कुछ शब्द ऐसे
हैं जो आजकल हर आम-ओ-ख़ास की ज़ुबान पर तकियाक़लाम की तरह चढ़े बैठे हैं और किसी
भी सूरत में उतरने को तैयार नहीं हैं। हमें इन शब्दों से कोई आपत्ति भी नहीं है और
न ही हमारी ऐसी कोई चाहत है कि लोग इसे अपनी ज़ुबान से उतार दें। उत्तर आधुनिक
परिदृश्य में इन शब्दों से छुटकारा संभव है भी नहीं। आप भी इस बात से इत्तेफ़ाक़
रखते होंगे कि प्रत्येक युग की अपनी अलग भाषा और विमर्श-प्रणाली होती है। समय के
अनुकूल शब्दों के अर्थ तो बदलते ही हैं, नये शब्दों का जन्म भी होता है और कुछ
पुराने शब्दों की डेंटिंग-पेंटिंग भी की जाती है, ताकि वे नये अर्थ-संदर्भों का
भार वहन कर सकें। ऐसे ही कुछ पारिभाषिक शब्द हैं- ग्लोबलाइजेशन (वैश्वीकरण),
लिबरलाइजेशन (उदारीकरण), डेमोक्रेटाइजेशन (लोकतांत्रीकरण), इंडस्ट्रियलाइजेशन
(उद्योगीकरण), कैपिटलिज्म (पूँजीवाद), कन्ज्यूमरिज़्म (उपभोक्तावाद) आदि। वैसे कुछ
शब्दों में ‘नियो’ अथवा ‘नव’ उपसर्ग
लगाकर भी उनका नवीकरण किया गया है, ताकि प्रवृत्तिगत बदलाव को रेखांकित किया जा
सके। आप ग़ौर करेंगे तो पाएँगे कि कोई भी विमर्श इन शब्दों के बिना अधूरा है। यहाँ
पर इन शब्दों का ज़िक्र रस्मी तौर पर नहीं किया गया है, बल्कि जिस विषय पर हम बात
करना चाहते हैं, उसका इन शब्दों से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष संबंध ज़रूर है।
वैसे भी जीवन-जगत का प्रत्येक क्रिया-व्यापार एक-दूसरे से जुड़ा होता है और किसी
एक में बदलाव का प्रभाव शेष पर पड़ना स्वभाविक है।
बीसवीं
सदी के अंतिम दशक में जो बदलाव आर्थिक-क्षेत्र में दृष्टिगोचर हुए थे, वे सिर्फ
आर्थिक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक
क्षेत्रों को भी संक्रमित किया है। राष्ट्र और राष्ट्रीयता की अवधारणा भी बदली है।
भारत को उदारीकरण और मुक्त अर्थव्यवस्था की तरफ से ऐसी जादू की झप्पी मिली है कि महज
दो दशकों में ही भारत की शासन-व्यवस्था का कायाकल्प हो गया है और राष्ट्रपति
संविधान के उस दावे को भूल गए हैं, जिसके मुताबिक “भारत एक
लोककल्याणकारी गणराज्य है।” गणतंत्र दिवस के मौके पर अपने
संबोधन में वे जनता को यह समझाते नज़र आते हैं कि “सरकार कोई
परोपकारी निकाय नहीं है।” तो क्या देश कोई मल्टीनेशनल
कम्पनी है, जिसको चलाने वाले ‘कर्मचारी समूह’
को ‘सरकार’ कहा जाता है और उससे ये अपेक्षा
की जाती है कि वह अधिक से अधिक मुनाफा कमाए और अपने मालिकान का हित-पोषण करे?
