हम जब
भोजन बनाते हैं तो ध्यान उसके स्वाद पर ही होता है। चिकित्सक भले पौष्टिकता का
आग्रह पालें। सामान्य व्यक्ति के लिए तो स्वाद भोजन की सबसे बड़ी विशेषता है। जिन
लोगों को स्वाद में दिलचस्पी नहीं होती, वे वैसे लोग होते हैं जिन्हें किसी रोग
अथवा व्याधी ने जकड़ रखा हो!
उनके लिए सेहत अधिक अहम होती है। हालांकि ‘स्वाद’ के प्रति आकर्षण तो वहाँ भी
बना ही रहता है। भय भले हाथ पर अंकुश लगा दें, नेत्र और जीभ ललचते ही रहते हैं।
मान लीजिए आप किसी के मेहमान हुए!
मेज़बान के घर ‘शाही
पनीर’ बना।
उसके रंग-सुगंध से ही आपकी क्षुधा का ‘ग्राफ’ ऊपर चढ़ने लगा। लेकिन आपने पहला
कौर मुँह में डाला और निगलने की बजाय उगल दिया। कारण यह कि रसोइया भोजन बनाते समय नमक
डालना भूल गया था। नमक की अनुपस्थिति से ‘शाही
पनीर’ के
रंग अथवा गंध पर तो फ़र्क़ नहीं पड़ा, लेकिन स्वाद बिगड़ गया। आपके सामने पड़ी
प्लेट में वह अब भी उतना ही मनोहारी दिख रहा है। उसकी गंध जो आपके नथूनों तक पहुँच
रही है, उसके जादू से अब भी आपके मुँह में पानी भरा है। लेकिन दूसरा कौर मुँह तक
लाने की इच्छा नहीं हो रही। क्या ऐसी ही स्थिति तब भी नहीं आती, जब सब्ज़ी में नमक
की मात्रा सामान्य से अधिक हो?
व्यंग्य के नाम पर लिखे जा रहे अकूत साहित्य पर दृष्टिपात करें तो बहुत हद तक यही
स्थिति नज़र आती है। वाक्य-वक्रता के बल पर व्यंग्य तो दूर हास्य भी उत्पन्न नहीं
किया जा सकता। फिर भी किया जा रहा है। मंचाश्रयी कवियों का काम तो फिर भी
शारीरिक-सांकेतिक पराक्रमों से चल सकता है, किन्तु लेखन के मामले में ‘भाव’ के बिना साहित्य के भवसागर को
पार करना, असम्भव है। यदि साहित्य आस्वाद का विषय है तो पढ़ते समय पाठक को स्वाद तो
मिलना ही चाहिए। लेकिन कुछ-एक को छोड़ दें तो व्यंग्य की नैया के ज़्यादातर
खेवनहार वाक्य-वक्रता की पतवार ही थामे नज़र आते हैं और व्यंग्य की नैया है कि न
इस किनारे आती है, न उस किनारे जाती है, बस शब्दों के बीच भंवर में फंसी चकरघिन्नी
की तरह बस गोल-गोल घूमती जाती है। पाठक को कुछ वाक्यों के बाद ही चक्कर आने शुरू
होते हैं और फिर मितली से उल्टी तक की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है। इस प्रकार पाठक
को आस्वाद के रूप में न तो हास्य की अनुभूति हो पाती है और न ही व्यंग्य का बोध।
ऐसी परिस्थिति में शब्दों की मर्यादा खंडित होती है और शिल्पी की छवि भी।
व्यंग्य
स्वतंत्र विधा है या नहीं?
यह प्रश्न अब भी अनुत्तरित है। व्यंग्य को विधा मानने वालों के अपने तर्क हैं, न
मानने वालों के अपने। किन्तु इस बात पर आम-सहमति है कि साहित्य का, विशेष रूप से
गद्य साहित्य का मूल स्वर व्यंग्य है। हरिशंकर परसाई के शब्दों में यह ऐसी ‘स्प्रिट’ है, जो हर विधा में आ सकती है।
मेरे लिए गद्य अथवा पद्य में व्यंग्य ‘नमक’ की हैसियत रखता है। व्यंग्य न
हो तो साहित्य का स्वाद बिगड़ता है। व्यंग्य की मात्रा अत्यधिक हो तो भी ज़ायक़े
पर बुरा असर पड़ता है। कबीर का दोहा यहाँ बिल्कुल फिट बैठता है- “अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।/अति का भला
न बरसना, अति
की भली न धूप।।”
लेकिन बच्चे के हाथ में झुनझुना थमा दें तो वह सिर्फ बजाता नहीं, ज़ोर-ज़ोर से
पटकता भी है। थोड़ा बलिष्ठ हो तो तोड़ भी देता है। ऐसा वह जान-बूझकर नहीं करता।
बल्कि बजाने और पटकने से उत्पन्न होने वाली ध्वनि के बीच भेद न कर पाने की अक्षमता
इसका कारण होती है। उसके लिए मात्र ध्वनि महत्वपूर्ण है, ध्वनि की प्रकृति नहीं। व्यंग्य
के उत्साही लेखकों की प्रवृत्ति भी कुछ ऐसी ही होती है। ख़ामियाजा बेचारे व्यंग्य
को भुगतना पड़ता है। व्यंग्य की जो दुर्गति हो रही है, वही हश्र हास्य का भी हो
रहा है। कुछ शब्द-वीर ऐसे हैं, जिन्होंने हास्य को व्यंग्य का पर्यायवाची ही मान
रखा है। कुछ की दृष्टि में बिना हास्य के व्यंग्य की कल्पना ही बेमानी है।
निस्संदेह, ये सभी दृष्टिकोण अथवा चेष्टाएँ अतिवादी हैं। व्यंग्य का हास्य के बिना
