गौरीनाथ
के उपन्यास ‘दाग’ को पढ़ने के बाद मेरी यह धारणा
और मज़बूत हुई है कि अंतःप्रज्ञा साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण घटक है। इसके बिना
साहित्य-सृजन संभव नहीं है। अंतःप्रज्ञा का अभाव, साहित्य को एक ऐसे तालाब में तब्दील कर देता है, जिसमें पानी तो है लेकिन मछली
अर्थात जीवन नहीं है। और अगर हम जीवन को मछली मान लेते हैं तो पानी को उस समाज के
रूप में चिन्हित करना होगा, जिसमें
मनुष्य जन्म से मृत्यु तक रहता है। अर्थात साहित्य न सिर्फ समाज और मानव-जीवन के
जटिल अंतर्संबंधों से प्रभावित होता है, बल्कि
वह सार्थक हस्तक्षेप भी करता है। हस्तक्षेप की त्वरा कितनी है? या कि वह समाज पर कितना प्रभाव
छोड़ती है? यह
साहित्यकार की अंतःप्रज्ञा पर निर्भर करता है। जबकि अंतःप्रज्ञा की आधार-भूमि
संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदन है। बकौल मुक्तिबोध ‘जिस प्रकार हम संवेदनात्मक
ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदन द्वारा बचपन से ही बाह्य जीवन जगत को आत्मसात कर उसे
मनोवैज्ञानिक रूप देते आते हैं, उसी
तरह हम इस आत्मसात्कृत अर्थात मन द्वारा संशोधित, सम्पादित, संस्कारित, गठित-पुनर्गठित, जीवन-जगत को बाह्य रूप भी देते
हैं।’ स्पष्ट
है कि हम अपने संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदन की मदद से जीवन, समाज, संस्कार, धर्म और अन्यायन्य चीजों को
देखते-समझते और आत्मसात करते चलते हैं और उसे संशोधन-सम्पादन के बाद अभिव्यक्ति भी
देते हैं। बाहरी जीवन-जगत का आभ्यन्तरीकरण और आभ्यन्तरीकृत का बाह्यीकरण एक सनातन
मानव प्रक्रिया है। कला आत्मजगत के बाह्यीकरण का ही एक मार्ग है, जिसको अंतःप्रज्ञा से आलोक
मिलता है। ‘दाग’ का सर्जक इस कसौटी पर बिल्कुल
खरा उतरता है। वरना कोई कारण नहीं कि सामाजिक-सांस्कृतिक धरातल पर असंभव सी लगने
वाली यह कथा पाठक को सहज ही पूर्णतः विश्वसनीय प्रतीत होने लगती है। यह
विश्वसनीयता यदि संभव हुई है तो निश्चय ही इसका सीधा संबंध लेखक के ज्ञानात्मक
संवेदन, संवेदनात्मक
ज्ञान और उसकी अंतःप्रज्ञा का ही कमाल है।
उपन्यास का प्रारंभ ‘विजयादशमी’ की दोपहर से होता है। ‘पंडित गाम’ में अपने दरवाज़े पर बैठे पंडीजी यानी भवनाथ मिश्र सूर्य के कमज़ोर ताप से ऋतु-चक्र में आ रहे बदलाव की थाह तो पा लेते हैं, लेकिन अपने अतीत-गौरव से इतने मुग्ध हैं कि उन्हें सामाजिक बदलाव की अपरिहार्यता नज़र नहीं आती। यहाँ विजयादशमी महज मिथिला की संस्कृति के एक अंग-रूप में नहीं, वरन प्रतीक-रूप में हमारे सामने है। जैसे-जैसे उपन्यास अपने अंत की तरफ बढ़ता है, यह प्रतीक स्वयं को सार्थक सिद्ध करता चलता है। अतीत और वर्तमान के बीच का द्वंद्व भी और स्पष्ट होता जाता है। दस साल पहले जो कहानी शुरू हुई थी, वह कहानी मानो विजयादशमी के दिन ही अपनी पूर्णता को प्राप्त करने वाली हो! “...