‘समझ’ का उम्र से रिश्ता है भी और
नहीं भी है। वैसे ही जैसे उम्र और ज़िन्दगी के गुज़रने में फ़र्क़ होता है। हम जिस
मुल्क में रहते हैं, वहाँ बड़ी आबादी की सिर्फ़ उम्र गुज़रती है, ज़िन्दगी नहीं।
इसके विपरीत एक तबका ऐसा भी है, जिसकी
ज़िन्दगी तो गुज़रती है, लेकिन
उम्र है कि साठ में भी छब्बीसवें बसंत का मुखौटा चस्पाँ किए इतराती फिरती है। जलने
वाले जलते हैं तो जलें, उनकी
बला से! अतः उम्र का सम्बंध ज़िन्दगी से है भी और नहीं भी। आदर्श स्थिति तो यही है
कि दोनों अन्योन्याश्रित हों!
किन्तु ऐसा विरले ही हो पाता है क्योंकि उम्र का सम्बंध प्रकृति से है और ज़िन्दगी
का भौतिक संसाधनों, लालसा और आत्मिक उल्लास से। भौतिक कारक अधिक अहमियत रखते हैं।
अतः त्याग से आत्मिक उल्लास की प्राप्ति का मार्ग विकट भी है और संदिग्ध भी,
क्योंकि लालसा मनुष्य की अनिवार्य दुर्गुण है। कबीर ने सही पहचाना था- “माया महा ठगनी हम जानी/तिरगुन
फांस लिए कर डोले/बोले मधुरे बानी।”
सभी से सूफ़ी या साधु होने की अपेक्षा नहीं रखी जा सकती। वैसे भी वैराग्य आध्यात्मिक कृत्य है, सामाजिक नहीं। भले ही आप पीर के हाथ चूम-चूम कर सवाब कमाते फिरें और साधुओं से आशीर्वाद ले-ले कर स्वयं को धन्य महसूस करते रहें! लेकिन यदि ख़ुद आपका बेटा या बेटी इस मार्ग का अनुसरण करे तो आप या तो आपे से बाहर हो जाएँगे या फिर अपना सिर पीटना शुरू कर देंगे। अपने बच्चे तो भई पढ़-लिखकर ‘योग्य’ बनें तो ही अच्छा है! योग्यता का तात्पर्य सामान्यतः भौतिक संसाधन जुटाने की क्षमता से है। जो जितना अधिक भौतिक संसाधन जुटाने की क्षमता और दक्षता रखता है, वह उतना अधिक योग्य और सफल है। जब हमारी लालसाएँ पूर्ण होती जाती हैं तब जीवन सुखद अनुभूतियों के हिण्डोले पर लचके लेता रहता है। लालसा पूरी न हो तो वेदना, विषाद, जलन-कुढ़न, असंतोष जैसी व्याधियाँ आपकी आत्मा को कलुषित करने लगती हैं। धीरे-धीरे जीवन-नद की उमंग-धारा सूखने लगती है और फिर जिस्म एक बोझ की तरह लगने लगता है। गोया यह भी कोई सामान हो जिसे उसके गंतव्य तक पहुँचाना मजबूरी है।
बहरहाल,
बात बचपन की है। पाँचवीं-छठी कक्षा में रहा होऊँगा! हमारे घर एक उर्दू अख़बार आता था। नाम याद नहीं।
लेकिन वह शे’र
ज़रूर याद रह गया जो रोज़ाना अपने तयशुदा पेज़ पर छोटे से बॉक्स में गाढ़ी स्याही
से छपा होता था। “न
स्याही के हैं दुश्मन न सफेदी के हैं दोस्त/
हमको आईना दिखाना है दिखा देते हैं”।
शायर ज़रूर कोई सहाफ़ी ही रहा होगा!
रोज़-रोज़ देखते-पढ़ते यह शे’र
जह्न में जज़्ब हो गया। एक धारणा बनी, पत्रकार तटस्थ द्रष्टा है। बिल्कुल महाभारत
के संजय की तरह!
(संदेह है कि युद्ध के मैदान में इंसानों को कटता-मरता देखकर भी संजय बिल्कुल
निर्विकार बना रहा होगा!
सम्भव है उसके मन में किसी पक्ष के प्रति सहानुभूति रही हो! किन्तु उसने इसको प्रत्यक्ष न
होने दिया हो! या
यह भी सम्भव है कि ये सब देखते-देखते उसमें जीवन के प्रति वितृष्णा ही उत्पन्न हो
गई हो!)