भी काम चल सकता है और हास्य उत्पन्न करने के लिए हमेशा व्यंग्य आवश्यक नहीं होता। फिर
भी, यदि दोनों का सामंजस्य हो तो सोने पे सुहागा वाली स्थिति बनती है। ‘शिवशम्भू के चिट्ठे’, ‘स्वर्ग में विचारसभा का अधिवेशन’ आदि इसके बेहतर उदाहरण हैं।
यहाँ हास्य और व्यंग्य दोनों का सहज संयोग है। बकौल श्रीलाल शुक्ल, “हास्य व्यंग्य का विरोधी नहीं
है। वह व्यंग्य को अधिक मनोरंजक और स्वीकार्य बनाता है, किन्तु हास्य जिन
परिस्थितियों में उत्पन्न होता है उसका क्षेत्र बहुत विस्तृत है। प्राचीन
काव्यशास्त्र के अनुसार श्रृंगार और शांत रस से भी हास्य की सृष्टि हो सकती है।
मगर व्यंग्य का कार्य मुख्यतः आलोचनात्मक है, जो चारों ओर से जीवन का बारीकी से
निरीक्षण करके उसकी ख़ामियों को उजागर करने में निहित है। व्यंग्य वस्तुतः एक
सुशिक्षित मस्तिष्क की देन है और पाठक के स्तर पर सुशिक्षित प्रतिक्रिया की माँग करता
है। वह पाठक को गुदगुदाने के लिए नहीं, बल्कि किसी विसंगति या विडंबना के उद्घाटन
से उसके सम्पूर्ण संस्कारों को विचलित करने की प्रक्रिया है।”(मेरे साक्षात्कार, पृ.54)
गोपाल प्रसाद व्यास के गद्य को पढ़ते वक़्त बार-बार इस कथन की तस्दीक़ होती चलती है
कि ‘व्यंग्य
वस्तुतः सुशिक्षित मस्तिष्क की देन है।’
व्यंग्य के लिए दृष्टि और जीवन का सूक्ष्म निरीक्षण आवश्यक है क्योंकि इनका अभाव
व्यंग्य की धार को कुंद करता है। सच तो यह है कि व्यंग्य के साथ बोध एवं अनुभव,
दोनों ही नाभिनालबद्ध हैं। व्यंग्य वस्तुतः वस्तु तथा अलंकार का बोध होता है और रस
का अनुभव। जब लेखक इस भेद को जान-समझ कर लिखता है तो व्यंग्य की छटा अपने प्रांजल
रूप में दृष्टिगत होती है और पाठक सुरुचिपूर्ण ढंग से आस्वाद ले पाता है।
अतः मूल
मसला ‘विषय
चयन की समझ’ का
है। यह विवेक तो होना ही चाहिए कि कौन सा विषय अथवा घटना व्यंग्य-योग्य है और कौन
सी हास्य-योग्य। या फिर कौन सा विषय अथवा घटना हास्य या व्यंग्य के दायरे में नहीं
आती। हरिशंकर परसाई के शब्दों में कहूँ तो “हँसना
स्वास्थ्य का लक्षण है, पर हर बात पर हँसना गैर-जिम्मेदारी और मूर्खता है। जीवन
में हर बात पर हँसी नहीं आती। किसी बात पर करुणा पैदा होती है, किसी से घृणा होती
है, किसी से क्रोध होता है। इसलिए केवल विनोद और हास्य का लहज़ा गैर-जिम्मेदारी का
काम है। कोई हास्य-लेखक पीटने वाले पर भी हँसे कि कैसे मज़े में पीट रहा है और
पिटने वाले पर भी हँसे कि कैसे मज़े में पिट रहा है, तो ऐसे लेखक को आप क्या
कहेंगे?
जानवर कहेंगे न? मगर
जानवर हँसते नहीं हैं। मेरा मतलब है, यह समझ चाहिए कि क्या हँसने लायक़ है क्या
रोने लायक़ है, अर्थात सहानुभूति तय होनी चाहिए। इसके लिए लेखक को ठिठोली और
छिछोरापन छोड़ करके सामाजिक जीवन में अपने को शामिल करना होता है, उसकी सम्बद्धता
होनी चाहिए, यहीं से मात्र हास्य-विनोद और सामाजिक चेतना सम्पन्न व्यंग्य अलग हो
जाता है।”(परसाई
रचनावली, भाग-2, पृ.411) इस विवेक के बिना न तो हास्य और न ही व्यंग्य के साथ
न्याय सम्भव है। जब हम परसाई और श्रीलाल शुक्ल के उपरोक्त कथनों को आत्मसात् करने
का प्रयास करते हैं, तभी यह बात समझ में आ पाती है कि हिन्दी साहित्य में व्यंग्य
के जो हस्ताक्षर हैं, वे आख़िर क्यों स्वयं को व्यंग्य-लेखक की बजाय ‘व्यंग्य-विनोद’ लेखक कहलाना अधिक पसंद करते
हैं। गोपाल प्रसाद व्यास हों, हरिशंकर परसाई हों या शरद जोशी, इनमें से कोई भी
स्वयं को विशुद्ध व्यंग्य-लेखक की श्रेणी में नहीं रखता।
सच्चा
हास्य और व्यंग्य, दोनों ही वेदना से जन्म लेते हैं। भाषाई उच्छृंखलता अथवा
वाक्य-वक्रता से नहीं। संवेदनशील और करुण-हृदय के असंतोष एवं आक्रोश की चरम-परिणति
व्यंग्य में होती है। तल्ख़ अनुभवों की कोख से व्यंग्य का जन्म होता है। व्यंग्य करने
की अहर्त्ता केवल वही रखता है जो न सिर्फ सामाजिक रूप से सजग हो बल्कि संस्कार और चारित्रिक
रूप से भी नैतिक हो!