तँ की, एना टगि गेलनि दिन जे आब ओ उढ़री-उढ़राक स्वागत करथु ग’ अथवा बिल में नुकाथु? एहन समय आबि गेलनि जे उढ़री-उढ़राक मान-सम्मान हैत आ हुनक गुमान ढहतनि? अएँ, सुभद्रा आ नरेना आइ एते महान भ’ गेल?” भवनाथ मिश्र बदली परिस्थितियों में इन प्रश्नों से उलझ तो सकते हैं, लेकिन उत्तर नहीं ढूंढ सकते। उत्तर ढूंढ तो सकते थे, लेकिन चूँकि उन्होंने कथित मान-रक्षा की शुतुरमुर्गी-शैली अपना रखी है, लिहाजा उत्तर ढूँढना संभव नहीं है। उत्तर नहीं ढूंढ पाने की स्थिति में बिल्कुल असाहय से वे आढ़ अथवा ओट की तलाश में जुट जाते हैं ताकि अपने अभिमान और जाति की लाज किसी तरह बचा सकें- “पहिले बेर हुनका बुझेलनि जे एहू बुढ़ियाक खगता भ’ सकै छनि। आइ एत’ रहितनि बुढ़िया तँ कते रच्छ होइतनि? कोनो-ने-कोनो तरहें आढ़ जरूरे होयतनि। जेना शिखण्डीक आढ़ भेटल छलै अर्जुन कैं!... नइँ, ठीक तेहने आढ़ नइँ चाही हुनका। मुदा किछु-किछु तेहने सन ढूहक जरुरति छनि- जकरा पाछाँ ओ अपन अभिमान कें चूर-चूर होयबा सँ बचा सकथि, जकरा पाँछा ओ अपना जातिक लाज नुका सकथि! ...बचल-खुचल लाज कें सबहक सोझाँ नग्न भ’ घिनाब’ कोना द’ सकै छथि? आखिर पाँजि-प्रतिष्ठावला लोक छथि पंडीजी।” और इस तरह वे अपने अभिमान की रक्षा का जो अंतिम उपाय ढूँढते हैं, वह विलक्षण है। “बिलैया लगा भीतर सँ केबाड़ बन्द कयलनि ओ। आब उढ़री-उढ़रा अबौ आकि यमराज, पंडीजीक केबाड़ नइँ खुजतनि। बस ई केबाड़े टा बचा सकै छनि हुनका!” किवाड़ की ओट में अपने अभिमान को छुपाने का हास्यास्पद प्रयास करते ये वही भवनाथ मिश्र हैं, जो कभी ताल ठोंक-कर कहा करते थे कि “...हमर धीयापुता आकि घरक केओ जँ कोनो दिन एना करत, तँ तुरत चाँम नइँ घीचलहुँ तँ हम अपन जनऊ तोड़ि गूह पर फेकि देब, पाग पर मूति देब आ अपन गरदनि अपने हाथें काली माइक पीड़ी लग राखल कत्ता सँ काटि बलि चढ़ा लेब! ...जँ...जँ से नइँ कयलहुँ तँ एक ब्राह्मणक बूँद नइँ! ...यदुवर मिश्रक पाँजिक टेक नइँ!” लेकिन अपनी इस टेक को क़ायम नहीं रख सके। बेटी के भागने के बाद प्रतिशोध में पूरी दलित बस्ती को जलाने और नारायण के परिवार और उसकी जाति की स्त्रियों के साथ बलात्कार तक की असफल घृणास्पद योजनाओं में अपनी ऊर्जा और सम्पत्ति फूँकते रहे, लेकिन सफल नहीं हो सके। और आज जबकि सुभद्रा और नारायण न सिर्फ दस साल बाद गाँव लौटे हैं, बल्कि पंडीजी का पुत्र ही उन्हें घर आने का न्यौता देकर लौटा है। पंडीजी ख़ुद को मुक़ाबले से बाहर पा रहे हैं और असहाय स्थिति में ख़ुद को अँधेरी कोठरी में दोपहर से ही क़ैद कर लिया है। उनमें वर्तमान से