एक
क्विज हो जाए? ज्यादा भारी-भरकम नहीं है। बस एक ही शब्द
है, जिसका आपको अर्थ बताना है। ‘चर्नलिज्म’ शब्द
सुना है आपने? ‘जर्नलिज्म’
का सहोदर जैसा लगता है- है भी। हाँ, फ़र्क़ सिर्फ इतना है कि जैसे ही हम ‘चर्नलिज्म’
का इस्तेमाल करते हैं, ‘जर्नलिज्म’
की आभा थोड़ी मलिन हो जाया करती है। वैसे ये टर्म भले नया हो, प्रवृत्ति नई नहीं
है। और तो और इसका रूप भी नहीं बदला है। जबकि संचार क्रांति ने बहुत कुछ बदल दिया
है। आपको भी मालूम है। दोहराने की आवश्यकता नहीं। हम उस दौर से बहुत आगे आ चुके
हैं, जब न्यूज़ रूम का देवता ‘टेली-प्रिंटर’
हुआ करता था। जब उसकी ‘कचर-कचर-कच’
जैसी आवाज़ न्यूज़रूम की पहचान हुआ करती थी। ये
आवाज़ न्यूज़रूम में टेबुल के चारों तरफ़ कुर्सियों पर बैठे कॉपी एडिटर्स के लिए ‘अलार्मिंग
साउंड’ की हैसियत रखती थी।
टेली-प्रिंटर के जगते ही ये संदेश मिल
जाता था कि न्यूज़ एजेंसी से ख़बर रिलीज होनी शुरू हो गई है। काग़ज़ों का पुलिंदा
फटने और बँटने लगता और लोग कॉपी लिखने में व्यस्त हो जाते। पत्रकारिता जगत में इसे
‘वायर सर्विस’ के नाम से जाना जाता है। हम जैसे
पर्यावरण-प्रेमियों के लिए काग़ज़ की ये बर्बादी दुखद और चिंतनीय थी। पहले प्रिंट
की शक्ल में एजेंसी से ख़बर, अख़बार या टेलीविज़न के न्यूज़-रूम में पहुँची। अब उस
ख़बर के आधार पर एक दूसरे पन्ने पर स्टोरी बनाई गई और उसे टाइपिस्ट के पास भेजा
गया। टाइपिंग के बाद प्रूफ के लिए कॉपी प्रिंट हुई और ऐसे ही कई मरहलों से गुज़रने
के बाद देर रात अख़बार छपाई के लिए गया। अख़बारों के दफ़्तर में रमन-चमन सामान्यतः
तीन-चार बजे के बाद ही देखा जाता था। डेड-लाईन एक ही थी, यानी अख़बार को प्रिंट के
लिए नियत समय पर भेज दिया जाना चाहिए। संवाददाताओं का काम भी बहुत श्रमसाध्य हुआ
करता था। पहले तो ख़बर को कवर करो। मूल बिंदुओं को डायरी में दर्ज करो। फिर
भाग-भाग कर ऑफिस पहुँचो। रिपोर्ट लिखो और उस पर संपादक की सहमति लो। छपने की
अनुमति मिल गई तो फिर टाइपिंग के लिए दो। आज ये सब सोचकर लगता है कि तब के पत्रकार
कितने जीवट वाले रहे होंगे! इतनी पेचीदी और उबाऊ प्रक्रिया का
हिस्सा बनना भी कम हिम्मत का काम थोड़ी है! तब दाहिने हाथ की उँगलियों पर क़लम के
निशान देखकर ही लोग अंदाज़ा लगा लेते थे कि कोई क़लम-घिस्सू पत्रकार होगा!
और तो और पत्रकारिता के छात्रों को सबसे पहले न्यूज़-रूम की जो रूपरेखा बताई-समझाई
जाती थी, वो भी बड़ी मज़ेदार हुआ करती थी। मसलन न्यूज़-रूम में टेबुल ‘ओवल
शेप’ का होता है। कहीं-कहीं ‘क्रिस्टल डिज़ाईन’
भी हुआ करता है। बजाब्ता ग्राफिक्स और डाईग्राम के माध्यम से बताया जाता था कि ‘टेली-प्रिंटर’
यहाँ पर रखा जाता है। कॉपी एडिटर्स यहाँ-यहाँ बैठते हैं। टाइपिस्टों के लिए यहाँ
पर जगह होती है और प्रूफ-रीडर यहाँ बैठते हैं। ख़बरें कैसे और कहाँ से आती हैं?
