अब तो
ज़माना बदल रहा है। ख़ास तौर से शहरों में माँ-बाप अपने बच्चों की पसंद को तरजीह
देने लगे हैं। ‘लव कम अरेंज मैरेज’ का चलन
है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में अभी भी शादी का परंपरागत तौर-तरीक़ा ही स्थापित है।
ऐसी शादियाँ बिना ‘अगुआ’ के मुमकिन नहीं हुआ करतीं। अगुआ
की भूमिका को समझने का सबसे आसान तरीक़ा तो यही है कि आप किसी मवेशी मेले में जाएँ
और वहाँ गाय-भैंस या बैल की बिक्री में जुटे दलाल की बातें सुनें। जैसी बातें वहाँ
पर होती हैं, कमोबेश वैसे ही संवाद अगुआ के मुँह से निर्झर की तरह उस वक़्त झड़ते
हैं, जब वह किसी विवाह योग्य वर अथवा वधू के बारे में संबंधित पक्ष को बता रहा
होता है। अगुआ की छवि कैसी होती है? इसको जानने के लिए लोकगीतों पर भी
ग़ौर किया जा सकता है। अगुआ से जुड़ा शायद ही कोई ऐसा लोकगीत आपको मिले, जिसमें
उसकी प्रशंसा की गई हो या धन्यवाद दिया गया हो!
अगुआ को तो शादी में भी गाली ही देने का चलन रहा है। ख़ासतौर से औरतें अपने गीतों के माध्यम से अगुआ की ख़ूब आरती उतारा करती हैं और मजाल है कि ऐसे सुभाषितों को सुनकर भी उसके चेहरे पर एक शिकन आ जाए! अगुआ इन गालियों को भी अपनी प्रशंसा के रूप में ही लेता और मुस्कराता रहता है। अगुआ की अक़्लमंदी से जुड़ी लोककथाएँ भी ख़ूब मशहूर हैं। यानी अगुआ को दोतरफा हमला झेलना पड़ता है। लड़की वाले भी और लड़का वाले भी, दोनों को हमेशा ये लगता रहता है कि अगुआ ने उन्हें बेवकूफ़ बना दिया। लोक-समाज में ‘अगुआ’ जितना बदनाम शब्द है, उतना ही ज़रूरी भी। अगुआ हमारे समाज रूपी साँप के गले में फंसे छछुंदर की तरह है, जिसे न तो उगला जा सकता है और न ही निगलने से ही काम चल सकता है। बार-बार ठगे जाने का एहसास लिए लोग भी अगुआ की महत्ता को नकार नहीं सकते। अगर साँप-छछुंदर वाली उक्ति पर आपत्ति हो तो आप ‘अगुआ’ को नारद का लोकरूप मान सकते हैं। जिस तरह सब्ज़ी में नमक की मौजूदगी बेहद ज़रूरी है, ठीक उसी तरह वैवाहिक-आयोजनों में अगुआ की उपस्थिति।
अगुआ को तो शादी में भी गाली ही देने का चलन रहा है। ख़ासतौर से औरतें अपने गीतों के माध्यम से अगुआ की ख़ूब आरती उतारा करती हैं और मजाल है कि ऐसे सुभाषितों को सुनकर भी उसके चेहरे पर एक शिकन आ जाए! अगुआ इन गालियों को भी अपनी प्रशंसा के रूप में ही लेता और मुस्कराता रहता है। अगुआ की अक़्लमंदी से जुड़ी लोककथाएँ भी ख़ूब मशहूर हैं। यानी अगुआ को दोतरफा हमला झेलना पड़ता है। लड़की वाले भी और लड़का वाले भी, दोनों को हमेशा ये लगता रहता है कि अगुआ ने उन्हें बेवकूफ़ बना दिया। लोक-समाज में ‘अगुआ’ जितना बदनाम शब्द है, उतना ही ज़रूरी भी। अगुआ हमारे समाज रूपी साँप के गले में फंसे छछुंदर की तरह है, जिसे न तो उगला जा सकता है और न ही निगलने से ही काम चल सकता है। बार-बार ठगे जाने का एहसास लिए लोग भी अगुआ की महत्ता को नकार नहीं सकते। अगर साँप-छछुंदर वाली उक्ति पर आपत्ति हो तो आप ‘अगुआ’ को नारद का लोकरूप मान सकते हैं। जिस तरह सब्ज़ी में नमक की मौजूदगी बेहद ज़रूरी है, ठीक उसी तरह वैवाहिक-आयोजनों में अगुआ की उपस्थिति।