सामना का साहस नहीं है, लिहाजा वे कोठरी में ही अपने अतीत गौरव के साथ क़ैद हैं और वहीं पेशाब भी कर रहे हैं। यह बिल्कुल ताज़ा रूपक है। ‘सुभद्रा इज माइ हिरोइन’ कहने पर माधुरी को आग से दागने वाला समाज, मुँह-झरकी माधुरी को ब्याहना नहीं चाहता। लेकिन उसे यह भी स्वीकार नहीं है कि कोई सुभद्रा समाज की मर्यादा का उल्लंघन करे। अपनी मर्जी का जीवन चुने। मर्यादा की आड़ में स्त्री को पालतू पशु की तरह अपनी ही जाति के बाड़े में क़ैद रखने को उद्धत समाज का यही दोहरा चरित्र है।
उपन्यास का प्रारंभ ‘विजयादशमी’ की दोपहर से होता है। ‘पंडित गाम’ में अपने दरवाज़े पर बैठे पंडीजी यानी भवनाथ मिश्र सूर्य के कमज़ोर ताप से ऋतु-चक्र में आ रहे बदलाव की थाह तो पा लेते हैं, लेकिन अपने अतीत-गौरव से इतने मुग्ध हैं कि उन्हें सामाजिक बदलाव की अपरिहार्यता नज़र नहीं आती। यहाँ विजयादशमी महज मिथिला की संस्कृति के एक अंग-रूप में नहीं, वरन प्रतीक-रूप में हमारे सामने है। जैसे-जैसे उपन्यास अपने अंत की तरफ बढ़ता है, यह प्रतीक स्वयं को सार्थक सिद्ध करता चलता है। अतीत और वर्तमान के बीच का द्वंद्व भी और स्पष्ट होता जाता है। दस साल पहले जो कहानी शुरू हुई थी, वह कहानी मानो विजयादशमी के दिन ही अपनी पूर्णता को प्राप्त करने वाली हो! “...तँ की, एना टगि गेलनि दिन जे आब ओ उढ़री-उढ़राक स्वागत करथु ग’ अथवा बिल में नुकाथु? एहन समय आबि गेलनि जे उढ़री-उढ़राक मान-सम्मान हैत आ हुनक गुमान ढहतनि? अएँ, सुभद्रा आ नरेना आइ एते महान भ’ गेल?” भवनाथ मिश्र बदली परिस्थितियों में इन प्रश्नों से उलझ तो सकते हैं, लेकिन उत्तर नहीं ढूंढ सकते। उत्तर ढूंढ तो सकते थे, लेकिन चूँकि उन्होंने कथित मान-रक्षा की शुतुरमुर्गी-शैली अपना रखी है, लिहाजा उत्तर ढूँढना संभव नहीं है। उत्तर नहीं ढूंढ पाने की स्थिति में बिल्कुल असाहय से वे आढ़ अथवा ओट की तलाश में जुट जाते हैं ताकि अपने अभिमान और जाति की लाज किसी तरह बचा सकें- “पहिले बेर हुनका बुझेलनि जे एहू बुढ़ियाक खगता भ’ सकै छनि। आइ एत’ रहितनि बुढ़िया तँ कते रच्छ होइतनि? कोनो-ने-कोनो तरहें आढ़ जरूरे होयतनि। जेना शिखण्डीक आढ़ भेटल छलै अर्जुन कैं!... नइँ, ठीक तेहने आढ़ नइँ चाही हुनका। मुदा किछु-किछु तेहने सन ढूहक जरुरति छनि- जकरा पाछाँ ओ अपन अभिमान कें चूर-चूर होयबा सँ बचा सकथि, जकरा पाँछा ओ अपना जातिक लाज नुका सकथि! ...बचल-खुचल लाज कें सबहक सोझाँ नग्न भ’ घिनाब’ कोना द’ सकै छथि? आखिर पाँजि-प्रतिष्ठावला लोक छथि पंडीजी।” और इस तरह वे अपने अभिमान की रक्षा का जो अंतिम उपाय ढूँढते हैं, वह विलक्षण है। “बिलैया लगा भीतर सँ केबाड़ बन्द कयलनि ओ। आब उढ़री-उढ़रा अबौ आकि यमराज, पंडीजीक केबाड़ नइँ खुजतनि। बस ई केबाड़े टा बचा सकै छनि हुनका!” किवाड़ की ओट में अपने अभिमान को छुपाने का हास्यास्पद प्रयास करते ये वही भवनाथ मिश्र हैं, जो कभी ताल ठोंक-कर कहा करते थे कि “...