आदि-आदि। लेकिन अब ये सबकुछ परियों की कहानी जैसा लगता है। दुनिया कितनी तेज़ी से
बदली है, उसकी एक बानगी के रूप में मीडिया को देखा जा सकता है।
टेलीविज़न के शुरुआती दौर की कथा भी मिलती-जुलती है। थोड़ा सा
ही फ़र्क़ है। यहाँ लंबे-मोटे वीडियो-कैसेट्स(जिसे हमारे जैसे उत्साही मीडियाकर्मी
‘बीटा’ कहा करते थे) थामे विजुअल एडिटर के साथ
स्क्रीन पर आँखें फोड़नी पड़ती थीं। फुटेज और बाइट्स का तब इंतज़ार कुछ यूँ होता
था, गोया कोई नई-नवेली दुल्हन पहली बार मायके आ रही हो। शूटिंग के बाद रिपोर्टर
ऑफिस के लिए कुछ यूँ विदा हुआ करता था, मानो कोई पीछे लगा हो!
अगर कदम रुके या ज़रा सी भी देर हुई तो पीछे वाला उसकी गिरेबान पकड़ लेगा!
जब
पूरा सिस्टम ही ‘मैन्युअल’
हो तो परेशानी तो होगी ही। लिहाज़ा अक्सर ऐसा होता था कि कई ख़बरें एजेंसी से जिस
रूप में आईं, उन्हें वैसे ही आगे बढ़ा दिया गया। प्रेस रिलीज आई तो उसे भी संपादन
या नये सिरे से शब्द संयोजन के बिना ही छपने के लिए भेज दिया गया। हालांकि तब ऐसा
करने के पीछे ‘सबसे पहले मैं’
वाली सोच नहीं, बल्कि समय की कमी मूल कारण हुआ करती थी। आज भी कमोबेश यही हो रहा
है। हालांकि हमारा युग सूचना तकनीक के मामले में स्वर्ण-युग माना जाता है।
न्यूज़-रूम का रूप ही बदल गया है। अब टेली-प्रिंटर की भी ज़रूरत नहीं होती और न ही
काग़ज़ की बर्बादी ही। अब ख़बरों की री-राइटिंग तो दूर, ख़बरों की री-टाइपिंग भी
नहीं होती। एजेंसी या अन्य माध्यमों से ख़बरें अब इंटरनेट के माध्यम से हम तक
पहुँचती हैं और हम कॉपी-पेस्ट की मदद से उसमें अपने हिसाब से थोड़ा-बहुत परिवर्तन
कर काम चला लेते हैं। अब ‘चिप’
वाले कैमरे इस्तेमाल किए जाते हैं। कैसेट्स का झमेला ख़त्म हो गया है और कहीं से
भी वीडियोज की छोटी-छोटी फाइलें बनाकर आसानी से भेजी जा सकती हैं। इसके लिए
पत्रकारों को न्यूज़रूम तक पहुंचने की हड़बड़ी भी नहीं रही। महत्व की ख़बरों को
कवर करने के लिए ‘डीएसएनजी’,
‘ओबी वैन्स’ और ‘बैग-पैक’
का इस्तेमाल होता है। यानी कहीं से भी ‘लाईव टेलीकास्ट’
या सीधा-प्रसारण आज की हकीक़त है। पहले तो बड़े-बड़े ओबी वैन्स की दरकार
होती थी, अब तो एक पिट्ठू बैग की तरह पीठ पर टाँगकर चलते-दौड़ते हुए भी आप
सीधा-प्रसारण कर सकते हैं। यानी टेक्नोलॉजी ने हमें कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया!
