दिन तो दिन ही होते हैं
वही सात जो लौट-लौट आते हैं
कभी कोई दिन मनहूस नहीं होता
कैलेंडर पर दर्ज़ तारीख़ें
बदलती हैं
उन्हें तीन सौ पैंसठ दिन पूरे
करने होते हैं
दिन तो वही सात जो लौट-लौट आते
हैं
तारीखों से इसीलिए होड़ नहीं
लेते दिन
इसलिए तारीख़ों से अक्सर मेल
नहीं खाते दिन
तवारीख़ में तारीखें दर्ज़
होती हैं
इसलिए लोगों को रहती हैं याद
सभी को याद है अम्बेडकर का
निर्वाण
सभी को याद है बाबरी मस्जिद का
ध्वंस
सभी को याद रहेगा मंडेला का
देहावसान
लेकिन क्या सभी को याद हैं या
रहेंगे वो दिन
किस वार को हुआ था अंबेडकर का
परिनिर्वाण?

