बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

उम्मीद(अप्रैल-जून, 2014) में प्रकाशित तीन कविताएँ

आवरण- शिरीष कुमार मौर्य

दुःस्वप्नों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं होती

रुदालियों अपने-अपने घर जाओ
यहाँ अब रूदन का कोई अर्थ नहीं
दधीचियों हो सके तो वापस ले लो
अपनी अस्थियाँ कि अब ज़रूरत नहीं
मेरे शूरवीर क्रांतिकारियों तंबू उखाड़ो
कुमुक बंद होने वाला है और युद्ध स्थगित
न्याय-न्याय रटना बंद करो भाई युधिष्ठिर
कोई और काम नहीं है क्या?

आँसुओं ने धुँधला दी है संजय की आँख
अब तो बख़्श दो इसको युग के धृतराष्ट्र
न वो कर सकता है कुछ और न ही तुम
फिर क्यों कर रहे हो समय बर्बाद?

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

पूँजी की पीठ पर मीडिया नाच

कुछ शब्द ऐसे हैं जो आजकल हर आम-ओ-ख़ास की ज़ुबान पर तकियाक़लाम की तरह चढ़े बैठे हैं और किसी भी सूरत में उतरने को तैयार नहीं हैं। हमें इन शब्दों से कोई आपत्ति भी नहीं है और न ही हमारी ऐसी कोई चाहत है कि लोग इसे अपनी ज़ुबान से उतार दें। उत्तर आधुनिक परिदृश्य में इन शब्दों से छुटकारा संभव है भी नहीं। आप भी इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते होंगे कि प्रत्येक युग की अपनी अलग भाषा और विमर्श-प्रणाली होती है। समय के अनुकूल शब्दों के अर्थ तो बदलते ही हैं, नये शब्दों का जन्म भी होता है और कुछ पुराने शब्दों की डेंटिंग-पेंटिंग भी की जाती है, ताकि वे नये अर्थ-संदर्भों का भार वहन कर सकें। ऐसे ही कुछ पारिभाषिक शब्द हैं- ग्लोबलाइजेशन (वैश्वीकरण), लिबरलाइजेशन (उदारीकरण), डेमोक्रेटाइजेशन (लोकतांत्रीकरण), इंडस्ट्रियलाइजेशन (उद्योगीकरण), कैपिटलिज्म (पूँजीवाद), कन्ज्यूमरिज़्म (उपभोक्तावाद) आदि। वैसे कुछ शब्दों में नियोअथवा नव उपसर्ग लगाकर भी उनका नवीकरण किया गया है, ताकि प्रवृत्तिगत बदलाव को रेखांकित किया जा सके। आप ग़ौर करेंगे तो पाएँगे कि कोई भी विमर्श इन शब्दों के बिना अधूरा है। यहाँ पर इन शब्दों का ज़िक्र रस्मी तौर पर नहीं किया गया है, बल्कि जिस विषय पर हम बात करना चाहते हैं, उसका इन शब्दों से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष संबंध ज़रूर है। वैसे भी जीवन-जगत का प्रत्येक क्रिया-व्यापार एक-दूसरे से जुड़ा होता है और किसी एक में बदलाव का प्रभाव शेष पर पड़ना स्वभाविक है।

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