जो चीज़ें अभी कल तक बिल्कुल असंभव सी महसूस होती थीं, वो आज की सहज हकीक़त हैं।
स्क्रिप्ट के लिए भी किसी टाइपिस्ट की ज़रूरत नहीं रही। बल्कि तकनीकी सुविधा तो ये
है कि आप बोलते जाएँ और कम्प्यूटर उनको शब्दबद्ध करता जाए। या फिर आप कहीं किसी के
बयान को रिकॉर्ड करें और रिकॉर्डर के एक ऑप्शन ‘ट्रांसक्रिप्शन’
की मदद से उसको टंकित शब्दों में प्राप्त कर लें। ख़बरों को पर लग गए हैं। पल भर
में ही कहाँ से कहाँ पहुँच जाती हैं। अत्याधुनिक तकनीक और इंटरनेट ने
सूचना-सम्प्रेषण के क्षेत्र में जो क्रांतिकारी बदलाव किए हैं, उसकी मदद से फ़क़ीर
भी शाहों की श्रेणी में पहुँच गया है। यानी छोटे संस्थान की पहुँच भी अब उतनी ही
है, जितनी बड़े संस्थानों की।
ये
ठीक है कि मुख्यधारा का मीडिया समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं करता। वह
समाज के उसी तबके से जुड़ी ख़बरों को महत्व देता है, जो बहुसंख्यक हो या
प्रभावशाली हो। यानी कमज़ोर तबके का पक्ष कभी भी मुद्दा नहीं बनता। लेकिन इंटरनेट
की दुनिया ने मुख्यधारा की मीडिया की इस बेईमानी को अर्थहीन बना दिया है। (‘डेली
टेलिग्राफ’ ने जो काम 1994 में डरते-डरते किया था, वह आज बिल्कुल सामान्य
घटना लगती है। लेकिन तब ऐसा नहीं था। ‘डेली टेलिग्राफ’ द्वारा
पहला ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल(इलेक्ट्रॉनिक टेलिग्राफ) लांच करने के करीब तीन साल बाद
बीबीसी ने ऐसा करने का फैसला लिया था। आप समझ सकते हैं कि तब कितनी पेचीदगियाँ
रहीं होंगी!) अब तो इतने सारे वेबसाइट्स और उस पर अलग-अलग स्वाद और
प्रकृति की ख़बरें भरी पड़ी हैं कि आपको ख़बरों की किल्लत महसूस नहीं होगी। अलग-अलग
समुदाय, उनकी ज़रूरतें, उनकी परंपराएँ, उनके विचार और जीवन-दृष्टि ही नहीं बल्कि
देश-समाज से जुड़े तमाम मुद्दों पर उनका पक्ष भी अब सहज ही उपलब्ध है। ये सब न्यू
मीडिया की ही देन है। और तो और मुख्यधारा का मीडिया अब प्रोपगैंडा की मदद से किसी
समूह अथवा संस्थान या दल विशेष के पक्ष में लोगों को बरगला भी नहीं सकता, क्योंकि
न्यू मीडिया की मदद से उसको काउंटर करने की मुकम्मल व्यवस्था है। वैसे न्यू मीडिया
का सबसे बड़ा हथियार तो कम्प्यूटर ही है और अब स्मार्टफोन भी इसका साझीदार बन गया
है। और हाँ, इन दोनों की मदद से प्रत्येक जागरुक व्यक्ति अब रिपोर्टर और
सूचना-सम्प्रेषक बन गया है। वीडियो कैमरे की भी ज़रूरत नहीं रही, फोन में ही कैमरा
भी है और ऑडियो रिकॉर्डर भी। इसी में इंटरनेट की भी सुविधा है। यानी डेस्कटॉप की
तो बात ही छोड़ दीजिए, अगर लैपटॉप भी न हो तो काम चलेगा। आप सफ़र में हों, घर में
हों या कहीं और... अपनी बात, ख़बर, तस्वीर या वीडियो शेयर या अपलोड कर सकते हैं-
आराम से। चाहें तो ब्लॉग बनाएँ। चाहें तो किसी सोशल साइट का हिस्सा बनें और अपने
विचार और सूचनाएँ लोगों तक पहुँचाएँ। सच कहें तो न्यू मीडिया ने मेनस्ट्रीम मीडिया
की राहें आसान की हैं, लेकिन साथ ही उसके सामने इतनी बड़ी-बड़ी चुनौतियाँ भी रख दी
हैं कि वो उससे पार पाने के लिए रोज़-रोज़ अपने चोले यानी फॉर्म बदल रहा है। वैसे
जहाँ तक फॉर्म की बात है तो आज ये हालत सिर्फ मीडिया के साथ ही नहीं है, बल्कि यही
स्थिति भाषा-साहित्य और सियासत के साथ भी है। सभी को बदले हालात में नये फॉर्म की
तलाश है। बीजेपी और कांग्रेस के बरक्स आप की सफलता का कारण भी यही है। अब जनता को