हमर धीयापुता आकि घरक केओ जँ कोनो दिन एना करत, तँ तुरत चाँम नइँ घीचलहुँ तँ हम अपन जनऊ तोड़ि गूह पर फेकि देब, पाग पर मूति देब आ अपन गरदनि अपने हाथें काली माइक पीड़ी लग राखल कत्ता सँ काटि बलि चढ़ा लेब! ...जँ...जँ से नइँ कयलहुँ तँ एक ब्राह्मणक बूँद नइँ! ...यदुवर मिश्रक पाँजिक टेक नइँ!” लेकिन अपनी इस टेक को क़ायम नहीं रख सके। बेटी के भागने के बाद प्रतिशोध में पूरी दलित बस्ती को जलाने और नारायण के परिवार और उसकी जाति की स्त्रियों के साथ बलात्कार तक की असफल घृणास्पद योजनाओं में अपनी ऊर्जा और सम्पत्ति फूँकते रहे, लेकिन सफल नहीं हो सके। और आज जबकि सुभद्रा और नारायण न सिर्फ दस साल बाद गाँव लौटे हैं, बल्कि पंडीजी का पुत्र ही उन्हें घर आने का न्यौता देकर लौटा है। पंडीजी ख़ुद को मुक़ाबले से बाहर पा रहे हैं और असहाय स्थिति में ख़ुद को अँधेरी कोठरी में दोपहर से ही क़ैद कर लिया है। उनमें वर्तमान से सामना का साहस नहीं है, लिहाजा वे कोठरी में ही अपने अतीत गौरव के साथ क़ैद हैं और वहीं पेशाब भी कर रहे हैं। यह बिल्कुल ताज़ा रूपक है। ‘सुभद्रा इज माइ हिरोइन’ कहने पर माधुरी को आग से दागने वाला समाज, मुँह-झरकी माधुरी को ब्याहना नहीं चाहता। लेकिन उसे यह भी स्वीकार नहीं है कि कोई सुभद्रा समाज की मर्यादा का उल्लंघन करे। अपनी मर्जी का जीवन चुने। मर्यादा की आड़ में स्त्री को पालतू पशु की तरह अपनी ही जाति के बाड़े में क़ैद रखने को उद्धत समाज का यही दोहरा चरित्र है।
भारतीय
संदर्भ में आज भी यह एक तथ्य है कि सामंतवाद और जातिवाद की गलीज़ संस्कृति
विद्यमान है और इसके दूषित विचारों और कृत्यों की दुर्गंध सामाजिक वातावरण को
लगातार और-और दूषित करती रही हैं। वैसे सच तो ये भी है कि परिवर्तनकामी चेतना की
सुगंधी लगातार फूटती रही है, जो
इस दुर्गंध की त्वरा को कम अथवा धूमिल करने में सफल भी रही है एवं समरस-समाज की
स्थापना का स्वप्न सदा इसी से सम्बल पाता रहा है। समतामूलक समाज का स्वप्न ही वह
जीवनी-शक्ति है, जिसने
मनुष्य को विपरीत परिस्थितियों में भी संघर्ष की शक्ति दी है और दे भी रही है। हाँ, इसमें दो मत नहीं कि हमारा
समाज न सिर्फ जड़ और अमानवीय परंपराओं के साथ ही मानवीय संवेदना और स्वतंत्रता की
भावनाओं का मिश्रण रहा है, बल्कि
दोनों के बीच लगातार रस्साकशी भी चलती रही है। सुभद्रा-नारायण बनाम पंडित गाम की
कथा भी इसी का उदाहरण है। कोई ब्राह्मण कन्या किसी दलित युवक के साथ कैसे प्रेम कर
सकती है? यह
तो अनहोनी है! यही