या कि सिर्फ उस उपभोक्ता-समूह पर अपना ध्यान केन्द्रित करे, जिससे कम्पनी का हित
सधता हो? अगर राष्ट्रपति का बयान सही है तो भारत कोई ‘देश’
नहीं बल्कि एक निजी क्षेत्र की कम्पनी ही है। और अगर संवैधानिक रूप से भारत सचमुच
का गणराज्य है और लोक-कल्याणकारी ही है(जिसकी गवाही संविधान देता है।), तो फिर
राष्ट्रपति का ये बयान देश की जनता के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करता। इससे एक
और तथ्य रेखांकित होता है कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र अब अपने समग्र विकास को
लेकर चिंतित नहीं है, बल्कि वह विश्व का सबसे बड़ा बाज़ार बनने को उतावला है। ऐसे
में देश में जो कुछ भी होता है या हो रहा है, सभी सहज स्वीकार्य होने चाहिए। मसलन-
ग़रीबों के उत्थान की चिंता और उनकी मदद नहीं की जा सकती, कुपोषण अथवा बेरोज़गारी
राज्य की समस्या नहीं है, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं जनहित से जुड़े तमाम मुद्दों
और मसलों का समाधान राज्य का दायित्व नहीं है! ख़ैर, मैं
राजनीतिक विश्लेषक नहीं हूँ, लिहाजा इस गंभीर मसले पर विचार-विमर्श का महती
दायित्व विषय-विशेषज्ञों पर ही छोड़ता हूँ। हमारा आशय तो महज यह दर्शाना था कि जब
देश-दृष्टि और स्थिति इतनी ज़्यादा बदली या बदल रही है तो मीडिया भी इसी ताल से
ताल मिलाएगा। अर्थात मीडिया में आया संरचनात्मक और चारित्रिक बदलाव स्वभाविक है,
इसमें अचंभे जैसी कोई बात नहीं है।
मीडिया का
उद्देश्य क्या है? सूचना देना। दायित्व क्या है?
निष्पक्षता और जवाबदेही। और ये तभी संभव है जब मीडिया स्वतंत्र होगा। अगर मीडिया
स्वतंत्र एवं निष्पक्ष होगा तो विश्वसनीय भी होगा। मीडिया की यही विश्वसनीयता उसे
अपने पाठकों-दर्शकों में लोकप्रिय बनाएगी। लेकिन ज़रा रुकिए! ये महज
अवधारणा है और इसका वास्तविकता से कोई साम्य नहीं है। बल्कि किसी सिनेमा हॉल में
सेंसरबोर्ड का सर्टिफिकेट प्रदर्शित करने के ठीक बाद स्क्रीन पर जो डिस्क्लेमर
उभरता है, ‘इस फिल्म के सभी पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं। इसका
किसी जीवित अथवा मृत व्यक्ति से साम्य महज संयोग है।’ ठीक यही
बात मैं मीडिया, उसके उद्देश्य और दायित्वों के बारे में कहना चाहता हूँ। मीडिया न
तो स्वतंत्र है, न ही निष्पक्ष और केवल सूचना-सम्प्रेषण भी इसका लक्ष्य नहीं है।
जहाँ तक जवाबदेही की बात है तो हाँ, बिल्कुल मीडिया जवाबदेह है। लेकिन ये जवाबदेही
पाठकों-दर्शकों के प्रति नहीं, बल्कि अपने मालिकान और विज्ञापनदाता कम्पनियों के
प्रति है। मीडिया सूचना तो पहुँचाता है, लेकिन जनहित के अनुरूप नहीं, बल्कि
बाज़ार-हित के अनुरूप। इतना ही नहीं मीडिया अपने मालिकान और विज्ञापनदाताओं के
मूल्यों और विचारों का पोषण भी करता है और उसके प्रचार-प्रसार में भी उसकी भूमिका
निर्विवाद है। वह बाज़ार-हित में प्रौपेगंडा भी करता है और कई बार
सत्ता-प्रतिष्ठान को सीधी चुनौती देता भी प्रतीत होता है। वैसे इस हम्माम में
सरकारी मीडिया संस्थान भी उतने ही नंगे हैं। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि यहाँ किसी
कम्पनी की नहीं, बल्कि राज्य द्वारा स्थापित मूल्यों एवं आदर्शों और सत्ताधारी दल
के हितों एवं विचारों को तरजीह दी जाती है। यानी मीडिया निजी क्षेत्र का उपक्रम हो
या सार्वजनिक क्षेत्र का, यह हमेशा सत्ता-सम्पन्न प्रभुत्वशाली वर्ग के नियंत्रण
में होता है। इस लिहाज से देखें तो नोम चॉम्सकी ने बिल्कुल सही पकड़ा है कि “मीडिया
पर समाज के प्रभुत्वशाली वर्ग का नियंत्रण है, क्योंकि वे ही इसका आर्थिक पोषण
करते हैं। लिहाजा मीडिया मुख्य रूप से इसी वर्ग की सेवा और इसी के हित में प्रौपेगंडा
करता है।(मैनुफैक्चरिंग कंसेंटः द पॉलीटिकल इकोनॉमी ऑव द मास मीडिया, 2002)“ आप
ख़ुद ही सोचिए कि क्या भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह आज का सच नहीं है?