परसाई की आत्मस्वीकृति क़ाबिल-ए-ग़ौर है- “मैं
बहुत संवेदनशील आदमी हूँ। इस कारण करुणा की अंतर्धारा मेरे व्यंग्य के भीतर रहती
ही है। जैसे मैं विकट से विकट ट्रेजडी को व्यंग्य और विनोद के द्वारा उड़ा देता
हूँ, उसी
प्रकार करुणा के कारणों को भी मैं व्यंग्य की चोट से मारता हूँ या उन पर विनोद
करता हूँ।”(वही)
आज व्यंग्य लिखने वाले ऐसे कितने लोग हैं, जो इन कसौटियों पर खुद को कसने का
सामर्थ्य अथवा साहस रखते हैं?
व्यंग्य के वर्तमान परिदृश्य के लिए इस प्रश्न की अनदेखी ही जिम्मेदार है। ‘हास्य सोने की अंगूठी, व्यंग्य
सांवरौ नगीना है।’ इसका
शाब्दिक अर्थ तो हम सभी ने लपक लिया, किन्तु इसका भावार्थ गप्प कर गए। आख़िर क्यों? व्यंग्य का उद्देश्य क्या है? क्या इस प्रश्न का उत्तर पाए
बग़ैर लेखन को उद्धत होना कोई आकस्मिक बाध्यता है? समय से संवाद करते हुए गोपाल प्रसाद व्यास पहले ऐसे
ही कुछ ज़रूरी प्रश्नों से जूझते हैं। “देखा
तुमने कभी दीन-हीन दुखी लोगों की ओर?
पूछा अपने से कभी कि आज गरीब गरीब क्यों है?
अमीर कैसी कमाई से अपार सम्पत्ति का स्वामी बन बैठा है? क्या ध्यान गया तुम्हारा कभी
इस बात पर कि आज जिसके पास है, वह भी दुखी है और जिसके पास नहीं है, वह भी दुखी
है, भला क्यों? ...सब
सामाजिक अन्याय से पीड़ित। सब भ्रष्टाचार के मकड़जाल में फंसे हुए। समाजसेवी
समाज-परिष्कार न करके अपने परिष्कार में लगे हुए हैं। इस विडंबना की ओर भी तो
ध्यान देना व्यंग्य-विनोदी लेखक का काम है कि आज मनुष्य और मनुष्य के बीच खाई
क्यों पड़ गई है?
...इस विषमता पर, इस अन्याय पर, इस शोषण पर तुमने क्या लिखा और कितना लिखा? ज़रा बताओ तो सही। मैंने
तुम्हें सोने की अंगूठी इसलिए नहीं पहनायी थी कि तुम हाथ उठा-उठाकर उसे चमकाते
रहो। उसमें श्याम नगीना इसलिए जड़कर दिया था कि समाज में आज जो कलुष, कटुता और
सांवरे अंधकार की कालरात्रि व्याप्त है, उसमें उजाले की किरण का प्रकाश फैला सको।
दीन-दुखियों के म्लान मुखमंडल पर मुस्कान की आभा बिखेर सको। मैंने तो तुम्हें
व्यंग्य-विनोद के यही उद्देश्य बताए थे। लेकिन लगे रहे तुम अपने को प्रतिष्ठित
करने में और भूल गए गरीबी की रेखा के नीचे बैठे हुए उस व्यक्ति को जो दुखों के
मटमैले खारे सागर में डूबा जा रहा है। अब भी समय है। अपने कालमों में, अपने
गद्य-पद्य के लेखन में इस अभाव को दूर कर सको तो करो।”(व्यास के हास-परिहास, भूमिका)
व्यास ने समय की सलाह को हृदयंगमित किया। इसीलिए वह आज भी प्रासंगिक हैं। उनका
गद्य प्रासंगिक है। किन्तु उनका क्या जो समय की चेतावनी, भर्त्सना और मनुहार, सबकी
अनदेखी किए जाते हैं?
खोखले शब्दों की जलेबियाँ छाने जाते हैं?
ऐसी क्या विवशता है जो उन्हें जीवन और सांस्कृतिक समाज से विलग करती है?
उपभोक्तावादी
संस्कृति के पोषक, खाए-अघाए लोगों के हुल्लड़-गिरोह ने व्यंग्य ही नहीं वरन
व्यंग्य-विनोद की लुटिया भी डुबो रखी है। व्यंग्य को हास्य का अनुगामी बनाने का,
उसका एकमात्र निमित्त हास्योत्पत्ति सिद्ध करने के कुप्रयास हुए हैं। यह अपराध है।
नवनीत के व्यंग्य विशेषांक में प्रेम जनमेजय ने इसी तरफ संकेत किया है। “व्यंग्य का चेहरा ही बदल दिया
गया, उसके
लक्ष्य ही बदल दिए गए। व्यंग्य से अपेक्षा की गई कि वह अपनी मूल प्रहारक शक्ति को
भोथरा कर दिल बहलाव का साधन बने, मनोरंजन
करे।”(नवनीत,
मार्च-2014) मनरंजन नहीं, मनोरंजन!
व्यंग्य मध्युगीन कोठे की कोई तवायफ़ तो नहीं कि तमाम परिस्थितियों में मनोरंजन को
बाध्य हो! व्यंग्य
का उद्देश्य तो मनरंजन है। उसका उद्देश्य तो ‘सर्वे
भवन्तु सुखिनः’ है। सम्भव
है, पाठक वास्तव में व्यंग्य का रसास्वादन चाहता हो। वह विसंगतियों के उद्घाटन में
दिलचस्पी रखता हो!
किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि आज के अधिसंख्य व्यंग्य लेखक बाज़ारू वाहवाही के लोभ
में अनाप-शनाप लिख-लिखकर व्यंग्य के चेहरे पर कालिख पोतने को अपना कौशल मानते हैं! ज्ञान चतुर्वेदी भी इस
प्रवृत्ति को लेकर चिंतित हैं। उनकी यही चिंता प्रश्न के रूप में सामने आती है। “इन दिनों बहुत सारा व्यंग्य
ऐसा भी लिखा जा रहा है कि पूछने की तमन्ना तो हमारी भी होती है कि ऐसा व्यंग्य
किसलिए?”(वही)
यहीं पर गोपाल प्रसाद व्यास के ‘हलो-हलो’ का ख़्याल आता है, जिसमें वे रामचन्द्र
शुक्ल के बहाने साहित्य की दुर्दशा के रेखांकन हेतु आधुनिक काल की चार नई शाखाओं
का उद्घाटन करते हैं। उन्होंने साहित्य की चार नई शाखाओं- राज्याश्रयी,
विश्वविद्यालयाश्रयी, अख़बाराश्रयी और फटीचरी यानी निराश्रयी शाखा का ज़िक्र किया
है। इनमें से अख़बाराश्रयी शाखा का विशेष ज़िक्र इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि इसने
व्यंग्य की ‘तुरंता
छवि’
निर्मित की है। “अखबाराश्रयी
साहित्य में स्थायित्व नहीं रहता। ये बरसाती मेंढकों की तरह हर अंक में टर्राते
हुए आते हैं और उस अंक रूपी बरसात के समाप्त होते ही लुप्त हो जाते हैं।”(व्यास के हास-परिहास, पृ.61)
व्यास के दैनिक हिन्दुस्तान में छपने वाले कॉलम ‘नारदजी ख़बर लाए हैं’ से हम सभी वाक़िफ़ हैं। अतः
व्यास का उपरोक्त कथन स्वयं उनके कॉलम पर लागू नहीं होता। उस कॉलम का पाठक रहने के
नाते यह मैं दावे के साथ कह सकने की स्थिति में हूँ कि व्यास अपनी वैचारिक
परिपक्वता और भाषाई सौष्ठव के साथ समय की नब्ज़ पकड़ने वाले व्यंग्य-विनोदी रहे
हैं। वहाँ भाव अथवा भाषा का छिछलापन रत्ती-भर भी नहीं मिलता। परसाई और शरद जोशी
जैसे स्तम्भकारों के साथ भी यही स्थिति रही है। किन्तु यह भी सत्य है कि यह सूची
अधिक लम्बी नहीं है। ठीक है, अख़बारी कॉलम ने व्यंग्य को शोहरत की बुलंदी दी है,
उसे लोकप्रिय बनाया है किन्तु यह भी सत्य है कि इसने व्यंग्य-वस्तु के ह्रास एवं
उसके साहित्यिक मेयार को धूमिल भी किया है। ऐसे बहुत कम व्यंग्य-विनोदी हैं
जिन्होंने सधे झूलानट की भांति इन दोनों का निर्वाह किया है। निस्संदेह, गोपाल
प्रसाद व्यास उन्हीं में शुमार किए जाते हैं। उनके यहाँ विषय और उद्देश्य से लेकर
प्रस्तुति तक, सबकुछ स्पष्ट एवं प्रांजल है। सबसे बड़ी बात यह कि यहाँ
वाक्य-वक्रता, पद्याग्रह अथवा ‘विट’ का ढपोरशंख नहीं बजता। बेहद
सामान्य, सहज और सधे अंदाज़ में बात निकलती है और फिर क्रमशः विषयानुकूल आगे बढ़ती
हुई अपने उद्देश्य-शीर्ष पर पहुँचती है।
गोपाल
प्रसाद व्यास अपने दायित्त्वों के प्रति न केवल सजग एवं ईमानदार हैं, वरन् ‘जो दिखता है, वो बिकता है’ जैसी अत्याधुनिक बाज़ारू
प्रवृत्ति एवं प्रतिस्पर्धा से भी सर्वथा मुक्त कहे जा सकते हैं। आत्म-प्रशंसा की
भावना या स्वयं को ‘प्रोजेक्ट’ करने का लोभ भी नहीं। अगर ऐसा
न होता तो व्यास की गद्य-पुस्तक का नाम ‘व्यास
के हास-परिहास’
क्यों होता? जबकि
सम्पूर्ण पुस्तक साहित्य से लेकर तमाम समसामयिक घटनाओं, चिंताओं तक, विशद् विमर्श
प्रस्तुत करती है। यहाँ साहित्य एवं समाज ही नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि भी अपनी
अक्षुण्णता और बहुत हद तक गम्भीरता के साथ उपस्थित है। फिर भी ‘हास-परिहास’! हास-परिहास तो हम हँसी-मज़ाक
को कहते हैं! यहाँ
तो विषय, विचार और भाषा-व्यवहार तक, सबकुछ अपनी पूरी गरिमा और मर्यादा के साथ
उपस्थित हैं। ‘जिस
पेड़ पर फल लगे हों, उसकी डाली हमेशा झुकी रहती है’ वाली उक्ति यहीं चरितार्थ होती है। हमारे यहाँ तो
‘होली की हुड़दंग’ को परिहास कहने और शाब्दिक
अश्लीलता के माध्यम से ‘हास्य’ उत्पन्न करने का चलन है! वास्तव में व्यास की शैली ‘बतकही’ अथवा ‘बतरस’ वाली है। बात-से-बात निकलती
है, फिर विचारों के तंतुओं का उसमें मिश्रण प्रारम्भ होता है और फिर व्यंग्य-विनोद
की चदरिया स्वयं ही अपना रूपाकार ग्रहण करती, हमारे समक्ष बिछ जाती है। यह चदरिया
बिल्कुल कबीर की सी तन्मयता और कौशल के साथ बुनी जाती है। कहीं कोई रेशा-धागा ऐसा
नहीं, जो अवांछित अथवा ‘ऑक्वर्ड’ हो! एक उदाहरण- “अगर विनोबा की भी शादी हो गई
होती तो वह कदापि गीता की टीका नहीं लिखते। तब वह ‘बिहारी सतसई’
की कुंजी लिखते। टीका अगर लिखनी पड़ती तो गीता की नहीं ‘गीत-गोविंद’ की लिखते। पत्नी के परस से
विनोबा का मन सरस हो गया होता। उनके जीवन-गद्य का खुरदरापन सदा-सदा के लिए खो गया
होता और उसमें से पद्य के कोमल पल्लव फूट उठते।”(वही, पृ.104) यही है व्यंग्य-विनोद। व्यंग्य के
बारीक रेशों के साथ विनोद के तंतुओं का अद्वितीय सम्मिश्रण। पूर्वांचल में एक
कहावत है- जबड़ा मारै रोवै न दे!