वजह है कि पूरा पंडित गाम एकजुट होकर सुभद्रा और नारायण की हत्या के साथ ही दलित
बस्ती को उजाड़ने और दलित कन्याओं के साथ सामूहिक बलात्कार की साजिशों में व्यस्त
हो जाता है। साथ ही मर्यादा का तकाज़ा ये भी है कि बात ज्यादा न फैले। तभी
प्रोफेसर साहब अपनी सज्जनता की दुहाई देते हुए भी एक ऐसे दबंग सामंती व्यक्तित्व
के रूप में सामने आते हैं, जो सभ्यता की आड़ लेकर भी अपनी पाशविक मनोवृत्ति को
छुपा पाने में असफल रहता है। “अरे, हमारे गाँव की लड़की तुम लोगों
की तरह बिलायती चाल नहीं न चलती है कि छिनरपन करेगी। तुम औरत हो इसीलिए छोड़ दिया, वरना कोई और ढौहरी के इस तरह
गाली दिया होता तो खून पी जाते। हम लोग सीधे-सरल हैं, सज्जन हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि कोई
गाली दे, कीचड़
उछाले तब भी चुप रहें।” भई
वाह! दाद देनी होगी प्रोफेसर साहब के सज्जनता की! वैसे व्यंजना के ऐसे निर्दोष
प्रयोगों से पूरा उपन्यास आच्छादित है और इसके लिए निश्चय ही जिस लेखकीय सौष्ठव की
आवश्यकता थी, वह
गौरीनाथ में नैसर्गिक रूप से विद्यमान है। बुद्धिजीवी वर्ग की कथनी-करनी के फ़र्क़
को भी इस उपन्यास में पूरी निरपेक्षता के साथ उजागर करने की कोशिश की गई है। महिला
पत्रकार के साथ बदतमीज़ी और दलितों के ख़िलाफ़ आपराधिक षडयंत्र के 'मास्टरमाइंड'
प्रोफेसर साहब टीवी के लिए दिए गए अपने इंटरव्यू में जो कहते हैं, वह क़ाबिले-ग़ौर
है- “...हमारे
पूर्वजों की गलती का बदला लेने के खयाल से भी अगर कोई दलित मेरे सिर पर मूत दे, तो
मैं ठंडे पानी से नहाकर भूल जाऊँगा।”
'मीडिया टर्म' का इस्तेमाल करूँ तो व्यक्ति के 'ऑन द रिकॉर्ड' और 'ऑफ द रिकॉर्ड'
व्यक्तित्व के बीच का जो द्वैत है, वह यही है।
गौरीनाथ
की वैचारिक परिपक्वता और सामाजिक दृष्टि उनकी कहानियों में भी साफ नज़र आती है।
प्रत्येक कहानी परंपरागत शोषण-आधारित सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था के रेशे-रेशे को
उधेड़ती है, सच को
बेपर्दा करती है और जड़ परंपराओं के ख़िलाफ़ नई पीढ़ी को यलग़ार के लिए उकसाती भी
है। नेम-धरम और पाँजिप्रतिष्ठा की कलई परत-दर-परत उधेड़ने में कहीं कोई झिझक नहीं,
बल्कि इस मामले में वे ‘यात्री’ यानी बाबा नागार्जुन की परंपरा
को आगे बढ़ाते प्रतीत होते हैं। “धुर
बुड़ि, मिथिला में नपुंसक सँ ल’ क’ कुकुर-बिलाड़ि आकि मूस धरि एक
टा स्त्री पर नइँ खेपैत अछि। हमरा ठाम तँ चालीस-चालीस टा बियाह आ नाति-पोता धरि
कें बरियाती में रखबाक गौरवशाली इतिहास अछि। अहाँ कें प्रायः बुझल नइँ अछि हमरा
ठामक पाग, पाँजि आ पंडिताइक इतिहास आ परम्परा...।” व्यंग्य की इस तीक्ष्ण धार से पंडित भवनाथ मिश्र
अथवा प्रोफेसर साहब जैसे चरित्र तिलमिलाएँ न तो भला क्या करें!