जो मीडिया
अपने प्रारंभिक दौर में विकासोन्मुखी पत्रकारिता को प्रश्रय देता प्रतीत हुआ था, वही
अब अपना चरित्र बदल रहा है और बाज़ारोन्मुख हो रहा है। उसकी संरचना और प्राथमिकता
में बदलाव स्पष्ट दृष्टिगोचर हैं। उदारीकरण और मुक्त-अर्थव्यवस्था की पीठ पर सवार एवं
संचार-क्रांति के कारण उत्साह से लबरेज़ मीडिया जैसे ही सरकारी नियंत्रण से मुक्त
हुआ, पूँजीपति और प्रभुत्व-सम्पन्न वर्ग ने इसकी लगाम थाम ली और अब अपनी मनमर्ज़ी
से इसको नचा रहा है। ‘ये आकाशवाणी है’, ‘दूरदर्शन पर
संध्या समाचार और सुबह-सवेरे’ देख-देखकर और देश की हवाई तरक्की
और सरकारों की उपलब्धियों से लबालब सरकारी बुलेटिंस देख-देखकर उकताया दर्शक भी
प्रारंभ में बहुत ख़ुश और संतुष्ट था। जब नई दिल्ली टेलीविज़न और आजतक जैसे चैनल
अस्तित्व में आए। लोगों को लगा कि अब सरकारी भोंपू के बरक्स निजी पूँजी की पैदाईश
ये चैनल आम-आदमी की भाषा बोलेंगे। लेकिन यह भ्रम ज्यादा दिन टिक ही नहीं सका। आज
देश में सैंकड़ों की संख्या में चैनल हैं। अलग-अलग क़िस्म के प्रोग्राम हैं। लेकिन
दुर्भाग्य ये है कि सभी या तो सियासी दलों की गोद में जा बैठे हैं या फिर अपने
पूँजीपति आकाओं की भाषा बोल रहे हैं। न्यूज़ चैनलों पर ख़बरों की बजाय गॉसिप्स और
अख़बारों में जनहित से जुड़े कंटेंट की बजाय पेज क्वालिटी, डिज़ाइन और कलर
मैनेजमेंट जैसी चीज़ों पर ज़्यादा गंभीरता दिखाई जा रही है। पाठक और दर्शक ये
सोच-सोचकर हलकान है कि आख़िर संपादकों को क्या हो गया है! वो ऐसा
क्यों कर रहे हैं? पाठक या दर्शक उनकी नज़र में अबोध है या मूर्ख?