पत्रकार हमारे जीवन-जगत की प्रत्येक छोटी-बड़ी, अच्छी-बुरी घटनाओं की सूचना हम तक
पहुँचाता है। आईना दिखाता है। तब यह प्रश्न या शंका मन में उठी ही नहीं कि आईना
दिखाना भी एक कला है। किस कोण से, कब और किन परिस्थितियों में आईना दिखाना है, यह
तो वही तय करता है जिसके हाथ में आईना है। नोम चोमस्की ने एक इंटरव्यू के दौरान
जॉर्ज ऑरवेल (एनिमल फार्म की अप्रकाशित भूमिका) को उद्धृत करते हुए कहा था कि “प्रेस के मालिक समृद्ध लोग हैं
जिनके अपने बहुत से कारण हैं कि वे नहीं चाहते कि कुछ विचार सामने आ पाएँ। आज के
और अधिक आधुनिक दौर में मीडिया या तो बड़ी कार्पोरेट कम्पनियाँ हैं या
महा-कार्पोरेट कम्पनियाँ या फिर उनका सरकारों से नज़दीकी जुड़ाव है। अन्य कारण -जो
और भी ज़्यादा महत्वपूर्ण हो सकते हैं—यह है कि यदि आप अच्छी शिक्षा पाए हैं तो
आपके मन में यह बस गया होगा कि कुछ चीज़ें ऐसी हैं जिन्हें नहीं कहा जाना चाहिए।” स्पष्ट है कि हम जिसको आईना
दिखाना कहते हैं, वह दरअसल आईना दिखाना है ही नहीं।
पत्रकार
आईना नहीं दिखाता। वह प्रकाश-परावर्तन के माध्यम से किसी घटना के किसी ख़ास हिस्से
अथवा अंश को आलोकित करता है ताकि उसे हम देख/जान सकें। वह जितना दिखाता है, सूचित
करता है, उससे कई गुना अधिक को छुपा जाता है। उपेक्षित छोड़ देता है। हम उतना ही
देखते या जानते हैं, जितना वह दिखाता या बताता है। पाठक/दर्शक होने के नाते हम यह
मानकर चलते हैं कि जो सूचना विभिन्न माध्यमों द्वारा सम्प्रेषित की जा रही है, वह ‘प्रायोजित’, ‘प्रॉपगेटेड’, ‘अफवाह’ अथवा ‘अर्द्धसत्य’ जैसी नहीं हैं। ऐसा इसलिए कि
परम्परागत रूप से मीडिया को ‘निष्पक्ष’ माना जाता है। ‘निष्पक्ष’ होना बड़ी जिम्मेदारी का काम
है। बकौल प्रमोद जोशी “जब
आप पक्षधर हो जाते हैं, तब किसी के पक्ष या किसी के खिलाफ विचार बड़ी तेजी से
निकलते हैं। जब आप निष्पक्ष होते हैं तब विचार व्यक्त करने में समय लगता है। सबसे
पहले अपने आपको समझना होता है कि क्या मैं निष्पक्ष हूँ? ऐसी स्थिति में असमंजस की
पूरी गुंजाइश होती है। पर संतोष होता है कि किसी की धारा में नहीं बहे। यह संतोष
पत्रकार का है।”
किन्तु मीडिया के वर्तमान परिदृश्य पर ग़ौर करें तो निष्कर्ष यही है कि पत्रकार
निष्पक्ष नहीं होता। ऐसा इसलिए नहीं कि शब्द खर्च करने में आज के पत्रकार दरियादिल
हैं या कि ख़बरों में विशेषणों का इस्तेमाल बढ़ गया है। बल्कि इसलिए कि ‘मिशन’ वाली पत्रकारिता का अंत सन्
सैंतालीस में ही हो गया था। बाद के परिदृश्य में ‘निष्पक्ष होना’
एक निष्प्राण मुहावरा भर रह गया। निश्चय है निष्पक्षता आपको गम्भीर बनाती है, झिझक
पैदा करती है, जिम्मेदारी का बोध जगाती है। तथ्यों की तह तक जाकर पड़ताल को बाध्य