‘दाग’ को पढ़ते वक़्त बार-बार यू. आर.
अनंतमूर्ति के उपन्यास ‘संस्कार’ की याद आती है। हालाँकि दाग और
संस्कार का कथाक्रम ही नहीं, बल्कि
कथाभूमि भी बिल्कुल भिन्न है। सामंती समाज में अपनी सर्वोच्चता और अक्षुण्णता को
बरकरार रखने वाली ब्राह्मण जाति को नवजागरण-काल से ही जो चुनौती मिलती रही है, उसकी त्वरा अब तीव्रतर हो उठी
है। आज़ादी के बाद, प्रारंभ
के कई दशकों तक राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्र में अपना वर्चस्व क़ायम रखने के
बावजूद इस जाति के बहुसंख्य ने बदलाव को तरजीह नहीं दी। उन्हीं पुराने जंग-आलूद
अप्रासंगिक हथियारों के बल पर अपनी सर्वोच्चता के खोखले दंभ को बरकरार रखने की
मिथ्या चेष्टा की। इसकी ख़ातिर तमाम तरह के कुकर्मों और पापाचार को ढोते जाने में
अपनी ऊर्जा नष्ट करती रही। धर्म की आड़ में शोषण के पोषण की प्रवृत्ति कमोबेश आज
भी विद्यमान है। शायद यही वजह है कि न सिर्फ हाशिये के समाज के प्रति, बल्कि ख़ुद अपनी स्त्रियों के
प्रति अमानवीय दृष्टिकोण के कारण भी यह जाति कुख्यात रही है। ‘संस्कार’ में नारणप्पा ने ब्राह्मण समाज
के इसी खोखलेपन को चुनौती दी थी और नेम-धर्म के तमाम काग़ज़ी तोरणद्वारों को
ध्वस्त कर दिया था। दाग में यही दायित्व सुभद्रा ने अपने कंधे पर लिया है। सुभद्रा
का नारायण राम के साथ गमन (चूँकि कवि चौताली ने घटना के दो दिन बाद ही अपनी भूल
सुधार ली थी और उसके लिए सुभद्रा से माफी भी मांग ली थी, लिहाजा नैतिकता का दबाव है कि
हम इसे भागना-भगाना या हरण जैसा लक़ब नहीं दे सकते।) का कारण प्रेम-संबंध नहीं है।
हाँ, प्रेम
भी एक कारक है, लेकिन
उतना अहम नहीं, जितना
कि मनुष्य बने रहने की आत्महंता आकांक्षा। जैसा कि सुभद्रा स्वयं स्वीकार करती है-
“साफ-साफ ई बुझहीक जे हम
अपन कब्र अपने खुन’ चाहै
छी, नारायण!