या कि उन्हें पाठकों और दर्शकों से कोई सरोकार ही नहीं है? कहीं वो
किसी और लक्ष्य के निमित्त तो 24 घंटे नहीं जुटे रहते? ऐसे
हालात में पूँजी-निर्देशित मीडिया से विकासोन्मुख पत्रकारिता और जनहित के लिए
प्रौपेगंडा की उम्मीद ठीक वैसी ही है, जैसा कि रेगिस्तान में पानी की सहज उपलब्धता
का स्वप्न। दरअसल मीडिया के उद्देश्य और मीडिया की संरचना का आपस में मेल नहीं है। मीडिया की अवधारणा भले ही डेमोक्रेटिक हो, लेकिन उसकी संरचना
पूँजीवादी है। उसका संचालन वाणिज्यिक(कॉमर्शियल) है। उसकी प्राथमिकता सूची में लाभ
सबसे ऊपर है, सूचना-सम्प्रेषण तो निमित्त मात्र है। यह आरोप बिल्कुल सही है कि कि कार्पोरेट
मीडिया और उसकी संस्कृति लोकोन्मुख नहीं, बाजारोन्मुख है। लेकिन मात्र ऐसा कह देने
भर से समस्या हल तो नहीं हो जाती! इसका निदान क्या है?
जैसे-जैसे
मीडिया की जन-विरोधी प्रवृत्तियाँ उद्घाटित हो रही हैं, वैसे-वैसे
मीडिया को लेकर आम-आदमी की धारणा और व्यवहार भी बदल रहे हैं। मीडिया की
विश्वसनीयता लगातार संदिग्ध होती जा रही है। दर्शक और पाठक खीझ और आक्रोश का,
अपने-अपने तरीके से इज़हार करने लगे हैं। लेकिन क्या महज खीझ और आरोपों की
बौछार से समस्या का हल निकल आएगा? क्या मीडिया मालिकान का अकस्मात
हृदय परिवर्तन हो जाएगा और वे अपने उपभोक्ताओँ(हमारी निगाह में अब पाठक-दर्शक
उपभोक्ता ही हैं।) की भावनाओँ का सम्मान करते हुए, अपनी पुरानी लीक पर लौट चलेंगे?
या कि पूँजीपतियों के हाथ से मीडिया की कमान अपने-आप ही छिन जाएगी?
बिना किसी प्रयास के, महज आलोचनाओं के दबाव में ‘डेमोक्रेटिक
मीडिया’ की अवधारणा, वास्तविकता के धरातल पर फलीभूत होती दिखाई देने
लगेगी? ...बिल्कुल नहीं। ऐसा संभव नहीं है। बाज़ारवादी शक्तियाँ जब
सत्ता-प्रतिष्ठानों और नीतियों को अपने हित में प्रभावित कर सकती हैं तो मीडिया की
नकेल भी कस सकती हैं। यही हो रहा है और इससे मुक्ति का एकमात्र रास्ता है- मीडिया
को पूँजी के चंगुल से मुक्त करना। वैसे भी जब हम लोकतांत्रिक देश में रह रहे हैं
तो हमारा मीडिया भी लोकतांत्रिक होना चाहिए। महज आभासी लोकतांत्रिक व्यवस्था या
आभासी लोकतांत्रिक मीडिया से काम नहीं चल सकता। हाँ, मीडिया के लोकतांत्रीकरण के
लिए सिविल सोसाइटी और ज़मीनी स्तर पर काम करने वाली ऐसी संस्थाओं को आगे आना होगा,
जो लाभ और बाज़ार या सत्ता प्रतिष्ठानों के दबाव में आए बग़ैर अपने मूल दायित्व का
निर्वाह यानी सूचना-सम्प्रेषण का काम कर सकें। उसका एक ऐसा सामुदायिक स्ट्रक्चर
विकसित करना होगा, जो उत्पादों के प्रचार और बाज़ार के लिए प्रौपेगंडा सेटिंग को
बाध्य नहीं हो। ‘डेमोक्रेटिक मीडिया’ का जो
खाका रॉबर्ट डब्ल्यू मैक्चेस्नी (मेकिंग मीडिया डेमोक्रेटिक, बोस्टन रिव्यू, 1998)
ने खींचा है, उसके मुताबिक “डेमोक्रेटिक’ मीडिया
को उसकी संरचना और कार्य-प्रणाली के आधार पर आसानी से पहचाना जा सकता है।