करती है। उस ख़बर का समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इसके आकलन को बाध्य करती है। किन्तु पिछले ढाई
दशकों में आए तकनीकी और प्रबंधकीय बदलावों ने ‘ब्रेकिंग’ और ‘बिजनेस’ का ऐसा नुस्खा तैयार किया है
कि सोचने का वक़्त ही नहीं बचा।
वैसे
पत्रकारिता और निष्पक्षता के प्रश्न पर ‘जनसत्ता’ के सम्पादक ओम थानवी का
दृष्टिकोण प्रमोद जोशी से बिल्कुल भिन्न है। उनके लिए “निष्पक्षता एक दकियानूसी और
बोदा टोटका है। इसका इस्तेमाल पत्रकार अपनी शेखी बघारने के लिए और दुखी आत्माएँ 'दुश्मन' पत्रकारों को चुप कराने के
मुगालते में बापरती हैं- निष्पक्षता की दुहाई उछाल कर उसे दलाल, महत्त्वाकांक्षी आदि करार देते
हुए! कहना न होगा कि दुष्प्रचार के बावजूद ये लोग अपने मकसद में शायद ही सफल हो
पाते हों! कोई
पत्रकार निष्पक्ष नहीं होता;
हरेक का अपना एक नज़रिया,
एक पक्ष होता है- होना चाहिए। इतना ही है कि उसे अपना पक्ष, अपनी सोच बेखौफ रखनी चाहिए-
मर्यादित ढंग से, ईमानदारी
के साथ, नितांत
निस्स्वार्थ भाव से।” इस
कथन से सहमत होने के बावजूद संदेह नहीं जाता। मर्यादा, ईमानदारी, निःस्वार्थ,
बेख़ौफ, जनपक्षधरता जैसे शब्दों का सन्दर्भ बदल गया है। सम्भव है, पहले से ही बदला
रहा हो किन्तु अहसास अब हो रहा हो!
‘पत्रकार निष्पक्ष नहीं होता।’ क्योंकि वह जिस मीडिया
संस्थान के लिए काम करता है, उसका मालिक मुनाफा कमाने आया है। उसने पूँजी लगाई है।
पत्रकारिता पर सत्ता-व्यवस्था का ख़ौफ और पूँजी का दबाव हमेशा से रहा है। आज़ादी
से पहले कम्पनी सरकार के ख़िलाफ़ लिखते हुए, विक्टोरिया महारानी की प्रशंसा
पत्रकारीय उदारता नहीं, भयजन्य बाध्यता ही थी। आज़ादी के बाद नेहरू-युग को छोड़
दें तो मुख्यधारा की मीडिया ने कभी भी पत्रकारिता के उसूलों को अधिक तवज्जो नहीं
दी। मुमकिन है कि ऐसा पेशागत मजबूरी के कारण ही हुआ हो! आपातकाल के दौरान अधिकांश
पत्रकारों-सम्पादकों ने सत्ता के समक्ष घुटने टेके या टेकने पर मजबूर हुए। प्रभाष
जोशी, राजेन्द्र माथुर, गिरधर राठी कमलेश शुक्ल जैसे कुछ ही नाम ऐसे हैं,
जिन्होंने सत्ता के दमन का निर्भीक होकर मुक़ाबला किया। कुछ को तो जेल भी जाना
पड़ा था।
रही
निःस्वार्थता की बात तो फिर प्रश्न उठता है कि चुनावों के दौरान ‘पेड-न्यूज़’ और आम दिनों में ‘च्यूइंगम-जर्नलिज्म’ के माध्यम से दल-विशेष अथवा
व्यक्ति-विशेष को ख्यात/कुख्यात करने की परिपाटी कैसे साँसे लेती रहती है? जन-पक्षधर होने के बावजूद
मीडियाकर्मियों की निगाह आदिवासियों की समस्याओं, दलितों-पिछड़ों के ख़िलाफ होने
वाले अपराध और नरसंहारों की तरफ क्यों नहीं उठती? ईमानदार हैं तो सरकार के जन-विरोधी फैसलों को
जनहित में लिया गया लिखने/दिखाने की ऐसी क्या मजबूरी है?