सूचना युग
में लोकतंत्र की धुन पर नागिन डांस में व्यस्त मीडिया को नज़दीक से देखते हुए, ‘अगुआ’
की याद आपको भी स्वभाविक ही लगनी चाहिए। आज मीडिया में या मीडिया द्वारा
जो कुछ भी हो रहा है, वह बहुत हद तक किसी अयोग्य वर की योग्य कन्या से शादी और
इसको किसी भी हालत में संभव बनाने की कवायद जैसा ही है। आप मीडिया को लाख गाली
दें। कोसें। बिका हुआ कह लें। दलाल कह दें। लेकिन बिना अख़बार या टीवी के आपकी
दिनचर्या की शुरुआत लगभग नामुमकिन है। आप ख़बरें देखेंगे। आप ख़बरों को डॉक्टर्ड
कहेंगे। आप ख़बरों को प्रोजेक्टेड कहेंगे। पेड कहेंगे। लेकिन पढ़ेंगे-देखेंगे।
यानी मीडिया, ठीक अगुआ की तरह बुरा तो है, लेकिन इसके बग़ैर आप रह भी नहीं सकते।
हो सकता है, आपको मेरी ये बात बेतुकी लगे! लेकिन हाल की कुछ घटनाओँ
को देखते हुए, मेरे ज़ेहन में बार-बार मीडिया की जगह अगुआ की ही छवि उभरती रही है।
आप भूले नहीं होंगे, दिल्ली का रामलीला मैदान और अन्ना का अनशन!
केजरीवाल की ज़िद और सियासी दलों की बेशर्मी के बीच आम आदमी पार्टी का गठन। तब आम
आदमी से ज़्यादा मीडिया उत्साहित था। अख़बार के पन्ने अन्ना-केजरीवाल से रंगे
रहते। टीवी स्क्रीन पर रामलीला मैदान की लाईव लीला चलती रहती। ऐसा लगता था, मानो
मीडिया का सामाजिक स्वाभिमान जाग उठा हो! तब बीजेपी-कांग्रेस और
अन्य दलों के लिए मीडिया बेलगाम थी, केजरीवाल की ही तरह अराजक और गैरजिम्मेदार थी।
वक़्त बदला। मीडिया मोदीमय हो गया। नौबत यहाँ तक आई कि कांग्रेस को लगा कि उसके
नेताओं को जानबूझकर मीडियाकर्मी टार्गेट कर रहे हैं और टॉक शोज़ में भी उन्हें
बेइज्ज़त करने के लिए ही बुलाया जाता है। लिहाजा उन्होंने कुछ दिनों तक मीडिया का
बहिष्कार करने तक की कोशिश की। इसी बीच दिल्ली विधानसभा चुनाव हुआ। केजरीवाल के
करामात ने फिर से मीडिया को आकर्षित किया तो बीजेपी और नरेन्द्र मोदी नाराज़ हो
उठे। और फिर एक दिन बम फटा! अरविंद केजरीवाल ने दोबारा सीधे
मुकेश अम्बानी पर हमला बोल दिया। टीवी स्क्रीन का नज़ारा बदल गया। अरविंद गुजरात
गए। नज़ारा थोड़ा और बदला। मीडिया रोज़ ही बिकता रहा! किसी ने
बीजेपी के हाथों बेचा। किसी ने कांग्रेस के हाथों बेचने की सिफारिश की। किसी ने ‘आप’
के घर भेज दिया। मीडिया-माहौल को मोदीमय होता देख, केजरीवाल आपे से बाहर हुए तो
उन्होंने भी कह दिया कि मीडिया भी बिका हुआ है। (हालांकि उन्होंने कुछ मीडिया
संस्थानों की बात की थी, जिसे मीडिया ने अपनी आदत के अनुकूल पूरी बिरादरी पर थोप
दिया।) इस बयान के बाद मीडिया के लिए केजरीवाल सबसे बड़े वीलेन हो गए। तमाम चैनलों
ने रिकॉर्ड खंगाल-खंगाल कर, पुराने ब्योरे जुटा-जुटा कर, छोटी-छोटी बातों को
महाकाय बना-बनाकर दिखाना शुरू किया। एक चैनल ने तो कुछ यूँ कमाल किया कि हम अब तक
यही सोच रहे हैं कि इससे फ़ायदा किसको हुआ?
