दिन तो दिन ही होते हैं
वही सात जो लौट-लौट आते हैं
कभी कोई दिन मनहूस नहीं होता
कैलेंडर पर दर्ज़ तारीख़ें
बदलती हैं
उन्हें तीन सौ पैंसठ दिन पूरे
करने होते हैं
दिन तो वही सात जो लौट-लौट आते
हैं
तारीखों से इसीलिए होड़ नहीं
लेते दिन
इसलिए तारीख़ों से अक्सर मेल
नहीं खाते दिन
तवारीख़ में तारीखें दर्ज़
होती हैं
इसलिए लोगों को रहती हैं याद
सभी को याद है अम्बेडकर का
निर्वाण
सभी को याद है बाबरी मस्जिद का
ध्वंस
सभी को याद रहेगा मंडेला का
देहावसान
लेकिन क्या सभी को याद हैं या
रहेंगे वो दिन
किस वार को हुआ था अंबेडकर का
परिनिर्वाण?
किस वार को हुआ था बाबरी
मस्जिद का ध्वंस?
किस वार को हुआ था मंडेला का
देहावसान?
दिन तो वही सात हैं जो लौट-लौट
आते हैं
फिर भी ऐतिहासिक घटनाओं के दिन
खो जाते हैं!
कैलेंडर में दर्ज़ तारीख़ें
घटनाओं की सच्ची प्रतिनिधि
नहीं होतीं
घटनाओं के चश्मदीद तो होते हैं
दिन
वही सात दिन जो लौट-लौट आते
हैं
हम चूँकि नहीं कर सकते दिनों
का सामना
लिहाजा तारीख़ बन कैलेंडर में
समा जाते हैं
इसलिए हमारा स्यापा होता है
खोखला
इसलिए हमारा शौर्य होता है
मिथ्या दंभ
इसलिए किसी को याद करना हमारे
लिए
होती है महज औपचारिकताएँ
और हम खोखले लोग कैलेंडर में
समा जाते हैं
दिन मनहूस नहीं होता, मनहूस होती हैं तारीखें
दिन निर्लज्ज नहीं होता, निर्लज्ज होती हैं
तारीख़ें
इसीलिए तारीखों से दिनों का
मेल नहीं होता
दिनों की गवाही कहीं दर्ज़
नहीं होती
दिनों की तहरीर नहीं लिखी जाती
कहीं
सभी जगह दर्ज़ की जाती हैं
तारीख़ें
और इस तरह गड्डमड्ड हो जाती
हैं घटनाएँ
अंबेडकर का निर्वाण नहीं हुआ
था आज के दिन
बाबरी मस्जिद का ध्वंस भी आज
नहीं हुआ था
आज मंडेला का हुआ है देहावसान!
लेकिन
आप उनकी बरसी किसी शुक्रवार को
नहीं मनाएँगे
दिन तो सच्चे होते हैं लिहाजा आप
भूल जाएँगे
झूठी तारीखों पर अपनी संवेदना
बरसाएँगे
और किसी मायूस दिन डिस्कोथेक
में ठुमके लगाएँगे
और किसी दिन ख़ुद भी किसी
कैलेंडर की झूठी तारीख बन जाएँगे
और दीवार पर टँग जाएँगे
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