(हरिगंधा के अप्रेैल-मई 2014 में प्रकाशित लघुकथा)
अदब- ज़रा ये तो बताना... तुम नक़ाब क्यों लगाती हो?
अदीबा- बस यूँ ही... अच्छा लगता है। ख़ुद को सेक्योर
फील करती हूँ।
अदब- तो क्या वो तमाम लड़कियाँ इनसेक्योर होती हैं,
जो नक़ाब नहीं लगातीं?
अदीबा- नहीं... ऐसा मैंने कब कहा?
अदब- तुम्हारी बातों से तो ऐसा ही लगा...
अदीबा- अब मैं क्या बताउँ? शुरू से
ही लगा रही हूँ तो अब उतारने पर अटपटा लगता है।
अदब- कहीं घरवाले तो दबाव नहीं डालते?
अदीबा- अरे नहीं... बिल्कुल भी नहीं।
अदब- एक बार हटाकर तो देखो नकाब... एक-दो दिन अटपटा
लगेगा, फिर बेहतर फील करोगी।
(और इस तरह अदीबा ने नक़ाब उतार फेंकी। दो-तीन दिनों
तक तो चुप्पी रही। न अब्बू मोमिन और न ही अम्मी हया ने कुछ कहा। लेकिन चौथे
दिन...)
हया- बेटी ये क्या... तुम्हारे रंगढंग तो समझ ही नहीं
आते?
अदीबा- नहीं तो..! ऐसा तो कुछ किया नहीं मैंने...
हया- अब और क्या बचा..? घर की
इज्ज़त यूँ सड़कों पर बेपर्दा हुई जा रही है!
अदीबा- अम्मी... सिर्फ नक़ाब उतारे हैं... कपड़े पहनना
नहीं छोड़ा।
हया- बेटी यह भी तो बेपर्दगी ही है। लोग अजीब-अजीब
बातें करते हैं। तुम्हारे अब्बू का बुरा हाल है।
अदीबा- अब क्या करूँ। नक़ाब लगाउँ तो दोस्त तरह-तरह की
बातें करते हैं। उतारूँ तो मुहल्ले वाले...
हया- तू दोस्तों की बात को सीरियसली क्यों लेती है?
अदीबा- तुम मुहल्ले वालों की बातों को सीरियसली क्यों
लेती हो?
हया- इसीलिए पढ़ाया कि तू माँ-बाप के मुँह लगे?
अदीबा- जब गूँगी-बहरी ही बनाए रखना था तो पढ़ाने की
क्या ज़रूरत थी?
हया- तो ठीक है... कल से तुम्हारा कॉलेज जाना बंद।
अदीबा- अब तो काफी देर हो चुकी है अम्मी... मैं बालिग़
हूँ। मुझे क्या करना है, जानती हूँ।
हया- अब्बू तुम्हारी जान ले लेंगे...
अदीबा- वो इतने बेवकूफ़ नहीं हैं... जेल जाना
पड़ेगा... सज़ा मिलेगी और बदनामी होगी सो अलग...
(हया ने सिर पीट लिया। सुबक पड़ी। अदीबा ने झुंझलाहट
में दुपट्टा फ़र्श पर फेंक दिया। कुछ देर बाद माँ की नज़रें उठीं। बेटी को देखा।
होठों पर मुस्कराहट की बिल्कुली बारीक सी रेखा थी एक... जिस पर आँसू ओस की तरह
चिपके थे।)

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