केजरीवाल
के इंटरव्यू के बाद, उनके साथ पुण्य प्रसून बाजपेयी की अनौपचारिक बातचीत का छोटा
सा क्लिप लीक हो गया। इस क्लिप में ऐसा कुछ भी नहीं था कि उस पर कोई न्यूज़ चैनल
अपना पूरा दिन बर्बाद कर सके। इस क्लिप में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे पुण्य
प्रसून बाजपेयी की विश्वसनीयता प्रश्नांकित की जा सके। इस क्लिप में ऐसा कुछ भी
नहीं था, जिससे यह साबित होता हो कि ‘आजतक’ के साथ ‘आप’
की कोई सेटिंग है। फिर भी ऐसा हुआ। पुण्य प्रसून की विश्वसनीयता पर सवाल उठे।
केजरीवाल और उनकी पार्टी की इमानदारी पर उँगली उठी। सोशल मीडिया पर एक गंभीर
न्यूज़ एंकर के दो शब्द ‘क्रांतिकारी... बहुत क्रांतिकारी’
मज़ाक बन गए। ऐसा क्यों हुआ? कुछ लोगों का कहना है कि दरअसल जी
न्यूज़ के संपादक की ब्लैकमेलिंग के आरोप में गिरफ्तारी के बाद पुण्य प्रसून ने
जिस तरह जी-न्यूज़ छोड़ा था, ये उसी खुन्नस का नतीज़ा था। कुछ लोगों ने कहा कि ये
क्लिप बीजेपी और मोदी के इशारे पर सार्वजनिक किया गया, क्योंकि ‘आजतक’
पर इन दिनों केजरीवाल को ख़ासी तरजीह दी जा रही थी। तो कुछ ऐसे भी लोग थे, जिनकी
नज़र में ये सारा प्रपंच मुकेश अम्बानी के इशारे पर ‘आप’
और केजरीवाल की छवि को डैमेज करने के लिए रचा गया था। सियासी दल अपनी लीक पर चल
रहे हैं। मीडिया अपनी लीक पर चल रहा है। पाठक-दर्शक अपने-अपने दृष्टिकोण से चीज़ों
को देख-समझ रहे हैं। यानी दुनिया का कारोबार जैसे पहले चल रहा था, वैसे ही अब भी
जारी है। सियासी दलों का परंपरागत स्ट्रक्चर और कल्चर है। वहाँ आरोप और प्रत्यारोप
दोनों ‘आइटम सांग’ की ही तरह लिए जाते हैं। लेकिन
मीडिया? मीडिया अपनी विश्वसनीयता को लगातार संदिग्ध बना रहा है। क्या
ये भी कोई स्ट्रेटजी है? या कि महज संयोग ही ऐसे बन रहे हैं?
कम से कम ताज़ा हालात में ये प्रश्न बेमानी नहीं हैं। लेकिन क्या मीडिया को अपनी
विश्वसनीयता पर गहराए इस संकट की कोई चिंता है? अगर
चिंता है तो छवि को बनाए रखने के लिए क्या रणनीति है? अगर कोई
रणनीति है तो फिर उस पर अमल की पहल क्यों नहीं होती? या कि
मीडिया ने ये मान लिया है कि वह बिल्कुल ‘अगुआ’ जैसी
भूमिका में है और इस तरह की आलोचनाएँ और टाँग-खिंचाई उसके लिए सामान्य घटनाएँ हैं।
ऐसे आरोपों या आक्षेपों से मीडिया की सेहत पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ने वाला!