पुराने ढर्रे की राजनीति नहीं चाहिए। अब जनता को पुराने ढर्रे की सूचनाएँ नहीं
चाहिए। अब जनता को पुराने ढर्रे की भाषा नहीं चाहिए। अब जनता को पुराने ढर्रे का
साहित्य नहीं चाहिए। लेकिन सवाल ये भी है कि क्या महज फॉर्म बदल लेने भर से समस्या
का हल निकल आएगा? क्या बदलाव का अर्थ महज फॉर्म या शैली
का ही बदलाव है? अब तक के ऐतिहासिक साक्ष्यों के
मद्देनज़र तो यही होना चाहिए! लेकिन दुर्भाग्य से हो नहीं रहा है। अब
देखिए न! कल तक किसी बयान पर बवाल की स्थिति में नेता फौरन सफाई पेश
करता था कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा था, बयान को तोड़ा-मरोड़ा गया है। और अब नेताओं
में इतना भी धैर्य नहीं बचा है कि वे सार्वजनिक मंच या संसद की मर्यादा का ख्याल
रखते हुए सभ्यता का प्रदर्शन करें। संसद में मिर्च का पाउडर फेंका जाता है। डिबेट
के दौरान तर्कों में पिछड़ने वाले नेता हाथापाई पर उतर आते हैं। लाईव प्रोग्राम के
दौरान भद्दे शब्दों और तू-तड़ाक से अब परहेज जैसी कोई बात नहीं रह गई। जनता के मन
में भी अपने जनप्रतिनिधियों के प्रति सम्मान और पुलिस-प्रशासन को लेकर पहले की तरह
ख़ौफ़ जैसा भाव नहीं रहा। जनता ऊब की गिरफ्त में है तो नेता और सत्ता-व्यवस्था के
सभी अंग झुंझलाहट के शिकार।
क्या
उपरोक्त बातें अक्षरशः सही हैं? आप कहेंगे- प्रत्यक्ष को प्रमाण की
क्या ज़रूरत? लेकिन मेरे ख़्याल से ज़रा ठहर कर
सोचने की ज़रूरत है। भावातिरेक में कभी-कभी सच भी धुँधला जाता है और झूठ की चमक
बढ़ जाया करती है। न्यू मीडिया ने सिर्फ वरदान की तरह हमारे जीवन में प्रवेश नहीं
किया है, बल्कि अपने साथ अभिशाप भी लेकर आया है। मसलन विश्वसनीयता का संकट!
ये संकट सूचना और सम्प्रेषण या अन्य तमाम चीज़ों से बड़ा है। ‘सत्य’
की तलाश का काम और दुष्कर हो गया है। सच की पड़ताल और परख अब बहुत मुश्किल काम है।
हम होड़ के शिकार हैं और व्यवसायिकता ने दायित्व और ‘एथिक्स’
को ‘साइड-लाइन’ कर दिया है। मौलिकता संकटग्रस्त हो गई
है। इंटरनेट ने ‘कॉपी-पेस्ट कल्चर’
को बढ़ावा दिया है। नई-नई सूचनाएँ कम आ रही हैं, पुरानी सूचनाओँ को फॉर्म बदल-बदल
कर हमारे सामने पेश किया जा रहा है। सूचना के स्रोतों की संख्या बढ़ी है, लेकिन
उनके दोहन की दिशा में हम कम ही बढ़े हैं। मूल में समय और लागत का दबाव है। एक ही
स्रोत से प्राप्त सूचनाओं को मात्र भाषाई रद्दो-बदल के साथ अलग-अलग माध्यमों और
जगहों पर परोसा जा रहा है। अब भी ‘वायर’
और अन्य एजेंसियों द्वारा ‘प्री-पैकेज्ड’
सामग्री का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। पहले ऐसा तकनीकि कमज़ोरी के कारण होता
था। समय के अभाव के कारण होता था। अब यह समय बचाने और कम लागत पर अधिक मुनाफा
कमाने के लिए हो रहा है। आशय इतना ही है कि होड़ और लोभ ने जर्नलिज्म की एक नयी
शाखा को जन्म दिया है, जिसे हम ‘चर्नलिज्म’
के नाम से जानते हैं।
‘चर्नलिज्म’
शब्द का पहले-पहल प्रयोग निक डेविस ने किया था और फिर देखते ही देखते ये शब्द एक
टर्म के रूप में स्थापित और प्रचलित हो गया। वैसे इस दौरान इसका अर्थ विस्तार भी
हुआ है और इसमें कई प्रवृत्तियों को जोड़ दिया गया है। ‘चर्नलिज्म’
शब्द दरअसल ‘चर्न’
से बना है, जिसका अर्थ होता है मथानी या मथने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला बड़ा
मटका। हम जिस संदर्भ में ‘चर्न’
को ग्रहण करते हैं, वह स्पष्टतः ‘बड़ा मटका’
है। अगर आप ग्रामीण इलाके में रहे हैं तो आपको पता होगा कि पहले मलाई को किसी बड़े