और इसकी बानगी ‘तो
क्या होता?’ में
क़दम-क़दम पर मिलती है। “अल्लाहताला
को यह क्या मालूम कि सींग मारने वाले से कहीं भयानक डींग मारने वाले होते हैं। गधा
सींग ही तो मारता है, डींग तो नहीं मारता कि मैं गोरा हूँ, मैं सभ्य हूँ, मैं
सशक्त हूँ, मेरे पास जी-हजूरों के इतने पाकेट हैं, इतने बम हैं, इतने राकेट हैं।”(वही, पृ.73) सभ्यता के
प्रारम्भ से लेकर अब तक के तमाम युद्धों, शीत-युद्धों और वर्चस्व-प्रेरित
ख़ूंरेज़ियों का मूल कारक यही श्रेष्ठता का मुग़ालता नहीं है? सामान्य शब्दों में प्रांजल
और प्रखर व्यंग्य-बोध का यह अनन्य उदाहरण है। समसामयिक चिंता तो फिलहाल यही है कि “हे जगदीश्वर ! तू सब कुछ करना, मगर गधे के
सिर पर सींग नही देना। हमें साम्यवाद मंज़ूर है, मगर गधे के सिर पर सींग स्वीकार
नहीं। क्योंकि साम्यवादियों को सह-अस्तित्त्व सिखाया जा सकता है। मगर सींग निकलने
पर गधा पंचशील का परित्याग कर देगा और सह-अस्तित्त्व को फिर कभी स्वीकार नहीं
करेगा।”(वही,
पृ.74) धर्म और राजनीति के वर्तमान परिदृश्य को व्यास का उपरोक्त कथन सुपरिभाषित
करता है किन्तु स्वंय उनके लिए यह महज ‘गप्प’ अर्थात गल्प का परिष्कृत रूप
मात्र है। यही है लेखकीय सरलता। ज्ञान और वैचारिक रूप से परिपक्व व्यक्तित्व गुमान
से, अभिमान से परे होता है। व्यास की जन-पक्षधरता असंदिग्ध है। वे यह तो मानते हैं
कि “आजादी
किसी राष्ट्र का जीवन है। पराधीनता शव है और स्वाधीनता शिव। लेकिन यदि शिव को हम
भंगेड़ी-गंजेड़ी और अशिव-वेश मानकर ही पूजने लगें और अपने आस-पास सींग मारने वाले
सांडों तथा विष-दंश करने वाले सांपों को ही इकट्ठा कर लें, तो क्या ठीक रहेगा? प्रोपगंडा का डमरू बजाने और
भीख से अपना खप्पर भरने से आजादी की पार्वती प्रसन्न नहीं हो सकती। स्वर्ग से उतरी
हुई आजादी की गंगा को अगर हमारे रुद्र नेता अपनी ही जटाओं में रोके रहेंगे, तो अमृत
फलदायिनी, पतित-पावनी गंगा देश की धरती को पवित्र कैसे करेगी?”(वही, पृ.274) आज़ादी और
लोकतंत्र का नाम तो तभी धन्य हो सकता है जब इसके मर्म और कर्म को हाशिये पर खड़ा
अंतिम व्यक्ति भी समझ और साझा कर सके। लेकिन आज़ादी के साठ-पैंसठ बरस बाद भी
स्थिति ऐसी नहीं बन सकी है। आज़ादी और सुखोपभोग के साधन-संसाधन राजधानियों तक
सीमित हैं। हमारे रुद्र नेता आजादी रूपी गंगा को अपनी जटाओं से आज़ाद करने को
तैयार नहीं हैं। जब तक वंचित समाज तक आज़ादी का प्रकाश नहीं पहुँचता, तब तक ये
दोनों शब्द खोखले ही रहेंगे। शब्द का अस्तित्व तो भाव और अर्थ से होता है। क्योंकि
“हम निस्संदेह आजादी
पाकर धन्य हुए, लेकिन आज तक ऐसी स्थिति नहीं आ पाई कि इसके लिए जनता नेताओं को
धन्यवाद करती।”(वही)
व्यास
के लेखन का एक बड़ा हिस्सा भाषा-साहित्य के चिंता और चिंतन से प्रत्यक्ष अथवा
अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। ‘हलो-हलो’ तो गोया साहित्य, विशेष रूप
से आलोचना और शोध से सम्बद्ध विसंगतियों पर ही केन्द्रित है। कभी तुलसीदास के
जन्मस्थान सम्बंधी विवाद की आड़ में अपने व्यंग्य बाण से विश्वविद्यालयों की
शोध-संस्कृति पर प्रहार करते हैं तो कभी केशवदास के सहारे समालोचकों की तन्द्रा
भंग करने की चेष्टा। “देखिए,
इस प्रश्न का उत्तर अभी आपको नहीं दूँगा। मैंने सुना है कि हिन्दी के अनेक विद्वान
इसकी खोज में जी-तोड़ परिश्रम कर रहे हैं। मैं उनके काम में बाधक क्यों बनूँ? इससे उन्हें डॉक्टरेट की पदवी
मिलेगी। यश मिलेगा। धन भी प्राप्त होगा।”(वही,
पृ.6) रचना महत्वपूर्ण नहीं है। आलोचक और शोधार्थी का ध्येय साहित्य में विन्यस्त
समय, समाज और संस्कृति नहीं, बल्कि सृजनकर्त्ता का जन्मस्थान, उसका पत्नी से
सम्बंध और उसकी जाति आदि अधिक महत्वपूर्ण हैं। यदि तुलसी का दाम्पत्य केन्द्र में
है तो सूरदास की जाति का प्रश्न भी यहाँ राष्ट्रीय समस्या जैसी स्थिति रखती है। “कोऊ मोय सारस्वत कहै है, कोऊ
ब्रह्मभट्ट बतावै ऐ। कोऊ मोय आगरे को कहै है। और अब तौ खैंचि कैं मोय ग्वालियर हू
लै जाय रहे एं।”(वही,
पृ.13) शोध का विषय तो यह भी है कि केशवदास के बाल काले थे या सफेद? और केशव के केश की आड़ में
व्यास के परिहास की आँच राजनीतिज्ञों तक जा पहुँचती है। “हिन्दी के प्रसिद्ध कवि आचार्य
केशवदास के बाल लालबहादुर शास्त्री की तरह मुलायम और कामराज की तरह काले थे। वे
कृपलानी की तरह कुंचित और सत्यनारायण सिन्हा की भांति सदैव सुरभित रहते थे।”(वही, पृ.21) कहाँ केशवकालीन
राजशाही और कहाँ आधुनिक लोकतंत्र!