हमरा दोसराक आदेश पर जियब कि मरब किछु पसिन नइँ। हमरा नइँ कोनो जातिक श्रेष्ठता
चाही, नइँ
कोनो जातिक नीचता— हम
मात्र मनुक्ख भ’, अ-जाति
भ’ अपना बल पर किछुओ कर’ चाहै छी!” सुभद्रा का लक्ष्य स्पष्ट है।
दलित युवक के साथ प्रेम-संबंध और कोर्ट मैरिज का अर्थ वह समझती है। पकड़े जाने पर
जो कुछ होना है, वह
उससे भी अनभिज्ञ नहीं है। लेकिन वह मनुष्य बनने और मनुष्य होने के नाते मिले जीवन
के प्राकृतिक अधिकारों को सामाजिक भय के कारण खोना नहीं चाहती, वह जीना चाहती है।
वह माता-पिता द्वारा परंपरागत तरीके से किसी डॉक्टर या इंजीनियर की पत्नी बन, एक शो-पीस के रूप में किसी
बंगले की शोभा नहीं बनना चाहती। वह अपना स्वतंत्र अस्तित्व और उसका सहज विकास
चाहती है। यानी कि सुभद्रा और नारायण सहजीवन की उम्मीद लेकर घर छोड़ते हैं। यहाँ
प्रेम से अधिक स्व-अस्तित्व की रक्षा का लोभ है। यहाँ प्रेम की निरी भावुकता नहीं
है। मनुष्यता को बचाए रखने का संघर्ष है। सुभद्रा की दृष्टि में मनुष्य का बचे
रहना पहली ज़रूरत है। “प्रेम
किए ने किछु रहतै, मुदा
पहिने मनुक्ख बचतै तखन ने प्रेम। पहिने मनुक्ख कें मनुक्ख रह’ देबाक आजादी आ सुविधा भेटतै, तखन ने प्रेमक गप्प हेतै?” यानी सुभद्रा का यह गमन किसी
प्रेम-प्रसंग से अभिप्रेरित नहीं था। बल्कि मनुष्यता की दिशा में उठाया गया कदम
था। इस बिंदु पर यह उपन्यास दलित एवं स्त्री स्वातंत्र्य की बिल्कुल नई और निराली विमर्श-भूमि
तैयार करता है। यहाँ जाति-विशेष के प्रति वैमनष्य या बदले की भावना नहीं है। यहाँ
आधुनिक स्त्री-विमर्श की आड़ में ‘जेंडर-डिस्कोर्स’ की जगह ‘देह-विमर्श’ जैसा बचकानापन भी नहीं है।
यहाँ स्त्री का मानुषी के रूप में जीवन के अधिकार का संघर्ष है। यहाँ वासुधैव
कुटुम्बकम और सत्यम, शिवम सुन्दरम का सिद्धांत सामाजिक-राजनीतिक धरातल पर उतरता
नज़र आता है।
जीवन
के सभी अंगों को समेटने के लिए किसी उपन्यास में जिस कथात्मक बिखराव की आवश्यकता
होती है, वह ‘दाग’ में है। यही वजह है कि उपन्यास
पढ़ते वक़्त न सिर्फ हम ब्राह्मण जाति की प्रवंचनाओं से परिचित होते हैं, बल्कि
उसी समाज में स्त्री जीवन की दारुणता से भी दोचार होते हैं। और नेम-धरम की सीमा भी
समझ में आती है। दलित-समाज के बदलते ताने-बाने से साक्षात्कार करने के साथ ही नई
पीढ़ी की वैचारिक परिपक्वता से हमें आश्वस्ति भी मिलती है। कहानी में कहीं कोई
आवेश नहीं है, है तो सिर्फ आवेग और बेहतर भविष्य का स्वप्न। आवेश तो क्षय की
निशानी है और इसका उदाहरण पंडित भवनाथ मिश्र से बेहतर कौन हो सकता है! निस्संदेह लेखक अपनी
विश्वसनीयता को न सिर्फ अक्षुण्ण रखने में कामयाब रहा है, बल्कि उसने यह भी सिद्ध
किया है कि ग्रामीण समाज की सामासिक संस्कृति पर उसकी मज़बूत पकड़ है और इसीलिए वह
जो कुछ भी लिख रहा है, वह असंदिग्ध है।
बदलाव
की बयार भले ही मंथर हो, लेकिन उसकी गति में व्यवधान संभव नहीं है। यह उस नदी की