इन
प्रश्नों से जूझते वक़्त एक और प्रश्न अपने लिए जगह बनाने की जुगत में है। वो ये
कि क्या मीडिया वाकई पक्षपात कर रहा है? और अगर पक्षपात नहीं कर
रहा तो फिर वह अपने पाठकों-दर्शकों में अपनी निष्पक्षता साबित क्यों नहीं कर पा
रहा? या कि ‘अगुआ’ की ही
तरह मीडिया ने भी सुभाषितों में रस लेना सीख लिया है? उस पर
आक्षेपों का असर नहीं होता! अगर इन प्रश्नों के उत्तर ‘हाँ’
हैं तो ये मीडिया के लिए अपने पैरों में ख़ुद ही कुल्हाड़ी मारने वाली स्थिति है।
आपको याद होगा! पिछले दो दशकों के दौरान मीडिया के कंटेंट को लेकर कई
बार सवाल उठे। पेड न्यूज़ चलाने के आरोप लगे। देश से जुड़े संवेदनशील और गंभीर
मुद्दों पर मीडिया के रवैये की आलोचना भी हुई। हर बार मीडिया एकजुट होकर सामने
आया। सभी ने मिलकर सरकारी नियंत्रण का विरोध किया। अपने स्तर पर अपने गिरेबाँ में
झांकने की कोशिशें हुईं। लेकिन 21वीं सदी के दूसरे दशक की शुरुआत ने मीडिया
संस्थानों के बीच की एकता, मीडियाकर्मियों के बीच का सौहार्द्र, आत्म-निरीक्षण की
भूख, जन-हितैषी होने का दंभ(दिखावा ही सही)... सबकुछ छीन लिया है। एथिक्स अपनी
महत्ता खोती जा रही है। व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा के अतिरेक में मीडिया संस्थान
एक-दूसरे को निर्वस्त्र करने में जुटे हैं। दरअसल राजनीतिक वातावरण, मीडिया का
मानक अथवा आदर्श, उसका विनियमन अथवा व्यवस्थापन और मीडिया का स्वामित्व;
यही वो चार महत्वपूर्ण कारक हैं, जिनकी मदद से मीडिया की दशा एवं दिशा तय होती है।
इन चार कारकों के आधार पर मीडिया की वर्तमान स्थिति को देखें तो उसकी रीति-नीति
में आए आमूलचूल बदलाव का सच स्वतः स्पष्ट हो जाता है। भारत के मीडिया परिदृश्य में
निजी कम्पनियों की आमद के बाद का शायद यह पहला बड़ा बदलाव है। मीडिया को इससे
पहले(आपातकाल को छोड़ दें) कभी ऐसा दबाव नहीं झेलना पड़ा था। बल्कि अभी एक दशक
पहले तक मीडिया देश में एक बड़े दबाव समूह के रूप में स्थापित होता सा प्रतीत हुआ
था। लेकिन ये प्रतीति ही रही। आज मीडिया राजनीतिक-आर्थिक दबाव से कराह रहा
है। मीडियाकर्मी किंकर्तव्यमूढ़ वाली स्थिति में हैं। मसला महज नैतिकता या आदर्श
और दायित्व का नहीं रहा। वो दिन दूर नहीं जब कवरेज़ में भी आरक्षण की माँग उठने
लगेगी और इसके लिए भी बज़ाब्ता कोई राजनीतिक अथवा सामाजिक आंदोलन उठ खड़ा होगा।
वर्तमान के आईने में भविष्य के मीडिया की जो छवि बन रही है, वह बहुत ही त्रासद है।
