भेद था, वह भी एक तरह से ख़त्म हुआ है। यानी अब सबकुछ सामाजिकता
के दायरे में आ गया है। लेकिन सिर्फ इसी एकमात्र बात से ख़ुश होने की ज़रूरत नहीं
है। सोशल स्फीयर के चारित्रिक विचलन के कारण सत्य लगातार संदिग्ध होता जा रहा है,
जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद ख़तरनाक है।

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