तरह होता है जो तमाम बाधाओं को धता बताते हुए, अपनी राह बढ़ती रहती है। सुभद्रा-कांड
के बाद ब्राह्मण जाति के मान-अपमान के मसले पर एकजुट हुआ पंडित-समाज धीरे-धीरे
अपनी दिनचर्या में लौट गया। प्रोफेसर साहेब और मुखियाजी भी इसकी आड़ में पंडीजी से
जितना कुछ ऐंठ सकते थे, ऐंठ चुकने के बाद किनारे हो लिए। हाँ, पंडीजी अभी भी उस
दुःस्वप्न से मुक्त नहीं हो सके थे। इस बीच सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर बहुत बड़ा
बदलाव आ चुका था। गाँव में ‘गतिशील
युवा मोर्चा’ नाम
से एक संगठन की नींव भी पड़ चुकी थी, जो जाति-पाँति और अमानवीय भेदभाव के खिलाफ़
शनैः-शनैः जनमत तैयार कर रहा था। कन्हैया ने जाति-अभिमान को बहुत पहले ही अँगूठा
दिखा दिया था और दिल्ली जाकर सुभद्रा और नारायण के साथ मिल गया था। रमैया के मन
में बहन के प्रति कोई द्वेष शेष नहीं रहा, माँ और परिवार के दूसरे तमाम सदस्य
बदलाव से सामंजस्य स्थापित करने में सफल रहे, लेकिन पीछे कोई छूट गया तो वह थे-
पंजिप्रतिष्ठा वाले पंडित भवनाथ मिश्र। इसका बड़ा ही मनौवैज्ञानिक चित्रण गौरीनाथ
ने किया है- “खेलक
नरेना, तीनू घरेना!
...तीनू घरेना नइँ, एक्के घरेना कें खयलें रे नरेना!... एक्को घरेना नइँ, एसगरे हमरा, मात्र पंडित
भवनाथ मिश्र कें खयलें रे नरेना!
...तोहर खायल, नोछड़ल, ऐंठ, घबाह अपन मुँह हम ककरो कोना देखायब रे नरेना! ...रे दुष्ट, राक्षस, कसाइ! तोरा पर बज्रो नइँ खसलौ रे!”
अंतर्जातीय
प्रेम-संबंध अथवा विवाह समाज की नई घटना नहीं है। मामला शांत पड़ने के बाद प्रेमी-युगल
का घर लौटना भी सामान्य बात है। हालांकि यह सभी मामलों में सटीक नहीं बैठता।
ख़ासतौर से तब, जब एक दबंग जाति के घर की कन्या किसी दलित युवक के साथ घर से भागी
हो तो उसकी वापसी करीब-करीब असंभव ही है। लेकिन जो असंभव को संभाव्य की श्रेणी में
न ला सके, वह साहित्य कैसा!
यही गौरीनाथ की सफलता है। यही ‘दाग’ की सफलता है। सुभद्रा और
नारायण न सिर्फ गाँव लौटते हैं, बल्कि सार्वजनिक मंच पर सम्मानित भी किए जाते हैं।
जाति और मर्यादा की बाधा तोड़ रमैया पेड़ की ओट से ही सही, बहन और बहनोई को देख
गदगद तो होता ही है। कन्हैया सामाजिक मर्यादा को ठेंगा दिखाते हुए अपनी बहन के घर
तो जाता है। कोई धनेसर तो है जो मुँहझरकी माधुरी को स-सम्मान अपनी सहगामिनी बनाता
है। ऐसे साजगार माहौल को कलुषित करने के लिए प्रोफेसर या मुखिया जैसा कोई नफ़रत का
सौदागर अगर किसी झोंपड़ी में आग लगा ही दे। किसी अंकुर को झुलसा भी दे तो उम्मीद
बची ही रहेगी। सुभद्रा और नारायण के समेकित प्रयास का प्रतिफल- अंकुर झुलसा ज़रूर
है, लेकिन वह नई रोशनी लेकर आया है। ये नई पौध मनुष्यता की रक्षा ज़रूर करेगी।
मुझे पूरा विश्वास है कि अंकुर जब बड़ा होगा, तब तक स्थितियाँ और ख़ुशगवार होंगी
और वह आईने में जब अपने जिस्म के दाग देखेगा तो मुस्कराता हुआ यही बुदबुदाएगा- दाग
अच्छे हैं!


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