व्यास को केवल साहित्यिक समालोचना अथवा शोध के गिरते स्तर की ही चिंता नहीं है,
वरन् वह अपने अंदाज़ में भाषा की समस्या से भी जूझते हैं। “अंग्रेजी तो महाशयजी
हिन्दुस्तान में अंग्रेजों के आने से पहले ही आ गई थी। इसलिए तो वह उनके जाने के
बाद भी नहीं जा रही। केशवदास के परिवार के लोग ही नहीं, उनके नौकर-चाकर भी
अंग्रेजी पढ़े हुए थे।”(वही,
पृ.24) अर्थ का अनर्थ कैसे किया जाता है?
व्यास उसकी बानगी भी पेश करते हैं। “भाषा
बोलि न जानई जिनके कुल को दास।/भाषा कवि भो मन्दमति, तिहि कुल केशवदास।।” इसका प्रवीनराय के माध्यम से
वह जो अर्थ करवाते हैं, वह हिन्दी साहित्य के समीक्षकों पर तल्ख़ टिप्पणी की
हैसियत रखती है। इस दोहे का मतलब “यह
था कि जिनके नौकर भी हिन्दी बोलना नहीं जानते, उसी भाषा (हिन्दी) में मतिमंद केशवदास
को अपनी कविताएँ लिखनी पड़ रही हैं।”(वही)
यह मात्र व्यंग्य-विनोद नहीं, कटुक्ति है और ऐसे मूर्धन्य समालोचकों को आईना
दिखाने वाली भी। “विश्व
मानवता के विकास की जिम्मेदारी अब केवल हिन्दुस्तान पर ही है। वह संस्कृत, हिन्दी,
उर्दू, बंगला, मराठी और दक्षिण की भाषाओं के पढ़ने से पूरी नहीं हो सकती। इनको
पढ़ने से हम फिर पीछे की ओर लौटेंगे। इसलिए अंग्रेजी को सहभाषा के पद से उठाकर
शीघ्र से शीघ्र राष्ट्रभाषा और राजभाषा के पद पर एस्टेब्लिश कर देना चाहिए। भले ही
इसके लिए कांस्टीट्यूशन में चेंज करना पड़े। भले ही इसके लिए ज़ोर-जबरदस्ती ही करनी
पड़ी। क्योंकि देश की उत्तर-दक्षिण की समस्या को हल करने का यही रास्ता है। हर्ष
की बात है कि हमारे नेताओं ने राष्ट्र की एकता के इस मूल मंत्र को अच्छी तरह समझ
लिया है। अब मोशनल नहीं, इमोशनल इंटीग्रेशन चाहिए। इस महान कार्य को केवल अंग्रेज़ी
ही कर सकती है।”(वही,
पृ.224) अंग्रेजी की अनिवार्यता कह लें या हमारी व्यावहारिक बाध्यता, इसके लिए
केवल सत्ता और व्यवस्था ही जिम्मेदार नहीं है। हमारी कुंठा का भी इसमें बड़ा हाथ
है। अंग्रेज़ी बोलना ‘क्लास
सिग्नेचर’ है। “इसलिए अंग्रेजी को मानसिक
दासता न कहकर हम इसे विश्वात्मा की पवित्रतम भक्ति के रूप में अंगीकार करते हैं।”(वही, पृ.225) लेकिन हिन्दी के
मठाधीश क्या कर रहे हैं?