और
रही मर्यादा की बात तो सन् 1990 से लेकर अब तक मीडिया ने कभी इसकी परवाह नहीं की।
विशेष रूप से साम्प्रदायिक दंगों एवं राजनीति के मामले में यह अफ़वाहों का राजा ही
सिद्ध हुआ है। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान मीडिया ‘मास’ पर हावी रहा। ‘ओपीनियन बिल्डिंग’ का माध्यम बना। पॉलिटिक्स भी
बिजनेस में तब्दील हो गई और नेता प्रोडक्ट बन गया। यह एक नया ट्रेंड है- इमेज
बिल्डिंग का ट्रेंड। अपनी छवि निखारने के लिए राजनेताओं ने पीआर एजेंसियों की मदद
ली। और इस तरह कॉर्पोरेट और पॉलिटिक्स के साथ पब्लिक रिलेशन एजेंसियों और मीडिया के
बीच सांठगांठ के एक नये युग का सूत्रपात हुआ।
वास्तव
में समस्या की जड़ मीडियाकर्मी हैं ही नहीं। सारा प्रपंच बाज़ार और सरकार का है।
मीडिया संस्थानों की बदमाशी है। रीढ़ की बात कहने-सुनने में ही अच्छी लगती है।
हक़ीक़त तो यही है कि नौकर को मालिक की इच्छा का सम्मान और उसके आदेश का पालन करना
ही पड़ता है। मालिक तन्ख्वाह देता है इसलिए उसकी बात माननी पड़ेगी। मालिक पूँजी
लगाता है, इसलिए उसको मुनाफ़ा चाहिए। मुनाफ़ा तभी होगा जब विज्ञापन आएंगे।
विज्ञापन तभी आएंगे, जब विज्ञापनदाता को यह भरोसा हो कि ऐसा करने से उसके प्रोडक्ट
की बिक्री बढ़ेगी। यह एक प्रकार की चक्रीय श्रृंखला है। सभी एक-दूसरे से सम्बद्ध
हैं और परस्पर निर्भर भी। अर्थात ‘इस
हाथ ले, उस हाथ दे’ वाली
उक्ति यहाँ चरितार्थ होती है। अतः अख़बार की प्रसार संख्या या किसी टेलीविज़न चैनल
की पहुँच विज्ञापन का आधार नहीं है। विज्ञापन का आधार ‘आय-वर्ग’ है।
बाज़ार
का विश्वास ‘संतोषम
परम सुखम’ या ‘सादा जीवन उच्च विचार’ जैसे मुहावरों में नहीं है।
हो भी नहीं सकता। घोड़ा घास से दोस्ती कर लेगा तो खाएगा क्या? बाज़ार को चाहिए लालसा,
बाज़ार को चाहिए उत्सव, बाज़ार को चाहिए प्रतिस्पर्धा, बाज़ार को चाहिए भोग-लोलुप
जीवन-समाज और संस्कृति। और मीडिया को क्या चाहिए? मीडिया को चाहिए बाज़ार। बाज़ार मीडिया को महत्व
कब देगा? जब
मीडिया बाज़ार की ज़रूरतों को महत्व देगा। अर्थात जब मीडिया अपने पाठक-दर्शक में
लालसा की चिंगारी भड़काएगा। मुकेश कुमार से शब्द उधार लें तो कह सकते हैं कि “मुख्यधारा का मीडिया दरअसल पिछले
दो-ढाई दशकों में पॉप मीडिया के रूप में ढल गया है। इसे पॉप म्यूजिक और फास्ट फूड
की तरह ही देखा जाना चाहिए। यह उसी नव-पूँजीवाद की कल्चर इंडस्ट्री में निर्मित
मीडिया है, जिसका
उद्देश्य लोगों को सूचना देना, शिक्षित
करना या स्वस्थ मनोरंजन करना नहीं है बल्कि एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जो
बाज़ार के हिसाब से चले। इस कल्चर इंडस्ट्री का पॉप मीडिया उस पॉपुलर विमर्श को ही
मज़बूत करने का काम करता है जो बड़ी पूँजी से संचालित लोकतंत्र के हित में हो।
पूरी पत्रकारिता अब इसी पॉप मीडिया के इशारों पर नर्तन कर रही है। जब वर्तमान
सरकार पूरी निर्ममता के साथ बाज़ार के पक्ष में खड़ी है, तो जाहिर है पॉप मीडिया को भी
उसी का साथ देना है क्योंकि वह उससे अलग नहीं,
उसका अभिन्न हिस्सा है।”
ठीक ही है, जब राजनेता ‘रॉकस्टार’ हो सकता है। जब धर्मगुरू ‘फिल्म स्टार’ हो सकता है। जब साधु-संत-साध्वी,
मुफ़्ती-मौलाना आदि एमएलए-एमपी-मंत्री आदि बन सकते हैं, महानगरों में बाबाओं के