संरचनात्मक स्तर पर, ‘डेमोक्रेटिक मीडिया’ आम आदमी
द्वारा संगठित और नियंत्रित होता है। इसका सबसे पहला और सबसे अहम काम वैसी तमाम
ख़बरें पहुँचाना है, जो उस समूह अथवा वर्ग के हित में हो, जिसके द्वारा यह संस्थान
संचालित किया जा रहा हो।“ विविधता वाले इस देश में धर्म,
जाति, क्षेत्र, अमीर-ग़रीब जैसे कई खाँचे हैं, ऐसे में सभी वर्गों के समान हित
नहीं हो सकते। हाँ, ये मुमकिन है कि सभी वर्ग अपने-अपने हितों के अनुकूल स्वतंत्र
रूप से मीडिया स्ट्रक्चर खड़ी करें और सभी का विविध-रंगी स्वर, सत्ता केन्द्र तक
पहुँचे और व्यवस्था निरपेक्ष एवं निष्पक्ष भाव से ‘सर्व जन
हिताय’ नीति तैयार करें। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि उदारीकरण की आँधी
ने अपनी ही जनता के प्रति सत्ता को अनुदार बना दिया है और जनता अब अपने ही चुने
हुए प्रतिनिधियों को संदिग्ध की दृष्टि से देखती है। राष्ट्रपति का ताज़ा बयान भी
जनता और सत्ता के बीच की खाई को उजागर करता है।
हमारे
यहाँ ‘सामुदायिक रेडियो’ आज भी प्रायोगिक दौर में
ही है। इसके विस्तार की संभावना भी नज़र नहीं आती, क्योंकि सरकार ने इसे शिक्षा और
संस्कृति तक ही सीमित कर रखा है। सामुदायिक टीवी जैसी अवधारणा फिलहाल दिवास्वप्न
जैसी ही है। हाँ, ब्लॉगिंग और सोशल साइट्स की मदद से लोग सत्ता और पूँजीवादी
व्यवस्था द्वारा आरोपित अघोषित सेंसरशिप के ख़िलाफ़ संघर्ष की कोशिश कर रहे हैं।
लघु पत्रिकाओं की मदद से गैप को भरने की कोशिशें हो रही हैं, लेकिन यह कार-आमद
साबित नहीं हो पा रहा है। पहुँच के मामले में ये बेहद कमज़ोर हैं। यानी मुख्यधारा
की मीडिया से टक्कर लेने की हैसियत अभी नहीं बन पाई है। क़िस्सा-कोताह ये कि ‘डेमोक्रेटिक
मीडिया’ की यह अवधारणा तभी यथार्थ बन सकेगी, जब इसके नियंत्रण-संचालन
का जिम्मा आम-आदमी के हाथ में हो। यह तभी मुमकिन है, जब हम सामुदायिक भावना को
तरजीह दें और एकजुट हों। नफ़रत या मात्र शाब्दिक विरोध से बदलाव मुमकिन नहीं है।
बदलाव के लिए ज़मीनी स्तर पर संघर्ष की ज़रूरत है और इसके लिए समांतर मीडिया सिस्टम
विकसित कर, जनहित से जुड़े वैसे मुद्दों और ख़बरों को सामने लाना होगा, जो
मुख्यधारा की मीडिया द्वारा सेंसर कर दी जाती हैं। राजनीति में हुई ताज़ा पहल इसका
उदाहरण है। जन लोकपाल की माँग को लेकर उभरे आंदोलन और सरकार तथा जनप्रतिनिधियों के
निराशाजनक व्यवहार के परिणामस्वरूप उसका नई सियासी पार्टी में ट्रांसफॉर्मेशन जैसा
दृष्टांत हमारे सामने है। बाज़ारवादी मीडिया के समांतर एक नया मीडिया स्ट्रक्चर
खड़ा करने की ज़रूरत है। ऐसा होने की स्थिति में ही मीडिया के लोकतंत्रीकरण का
मार्ग भी प्रशस्त हो सकेगा।
इंडी-मीडिया(indymedia.org) के इस
सूत्र-वाक्य से हमारी भी सहमती है कि “मीडिया से नफ़रत न करें, ख़ुद मीडिया बनें।” मीडिया से अगर आप नफ़रत करेंगे तो अप्रत्यक्ष रूप से
उन्हीं छद्म लोकतंत्रवादियों के षडयंत्र को सफ़ल करेंगे, जिनका लक्ष्य ही
लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमज़ोर करना और अपने हित साधना है। पूँजी-पोषित मीडिया का
विरोध तो ज़रूरी है ही, लेकिन साथ ही यह भी ज़रूरी है कि लोकतांत्रिक मीडिया का
पैरेलल स्ट्रक्चर खड़ा किया जाए क्योंकि मीडिया लोकतांत्रिक समाज का सबसे ज़रूरी
हिस्सा और हथियार भी है। इसके बिना आधुनिक समाज की कल्पना बेहद मुश्किल है। आधुनिक
लोकतंत्र में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दायित्वों के निर्वाह के
लिए मीडिया का अस्तित्व आवश्यक है। मीडिया ही वह प्रमुख स्रोत है, जिसकी मदद से हम
तक राजनीतिक-आर्थिक सूचनाएँ पहुँचती हैं और हम सार्वजनिक बहसों-विमर्शों का हिस्सा
बन पाते हैं। इसकी मदद से सार्वजनिक हित से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर सार्थक
विचार-विमर्श करने के साथ ही अपना मत व्यक्त करते हैं और गुण-दोषों का विवेचन-विश्लेषण
भी करते हैं। इसका सबसे बड़ा फ़ायदा ये होता है कि भारत जैसे विविधता वाले देश में
सभी समुदाय और वर्ग के लोगों की भागीदारी सुनिश्चित होती है और सत्ता-प्रतिष्ठान
पर दबाव भी बनता है। आप चाहें तो कह सकते हैं कि मीडिया ही वह टूल है, जिसकी मदद
से नागरिकों के प्रति सत्ता व्यवस्था की जवाबदेही तय होती है और यह संदेश भी
सम्प्रेषित होता है कि सत्ता-व्यवस्था अभी कैसी है और इसे कैसा होना चाहिए। अगर
मैं ग़लत नहीं हूँ तो महात्मा गाँधी के ‘स्वराज’ की जो परिकल्पना है, वह यही है। लेकिन हाँ, सावधानी
भी ज़रूरी है क्योंकि हमारे देश में लोगों को अधिकारों की याद तो रहती है, लेकिन
वे कर्तव्यों के प्रति लापरवाही को निर्दोष मानते हैं। गड़बड़ी की वजह भी यही है।
मेनस्ट्रीम मीडिया की अराजकता के ख़िलाफ़ एकजुटता भी नज़र नहीं आती। सभी अपने-अपने
हितों के संकुचित दायरे में ही देश और उसकी आवश्यकताओं का मूल्यांकन करते हैं। ऐसे
में यह कहना अतिश्योक्ति तो नहीं कि अभी भारतीय जनमानस को सही मायनों में परिपक्व
और लोकतांत्रिक होना शेष है। और जब तक ऐसा संभव नहीं होता, तब तक न तो लोकतंत्र और
न ही मीडिया अपने वास्तविक दायित्वों के प्रति गंभीर हो पाएगी। ऐसे में मीडिया के
लोकतांत्रीकरण की बात अभी दूर की कौड़ी ही है, क्योंकि हमारे यहाँ तो आज़ादी के
बाद जो लोकतंत्र आया, वह अपने चरित्र में सामंती था और अब उसकी जगह पूँजीवाद ले
रहा है। हमारी कमज़ोरियों के कारण ही पूँजी की पीठ पर मीडिया नाच रहा है।

आज के बाजारोंमुख मीडिया के बरक्स जनोन्मुख मीडिया का उभार और उसका सशक्तीकरण लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवश्यकता है और यह कार्य मात्र सदिच्छा से संभव नहीं है |इसके लिए जमीनी संघर्ष और प्रतिबद्धता जरुरी है |इस विचारोत्तेजक आलेख के लिए रिज़वी भाई आपका साधुवाद |
जवाब देंहटाएंVery well written!
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