हालांकि वर्तमान स्थिति भी कम दुखदायी नहीं है। देश का राजनीतिक वातावरण अस्थिर
है। नव-पूँजीवादी शक्तियाँ उतावली में हैं। उन्हें जल्दी से जल्दी संसाधनों
पर स्वामित्व चाहिए। वे धैर्य नहीं रख सकतीं। भारत में उदारीकरण की जल्दबाज़ी ने
मीडिया के लिए मानक तय करने की मोहलत ही नहीं दी। मीडिया संस्थानों का अपना ऐसा
कोई स्वतंत्र आर्थिक ढाँचा बन ही नहीं पाया कि उसे पूँजी की तरफ हाथ न बढ़ाना
पड़े। ऐसे में मीडिया का स्वामित्व उन्हीं शक्तियों के हाथ में शनैःशनैः जा पहुँचा,
जो मुनाफ़ा के भूखे थे या हैं। मीडिया और सत्ता के बीच का अंतर्संबंध भी बड़ा ही
जटिल है। और हाँ, ये बात सिर्फ भारतीय मीडिया पर ही सटीक नहीं बैठती, बल्कि यह
त्रासदी वैश्विक है। अमेरिका में तो मुख्यधारा की मीडिया को कतिपय विद्वान सरकार
का ‘लैपडॉग’ मानते हैं। ब्रिटेन की बीबीसी
कहने को तो सरकारी नियंत्रण से मुक्त है। उसके व्यवस्थापन और नियमन की भी अपनी
स्वतंत्र व्यवस्था है, लेकिन फिर भी अतीत में ऐसे कई घटनाक्रम हुए हैं, जिनके आलोक
में उसकी निष्पक्षता को असंदिग्ध नहीं कहा जा सकता।
समस्या
बहुस्तरीय है। हम मीडिया को समाज का अगुआ मान बैठे हैं। राजनीति उसे अपना पब्लिक
रिलेशन ऑफिसर मानती है। पूँजीपति उसी मीडिया का ख़ुद को स्वामी समझता है। राजनीति
में भी अलग-अलग गिरोह हैं और सभी की मीडिया पर समान दावेदारी है। सभी की ख़्वाहिश
ये है कि मीडिया उसको किसी भी क़ीमत पर महान घोषित करे। इस मामले में किसी और की
हिस्सेदारी इन्हें मंज़ूर नहीं। स्वामी तो ख़ैर स्वामी ही ठहरा। उसे ये बात हजम हो
ही नहीं सकती कि उसी के पैसे पर पलने वाला चाकर, उसी की बुराई पर उतारू हो
जाए। जबकि जनता है कि उसे सबकुछ निष्पक्ष चाहिए, भले ही वो ख़ुद निष्पक्ष हो-न-हो!
साधु-भाषा में कहूँ तो समस्या की जड़ लालसा ही है। सभी को सिर्फ अपना हित दिख रहा
है, दूसरे का हित-अहित समझ में नहीं आता। अब ऐसे में मीडिया करे तो क्या करे?
वह जनता की अगुआई करे तो सत्ता रुष्ट होती है। सत्ता की चापलूसी करे तो
विपक्ष हत्थे से उखड़ जाता है। किसी एक विपक्षी की प्रशंसा हो तो शेष फुटेज के
बखरे में घपलेबाज़ी का आरोप तान देते हैं। किसानों की बात हो तो उद्योगपतियों की
आँखें लाल हो उठती हैं। उद्योगों की बात हो तो किसानों के जबड़े कस जाते हैं। अब
मीडिया किस-किस की अगुआई करे और किस-किस के इरादों और अरमानों को पूरा करे!