आश्रम बन सकते हैं, तब मीडिया ‘पॉप’ और मीडियाकर्मी ‘पॉपस्टार’ क्यों नहीं हो सकते? नोम चोम्सकी बिल्कुल सही कहते
हैं कि ‘मीडिया
की संरचना सत्ता की संरचना को प्रतिबिम्बित करता है।’ अर्थात प्रश्न केवल मीडिया की
विश्वसनीयता-अविश्वसनीयता का नहीं है, बल्कि इसका समानुपातिक जुड़ाव सत्ता-संरचना
से है। अतः तमाम मिथ्याचारों का ठीकरा केवल मीडिया के मत्थे नहीं फोड़ा जा सकता।
सिर्फ़
यह कहना कि मीडिया अपने उपभोक्ताओं में लालसा का बीजारोपण करता है या कि टीआरपी के
चक्कर में गम्भीर विषयों पर अपेक्षाकृत हल्की और मूल्यहीन ख़बरों को तरजीह देता है
और ऐसा करने के पीछे उसका मूल मक़सद महज बाज़ार और उत्पाद है; यथार्थ का सतही
मूल्यांकन ही माना जाएगा। वाल्टर लिपमैन जैसे उदार लेखकों की नज़र में भी जनता ‘दिग्भ्रमित रेवड़’ सरीखी ही है और इसको निर्णय
प्रक्रिया से दूर रखना ज़रूरी है। निर्णय लेने का अधिकार रेवड़ अर्थात भेड़ों के
झुंड को नहीं दिया जाना चाहिए। यानी लोकतंत्र में निर्णय लेने का अधिकार जनता के
पास जाने से रोका जाना चाहिए और सहमति गढ़ी जानी चाहिए। सहमति कौन गढ़ेगा? निर्णय कौन लेगा? क्या इन प्रश्नों का उत्तर
आपको मालूम नहीं है? अतः
पॉप मीडिया कोई अजूबा नहीं है। बकौल नोम चोमस्की “1920 के बिजनेस प्रेस में आप जनता को उन चीज़ों,
जिसे सामान्यतः वे सतही कहते हैं, मसलन फैशनेबुल उपभोक्ता वस्तुओं की ओर मोड़ने की
ज़रूरत के बारे में खुलेआम पढ़ सकते हैं।”
ऐसी कौन सी ज़रूरत आन पड़ी कि आम जनता को फ़ैशनेबुल उपभोक्ता वस्तुओं की तरफ
आकर्षित किया जाने लगा, उनके अंदर लालसा का बीजारोपण किया जाने लगा? ऐसा इसलिए ताकि लिपमैन जैसे
लोग, पूँजीपति और सत्ता-व्यवस्थाएँ अपने निर्णय इन पर थोप सकें और जनता अपने
वास्तविक शत्रु को पहचान पाने में अक्षम हो जाए।
कहने
को तो यही कहा जाता है कि मीडिया वस्तुतः लोगों तक सूचना, शिक्षा और मनोरंजन पहुंचाने का
एक माध्यम है और अर्थव्यवस्था के समग्र विकास में इसकी भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण
है। किन्तु पिछली सदी से लेकर वर्तमान परिदृश्य तक, इसका चरित्र सर्वथा विपरीत है।
यह ज्ञान और तथ्य के युग में अज्ञान और प्रॉपगंडा का प्रसारक बन चुका है। आर्थिक,
राजनीतिक और सांस्कृतिक मसलों की गम्भीरता और अर्थवत्ता को इसने कुंठित किया है और
कर रहा है। पॉपुलर कल्चर की आड़ में बाज़ार का दरबारी राग चौबीस घंटे लगातार। ऐसी
परिस्थिति में यह कहना कि ‘मीडिया
राष्ट्र के अंतःकरण का रक्षक है’,
प्रवंचना ही है। फिर समाधान क्या हो?
चोमस्की के शब्दों में समाधान के लिए “जो
कुछ किया जाना है वह सिर्फ मीडिया तक ही सीमित नहीं है। वह है एक ज्यादा सक्रिय
लोकतांत्रिक समाज, एक ज्यादा लोकतांत्रिक संस्कृति का विकास। जहाँ तक इलीटों का
सवाल है वे चाहते हैं कि जनता ज्यादा अनुशासित, निष्क्रिय, आज्ञाकारी और दूसरी
अन्य चीज़ों की ओर लगी हो।”
इसलिए सिर्फ माया महा ठगनी हम जानी, से काम नहीं चलेगा। मीडिया को कोसने से भी
लक्ष्य की प्राप्ति सम्भव नहीं है। उच्च वर्ग, पूँजी, सत्ता और मीडिया के गठजोड़
को समझने, उनके चारा-स्वरूप फेंके गए लालसा-पूरित दानों से बचने और अधिक
लोकतांत्रिक संस्कृति के विकास की दिशा में पहल करना ज़रूरी है।

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