हिन्दी की स्वीकार्यता बढ़ाने हेतु उन्होंने क्या किया है? हिन्दी की दुर्गति के लिए
हिन्दी के रथी भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। बकौल व्यास “हिन्दी भी बस, कुछ यूँ ही है,
इसके शब्द-कोशों की रचना सहम-सहम कर की गयी है। इसलिए इसमें नाम के तो बहुत सारे
शब्द मिल जाएंगे, लेकिन काम के आमफ़हम शब्द इससे इसी तरह गायब हैं, जैसे कुर्सी से
बाबू जगजीवन राम और समझदारी से नेताजी राजनारायण!”(वही, पृ.226) व्यास की दृष्टि एकांगी नहीं है।
उनकी पक्षधरता हिन्दी के प्रति है, किन्तु हिन्दी की दुर्दशा के लिए वह केवल
अंग्रेजी के मत्थे सारा दोष मंढ़ने के आग्रही नहीं है।
एक को
बड़ा साबित करने के लिए दूसरे को छोटा सिद्ध करने की प्रवृत्ति हिन्दी आलोचना
साहित्य के शैशवकाल से ही प्रचलन में है। परम्परा अविच्छिन्न रूप से आज तक चली आती
है। “अपने
महाकवि देव में जो भाषा का लालित्य है, भावों की मधुर व्यंजना एवं सहज रसोद्रेक
है, वह न तो सूर में है और न तुलसी में। न विद्यापति में है, न जायसी में। न केशव
में है, न मतिराम में। देव तो हिन्दी-कवितामाला के सुमेरु हैं।”(वही, पृ.32) मिश्र बंधुओं की
मार्फ़त व्यास एक तीर से कई शिकार करते हैं। “आजकल
के प्रकाशक भी देव मनोवृत्ति के हैं, जहाँ जो भी खपत होती है, उलटा-सीधा छाप डालते
हैं। देव की तरह उन्हें भी अपने टकों से काम है।”(वही) साहित्य और राजनीति के घालमेल पर भी उनकी
दृष्टि है, लिहाज़ा बरास्ते रहीम वह तम्बीह करते हैं कि “साहित्य और राजनीति दोनों
रकाबों में पैर रखना ठीक नहीं। ...साहित्य के मूल को ठीक से सींचने पर राजनीति की
डाली में भी सुंदर फूल उग सकते हैं, लेकिन राजनीति फूल को सींचने से तो समूचा पेड़
ही सूख जाता है।”(वही,
पृ.42-43) यहाँ केवल चेतावनी ही नहीं, मार्गदर्शन भी है। यह कोरा उपदेश नहीं, इसमें
अनुभव की गहराई और दृष्टि-गाम्भीर्य भी है। राजनीति हमेशा सबल होती है। रही मौलिक
रचना और कोरे बिम्बों की समस्या तो देवकीनंदन खत्री के बहाने वे ऐसी खोजी
प्रवृत्ति वाले स्वनामधन्य शोधकों-समालोचकों पर तिलमिलाने वाला व्यंग्य-वार करते
हैं। नई कृति का अर्थ अर्थात ऐसी कृति “जो
श्रमसाध्य हो, कोरी हो, अस्पष्ट हो, मौलिक हो, विद्रोही हो और सर्वथा नये प्रकार
की हो। मेरी यह कृति भी ऐसी ही है। बल्कि उससे भी कुछ ऊपर है। यह कोरी के साथ-साथ
अलिखित और अकल्पित भी है। अरूप और अनाम भी है। साफ होते हुए भी रहस्यमय है। इसका ‘टेकनीक’ एकदम नया है। हिन्दी में अब
ऐसा ही मौलिक प्रयोग होना चाहिए, जिसमें न लेखक को लिखने का कष्ट हो और न पाठक को
पढ़ने का।”(वही,
पृ.51-52) भरत होना इतना भी सरल नहीं है। लेकिन ग़ौर कीजिए, जहाँ थोथे को सार और
सार को थोथा समझने की परिपाटी विकसित और स्थापित हो चुकी हो, वहाँ खड़ाऊँ-पूजन कोई
असामान्य घटना नहीं है। अब आचार्य रामचन्द्र शुक्ल तो ख़ड़ाऊँ पहनते नहीं थी, अतः
मूंछ के दो बाल ही सही। “वह
विद्यार्थी अड़ा ही रहा और बाल कटवाते समय मेरी मूंछों के दो बाल ले भागा है। आजकल
वह एक विश्वविद्यालय में हिन्दी का प्रोफेसर है। उसने कई ग्रंथ भी लिखे हैं। चांदी
की डिबिया में उसने मेरी मूंछों के बाल रख छोड़े हैं। सुबह-शाम उन्हें धूप देता है
और आरती भी उतारता है।”(वही,
पृ.62) क्या इतने के बाद भी यह बताने की ज़रूरत शेष बचती है कि आखिर ‘राम की बहुरिया’ इतना इतराती क्यों फिरती है? उसकी ठसक तो देखिए, कहती है
कि “कबीरदासजी
का इस समय संसार में कोई पता नहीं, लेकिन मैं अभी तक धरती पर उसी तरह विद्यमान
हूँ। वैसी ही खुर्रम, वैसी ही मोहक, वैसी ही मीठी। आजकल मैं आपकी दिल्ली में अपना
आश्रम जमाये हुए हूँ। पिछले कुछ दिनों से आप राजधानी में माया का चमत्कार देख ही
रहे हैं। न जाने कितने कबीरदास कोसते-कोसते चल बसे, मगर मैं जहाँ की तहाँ हूँ।
मैंने आजकल अपना लिबास बदल लिया है, भाषा बदल ली है, अड्डा भी बदल लिया है, पर काम
नहीं बदला।”(वही,
पृ.20) साहित्य साधना तो तभी सफल हो सकती है जब साहित्यकार माया के दांव-पेंच और
उसके नाज़-नख़रों के प्रत्येक वार-प्रहार से न केवल वाक़िफ़ हो, बल्कि अनासक्त और
दृढ़-प्रतिज्ञ भी!