निष्पक्षता का मानदंड भी पक्षपातपूर्ण ही है। ऐसे स्वार्थपूर्ण माहौल में मीडिया से निष्पक्षता की उम्मीद भी तो बेमानी ही है। दिक्कत
तो ये भी है कि युग सूचना और सम्प्रेषण का युग है। लेकिन संकट में सबसे
ज्यादा सम्प्रेषणीयता ही है। लिहाजा मीडिया तमाम आरोप-प्रत्यारोपों के बीच भी अगर
बिल्कुल सहज अंदाज़ में दिखता है तो आप इसे ‘अगुआ’
वाली नियति के दायरे में रख सकते हैं। आधुनिक समाज बिना मीडिया के रह नहीं
सकता। और मीडिया की मजबूरी ये है कि वह बिना पूँजी के चल नहीं सकती। तो ऐसी
परिस्थिति में मीडिया अगर अगुआ की तरह ही रिएक्ट करती है तो यह अचरज जैसी बात नहीं है।
वैसे भी
हम-आप अपने जीवन में जितने सपने देखते हैं, क्या वे सब पूरे हो जाते हैं?
जिन मित्रों और रिश्तेदारों से उम्मीदें पालते हैं, क्या वे सभी उम्मीदों पर खरे
उतर पाते हैं? नहीं ना! तो मीडिया के मामले में भी कुछ
ऐसा ही है। ज़रा सोचिए तो, उदारीकरण ने हमारा हृदय कितना उदार कर दिया था। कितने
सुंदर-सुंदर सपने दिखाए गए थे! तकनीकी विकास और सूचना समाज के फैलाव
से पारदर्शिता और निष्पक्षता की उम्मीदें पाली गई थीं। निजी कम्पनियों के
सूचना-व्यवसाय में आने के बाद प्रतिस्पर्धा का बढ़ना तय माना गया था। और इस
प्रतिस्पर्धा के दबाव में सच को सटीक और खरे अंदाज़ में सबसे पहले लोगों तक
पहुँचाने के लिए होड़ की कल्पना की गई थी। समाज के तमाम पहलुओं के प्रकाशित होने
की इसमें गुँजाईश नज़र आई थी। जीवन-जगत से जुड़े तमाम पहलुओं और अब तक गौण रही
आवाज़ों के प्रस्फुटन का दावा किया गया था। लेकिन सपने तो सपने ही होते हैं, सपने
ही रहते हैं। यहाँ भी ऐसा ही हुआ। मीडिया संस्थानों की विश्वसनीयता का पारा चढ़ने
की बजाय लगातार नीचे ही गिरता रहा है, गिर रहा है। भ्रष्ट अधिकारी पहले डरते थे।
सत्ता जन-विरोधी कदम उठाने से पहले सोचती थी। नेता कुछ भी बोलने से पहले सोचता था।
मीडिया को फेस करने से घबराता था। पूँजीपति मीडिया को सेट करने के लिए सौ जुगत भिड़ाया
करते थे। फिर देखते ही देखते मीडियाकर्मी किनारे होते गए। मीडिया पर स्वामित्व
रखने वाले लोग केन्द्र में आने लगे। पहले पूँजीपतियों ने और फिर नेताओं-दलों ने
मीडिया को सेट करना सीख लिया। और अब सबकुछ पूरी तरह से सेट है। आरोप मीडिया का
स्वामित्व रखने वालों पर नहीं लगता। आरोप मीडिया को सेट करने वालों पर नहीं लगता।
आरोप मीडियाकर्मियों पर लगता है। मालिक के चाकर, मालिक का दिया खाते हैं, मालिक का
ढोल बजाते हैं। और लोग हैं कि नौकर से नैतिकता की उम्मीद रखते हैं, मालिक की जान
बख़्शते हैं! नौकर तो तभी नैतिक होगा न, जब उसका मालिक भी नैतिक हो!
सिस्टम नैतिक हो! सियासत नैतिक हो! यहाँ तो
सबकुछ गंदला-गंदला सा नज़र आता है।
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बहुत सटीक विश्लेषण |मीडिया के गिरते स्तर के लिए मीडिया मालिकों ,जो दुर्भाग्य से देश के बड़े पूंजीपति घराने हैं -की हितसाधन की लालसा है |मीडिया को कोसने की बजाय जरुरत समस्या की इस जड़ पर प्रहार करने की है |इस गंभीर विमर्श के लिए आपका साधुवाद |
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