मटके में एकत्र किया जाता है, फिर मथानी की मदद से मथा जाता है और तब जाकर मक्खन
निकलता है। यह श्रम-साध्य प्रक्रिया है। ख़बर के साथ भी यही प्रक्रिया दुहराई जाती
है। न्यूज़रूम को आप बड़ा मटका मान सकते हैं, जहाँ अलग-अलग एजेंसियों और दूसरे
माध्यमों से ख़बरें आती हैं। ऐसा नहीं है कि ये ख़बरें सही तरीके से लिखी या
कम्पोज़ की हुई नहीं होतीं। हाँ, ये ज़रूर है कि हम जिस माध्यम के लिए काम कर रहे
होते हैं, उसके अनुरूप उस ख़बर को फिर से ढालते हैं। अलग-अलग अख़बारों या न्यूज़
चैनल्स के अपने विशेष भाषा-संस्कार होते हैं, उसके आलोक में ख़बरों की री-राइटिंग
होती है। यानी कॉपी एडिटर या स्क्रिप्ट राइटर मथानी का काम करता है और अपने हिसाब
से मक्खन रूपी न्यूज़ का परिष्करण करता है। इस तरह ख़बरें रिलीज की जाती हैं।
लेकिन न्यू मीडिया के दौर में ‘सबसे पहले’
की प्रवृत्ति बढ़ी है। लिहाजा ख़बर प्रसारित या प्रकाशित करने की जो परंपरागत
प्रक्रिया थी, वो बाधित हुई है और डेविस ने इसी प्रवृत्ति को उद्घाटित करने के लिए
‘चर्नलिज्म’ टर्म का इस्तेमाल किया है। कॉलिन्स डिक्शनरी
में ‘चर्नलिज्म’ शब्द को कुछ यूँ परिभाषित किया गया है-
“जर्नलिज्म का एक ऐसा रूप, जिसमें प्रेस रिलीज, वायर, एजेंसी या
किसी अन्य माध्यम से आई बनी-बनाई ख़बर के आधार पर किसी समाचार पत्र अथवा किसी अन्य
संचार माध्यम के लिए जब कोई लेख अथवा ख़बर लिखते या बनाते हैं तो इसे हम चर्नलिज्म
कहते हैं।” ज़माना पूँजी और मुनाफे का है। लिहाजा लागत और समय का मूल्य
अत्यधिक है। कम से कम लागत में अधिक से अधिक मुनाफा आधुनिक पूँजीवादी युग की मुख्य
प्रवृत्ति है और चर्नलिज्म की जनक भी यही सोच है। इससे लागत में तो कमी आती ही है,
समय की भी बचत होती है और आपके न्यूज़ चैनल या वेबसाइट पर ख़बर बहुत कम समय में
पहुँच जाती है। इसमें ख़बर की सत्यता और ख़बर से जुड़ी अतिरिक्त सूचनाओं को इकट्ठा
करने का झमेला भी नहीं रहता। इस तरह आप अपने पाठक, श्रोता या दर्शक तक जो ख़बर
पहुँचाते हैं, उसकी गुणवत्ता और विश्वसनीयता- दोनों ही प्रभावित होती है।
‘चर्नलिज्म’ को
बढ़ावा देने में ख़ासतौर से जिन दो माध्यमों का योगदान है, वो हैं- इलेक्ट्रॉनिक
मीडिया और वेबसाइट्स। अख़बारों में हर पल डेडलाईन की तरह नहीं होता। वहाँ एक ही
डेडलाईन है। जबकि इलेक्ट्रॉनिक और वेब मीडिया में हर पल डेडलाईन ही है। इसीलिए इन
दो माध्यमों में त्रुटियों और ग़लत सूचनाओं के सम्प्रेषण का ख़तरा भी बहुत है। और
दुर्भाग्य से ‘सबसे
पहले’ की
होड़ में असावधानियों को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है और नतीज़तन जनता में न सिर्फ
सूचनाओं को लेकर बल्कि सम्प्रेषण में लगी संस्थाओं की विश्वसनीयता भी संदिग्ध होती
जा रही है। ‘चर्नलिज्म’ का
चारण न्यू मीडिया और अन्य माध्यमों के सामने जो सबसे बड़ा संकट है, वो विश्वसनीयता
का संकट ही है। हालांकि अभी उम्मीदों का दामन इतना भी तंग नहीं हुआ है कि हम निराश
हो जाएँ। बदलाव तो अवश्यंभावी है। हाँ, उसकी त्वरा को लेकर भविष्यवाणी हम नहीं कर
सकते।

सूचनाओं का सम्प्रेषण शीघ्रतर हो लेकिन विश्वसनीयता और पूरी जिम्मेदारी के साथ हो |
जवाब देंहटाएंबेहतरीन ब्लॉग... पढ़ कर मज़ा आ गया, बहुत दिनों बाद किसी विषय पर इतने बेहतरीन लहज़े में कुछ पढने को मिला... शुक्रिया अकबर रिज़वी भाई...
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