मैं
हजारीप्रसाद द्विवेदी के इस कथन से आंशिक रूप से सहमत हूँ कि “जहाँ (व्यंग्य का) लक्ष्य
व्यक्ति या किसी के निजी परिवेश की निश्चित परिस्थिति होती है वहाँ वह कभी-कभी
कटुता और कभी-कभी आक्रोश बन जाता है। व्यासजी में प्रायः इस प्रकार की कटुता या
आक्रोश नहीं पाया जाता।”(भूमिका)
किन्तु उनके इस कथन से मेरी रज़ामंदी है कि “व्यंग्य
बड़ी ही सुकुमार कला है। व्यासजी व्यक्ति की इस राजसिक या तामसिक निशानेबाज़ी से
बचते हैं। बचने के इस प्रयत्न में वे सफल भी हुए हैं।”(वही) नुकीली वस्तु भले चुभती
तुरंत हो, किन्तु उसकी आयु बड़ी नहीं होती। उसका तीखापन ही उसके भोथरे भविष्य की
गारंटी बन जाता है। गोपाल प्रसाद व्यास के गद्य में किसी उद्दंड नदी का हाहाकारी
वेग नहीं है। यहाँ व्यंग्य की धारा विनोद की रेत के नीचे बेहद संयत गति से अपनी
दिशा नापती है। यहाँ सामान्य पाठक और सुशिक्षित मस्तिष्क दोनों के लिए पूरी ख़ुराक
उपलब्ध है। ‘व्यंग्य
पर व्यंग्य’
शीर्षक निबंध मेरे ख़्याल से इसका सटीक उदाहरण है- “लिपी-पुती और मुस्कराती सभ्यता पर व्यंग्य के तेवर
चढ़ गए हैं। किन्तु व्यंग्य के साथ विनोद। जैसे सांप ने ले लिया हो नेवले को गोद।
शिमला समझौते का नवीनतम नमूना, एक कत्था तो दूसरा चूना। नया रंग आएगा। हर चौक,
गलियारा और देहरी-दलानों का कोना-कोना, नयी-नयी पीकों से भर जाएगा। पान भारत की
सभ्यता का प्रतीक है। मानो किसी तिरस्कृता, वंचिता और उपेक्षिता को चूसकर उगली हुई
का नाम पीक है। रूपक सटीक न हो, किन्तु आज के व्यंग्य-विनोद की यही लीक है। कुछ भी
कहो, कुछ भी लिखो, सब ठीक है।”(वही,
पृ.271) हास्य-व्यंग्य धारा के कवियों का सबसे चुनिंदा विषय ‘स्त्री’ (विशेष रूप से पत्नी) है। अब
अगर यह कहूँ कि हास्य के नाम पर स्त्री-केन्द्रित जो कुछ भी लिखा जा रहा है, उसमें
से अधिकांश भोंडा और अनैतिक है तो ग़लत नहीं होगा। आपकी कमज़ोरियों और विवशताओं का
कुल दस पंक्तियों में मज़ाक उड़ाऊँ और फिर अनुदान स्वरूप एक पंक्ति में आपकी भक्ति
करूँ तो आपको कैसा लगेगा?
इस मामले में भी व्यास एक मानदंड स्थापित करते हैं। वे लिखते हैं, “लेखक लोग उनकी दुर्बलताओं का
रस ले-लेकर वर्णन करते हैं। फिर उन दुर्बलताओं को यथार्थ का नाम देकर अपनी दया की,
जिसे वे अपनी भाषा में सहानुभूति कहते हैं, अनचाही, अस्वाभाविक वर्षा करने लगते
हैं।”(वही,
पृ.283) मंचाश्रयी कवियों में यह प्रवृत्ति कुछ ज्यादा ही है। बहरहाल, व्यास का
व्यक्तित्व, उनकी जीवन-दृष्टि और उनकी लेखनी, तीनों का विस्तार और गहराई इतनी है
कि डूबने के बाद उबरना लगभग असम्भव सा है। स्याही भले सूख जाए, शब्दों और विषयों
का अकाल नहीं पड़ता। चूँकि वह स्वयं लिखते हैं कि “एक लेखक को अपनी भी मरम्मत करने से नहीं हिचकना
चाहिए। सच्चा व्यंग्य-विनोद वह है जो खुद पर किया जाता है।”(वही, पृ.328) अतः सामान्य
परम्परा का निर्वाह करते हुए, उनके इस मरम्मत-कार्य में हाथ बँटाना नैतिक कार्य ही
ठहरता है। निस्संदेह व्यास की भाषा सहज और सरल है, स्वर विनोदी है। विषय वैविध्य
एवं गाम्भीर्य पर भी संदेह नहीं। उनके विनोदी तेवर और बतरस वाली शिल्प और शैली भी
कम श्लाघनीय नहीं है!
किन्तु शब्दों के अपव्यय के उदाहरण भी कम नहीं हैं। बल्कि कई निबंधों का लक्ष्य तो
महज विनोद और बतरस ही है। वहाँ व्यंजना अथवा विमर्श का लेशमात्र भी नहीं। हरि अनंत
हरि कथा अनंता। लेख को कहीं-न-कहीं तो उसके अंत तक पहुँचाना ही है, फिर यहीं पर
क्यों नहीं? अंत
में यही कि गोपालप्रसाद व्यास ने हँसा उसी पर है जो हास्यास्पद है, व्यंग्य-बाण
वहीं चलाए हैं, जहाँ इसकी ज़रूरत थी। उन्होंने राज-समाज, साहित्य और संस्कृति से
लेकर जीवन-जगत के तमाम छोटे-बड़े, स्याह-सफ़ेद कोनों-प्रांतरों में युगद्रष्टा की
भांति झांकने की कोशिश की है। यही कारण है वह समय का अतिक्रमण करने और लांघने में
सफल हुए हैं। उनका गद्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना दो-चार-छह दशक पहले था।

काव्यमंच पर आज मसखरे छाये हैं !
जवाब देंहटाएंशायर बनकर यहाँ , गवैये आये हैं !
पैर दबा, कवि मंचों के अध्यक्ष बने,
आँख नचाके,काव्य सुनाने आये हैं !
रजवाड़ों से,आत्मकथाओं के बदले
डॉक्ट्रेट , मालिश पुराण में पाये हैं !
पूंछ हिलायी लेट लेट के,तब जाकर
कितने जोकर, पद्म श्री कहलाये हैं !